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दिल्ली मेरी दिल्ली: कुर्सी की आस

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जब शक्ति मोबाइल ऐप से दिल्ली के कार्यकर्ताओं की राय पूछी तो करीब आधा दर्जन नेता ऐसे थे, जिन्होंने अपने समर्थकों से निजी तौर पर कहा कि वे अध्यक्ष पद के लिए उन्ही का नाम लें।

Author Published on: January 14, 2019 3:07 AM
दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित। (फोटो- पीटीआई)

बेदिल

दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष और तीन अन्य नेताओं को कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने के बाद इस मुद्दे पर जारी कयासों का दौर तो थम गया है, लेकिन इन नई नियुक्तियों ने कई नेताओं की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। प्रदेश अध्यक्ष पद से अजय माकन के इस्तीफे के बाद कई नेताओं की नजर उनकी कुर्सी पर थी। ये लोग अध्यक्ष तो नहीं बन पाए, लेकिन उनमें से कुछ को कार्यकारी अध्यक्ष की कुर्सी मिल गई। कई नेता ऐसे भी थे जिन्हें कुछ भी नहीं मिला। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जब शक्ति मोबाइल ऐप से दिल्ली के कार्यकर्ताओं की राय पूछी तो करीब आधा दर्जन नेता ऐसे थे, जिन्होंने अपने समर्थकों से निजी तौर पर कहा कि वे अध्यक्ष पद के लिए उन्ही का नाम लें। कई नेताओं ने तो बाकायदा सोशल मीडिया पर यह अभियान चलाया कि उनके नाम का समर्थन किया जाए। बहरहाल, अब इन नेताओं की नजर प्रदेश कांग्रेस संगठन में होने वाले विस्तार पर है। उन्हें उम्मीद है कि अगर संगठन में ही कोई बड़ी कुर्सी मिल जाए तो बात बन जाएगी। हालांकि यह तय है कि अब तक संगठन को तय करने की जिम्मेदारी माकन की थी लेकिन अब शीला दीक्षित की चलेगी। जाहिर है कि दीक्षित के करीबी बदले वक्त में ज्यादा उत्साहित नजर आ रहे हैं।

महंगाई की मार
प्रगति मैदान में लगे विश्व पुस्तक मेले में दर्शक ज्यादा और किताबों के खरीदार कम नजर आए। पिछले दिनों प्रगति मैदान में लोग इसकी चर्चा भी करते दिखे। बीच बहस में उन्होंने इसकी वजह भी बता डाली। दरअसल पुस्तक मेले में इस बार परंपरागत किताबों के अलावा तकनीक युक्त सामग्री की बाढ़ थी। मसलन किताबों का डिजिटल संस्करण, बच्चों की पुस्तकों का थ्रीडी और आॅनलाइन संस्करण आदि। यहां तक तो ठीक था, लेकिन जब इन तकनीकी किताबों को खरीदने की बात होती तो ऊंचे दाम सुनकर लोग पीछे हट जाते। लोगों का तर्क भी वाजिब था कि जो काम 20-30 रुपए में हो सकता है, उसके लिए डेढ़-दो सौ रुपए खर्च करने की क्या जरूरत। इस बाबत एक महिला की टिप्पणी सटीक रही कि स्कूल की किताबें क्या कम महंगी है, जो यहां भी महंगी किताबें खरीदें।

नहीं चला फॉर्मूला
खरीदारों को राहत देने के लिए एग्रीमेंट टु सबलीज के प्रशासनिक फॉर्मूले पर प्राधिकरण की नाराजगी के बाद इसके ठप होने के आसार बन गए हैं। यही वजह है कि प्राधिकरण के अधिभोग प्रमाणपत्र के बगैर फ्लैटों का कब्जा देने वाले बिल्डर या खरीदार, किसी ने भी एग्रीमेंट टु सबलीज पर पहल नहीं की है। करीब एक महीने पहले जैसी हालत आज भी बरकरार है। बगैर रजिस्ट्री या मालिकाना हक के फ्लैट खरीदार तैयार हो चुकी बहुमंजिला इमारतों में रह रहे हैं, जबकि कब्जा देने से पहले बिल्डर ने तकरीबन पूरी रकम खरीदारों से वसूल ली है, लेकिन अधिभोग प्रमाणपत्र के लिए जरूरी सुविधाओं का संचालन या प्राधिकरण का भुगतान नहीं किया है। बिल्डरों पर प्राधिकरण के बकाए की देनदारी के बगैर फ्लैट रजिस्ट्री कराने के लिए प्रशासन ने एग्रीमेंट टु सबलीज का प्रस्ताव मंजूर किया था। इसके तहत कब्जा ले चुके खरीदार स्टांप शुल्क अदा कर बिल्डर के साथ एग्रीमेंट टु सबलीज कराकर मालिकाना हक हासिल सकते हैं। -बेदिल

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