Covid-19: दिल्ली मेरी दिल्ली

कोरोना विषाणु संक्रमण के प्रसार को रोकने के लिए लगाई गई देशव्यापी पूर्णबंदी के दौरान स्कूल और कॉलेज बंद हैं। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय स्कूलों को खोलने की योजना पर काम कर रहा है।

कोरोना ने अगर सबसे ज्यादा परेशान किया तो वो हैं प्रवासी मजदूर। इसी के चलते पूर्णबंदी की गई। प्रवासियों का पलायन हुआ। उनकी नौकरियां चली गईं। ऊपर से उन प्रवासियों पर उनकी मकान मालिकों ने किराया मांग-मांग कर और दिक्कतें बढ़ा दीं।

वर्दी का हिस्सा मास्क
अब कोरोना आया है तो नियम तो सभी को फॉलो करने पड़ेंगे न। ऐसे थोड़े होगा कि पुलिस वाले अंकल हैं तो आपके लिए नियम कुछ और होंगे। तो बात दिल्ली पुलिस में बीते दिनों नियमों का उल्लंघन करने से एक अधिकारी को निलंबित करने की है। सर को निलंबित कर दिया गया तो इसका खौफ अब विभाग में साफ नजर आने लगा है। एक ओर जहां जवानों को अधिकारियों ने सख्त हिदायत दी है कि ऑन ड्यूटी मास्क के बिना ना रहें और साथ ही यह भी कहा कि आला अधिकारी की नजर पड़ जाने के बाद वे कुछ नहीं कर पाएंगे। वहीं, अधिकारियों ने भी अब आॅन ड््यूटी मॉस्क पहनने को मानों वर्दी का हिस्सा ही बना लिया है। यही कारण है कि अब अधिकारी हो या फिर जवान मास्क पहनना नहीं भूल रहे हैं। माना जा रहा है कि एक अधिकारी की निलंबित होने की खबर ने अन्य पुलिसकर्मियों को जागरूक कर दिया है। यही कारण है कि जवान हो या फिर अधिकारी भूल कर भी चूक नहीं कर रहे हैं।

रिपोर्ट मांगी जाएगी
दिल्ली में नए अध्यक्ष के कार्यकाल के साथ ही भाजपा में राजनीतिक समीकरण बदलने शुरू हो गए हैं। ये नए समीकरण ही आने वाले दिनों पार्टी में कल के आगाज की सफलता तय करेगा। अध्यक्ष का पद है। यही वजह थी कि दिल्ली के पूर्व अध्यक्षों ने इस ताजपोशी की अगुआई की थी लेकिन दिल्ली के सांसद इस ताजपोशी में शामिल नहीं थे। इस पर पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ने तपाक से बोल दिया कि इस मामले में सांसदों से रिपोर्ट मांगी जाएगी। ऐसी शुरूआत से ही भाजपा की राजनीति में उथल पुथल आने वाली है।

थोड़ी राहत ज्यादा मस्ती
कोरोना काल में मामूली सी राहत ने दिल्ली को दौड़ा दिया है। दिल्ली की सड़कों पर चल रहे लोग मौजमस्ती के लिए बाहर निकल रहे हैं, जो दिल्ली वालों को दोहरे जाल में फंसा रही है। लोगों में कोरोना संक्रमण का डर जरूर है, पर इस पर राहत अधिक भारी पड़ती नजर आ रही है। इस वजह से ऐसे लोग भी कोरोना जाल की चपेट में फंस रहे हैं, जो अब तक दमदारी से दावा कर रहे थे कि वे प्रतिदिन कोरोना के मरीजों को राहत पहुंचा रहे हैं। लेकिन नए मामलों के बाद इन योद्धाओं ने भी अपने पांव कुछ वापस खींचे हैं ताकि संक्रमण के खतरे से बचा जा सके।

बंदी में मजबूर मजदूर
कोरोना ने अगर सबसे ज्यादा परेशान किया तो वो हैं प्रवासी मजदूर। इसी के चलते पूर्णबंदी की गई। प्रवासियों का पलायन हुआ। उनकी नौकरियां चली गईं। ऊपर से उन प्रवासियों पर उनकी मकान मालिकों ने किराया मांग-मांग कर और दिक्कतें बढ़ा दीं। पूर्णबंदी की शुरूआत में प्रशासनिक स्तर पर किराएदारों से किराया लेने पर रोक संबंधी आदेश जारी किया गया था। उसके बाद इस आदेश के चलते मकान मालिकों के संगठन ने जोर-शोर से प्रशासन पर बिजली के बिल माफ करने, स्कूल के बच्चों की फीस माफ करने जैसी मांगे रखी थीं। भले ही इन मांगों पर कोई स्पष्ट आदेश जारी नहीं हुआ लेकिन पूर्णबंदी काल के बढ़ने के साथ मकान मालिकों ने परोक्ष रूप से किराएदारों को वसूली के लिए अलग-अलग तरीकों से तंग करना शुरू कर दिया।

मारपीट और धमकाने को लेकर भी थानों में कई मामले दर्ज हुए, लेकिन कड़ी कार्रवाई के अभाव में समर्थवान मकान मालिकों का ही पलड़ा भारी है। हाल ही में ग्रामीण निवासियों के एक संगठन ने डीएम से किराया माफी संबंधी दिशानिर्देश स्पष्ट करने की भी मांग की है, लेकिन प्रशासन ने अपना रुख स्पष्ट नहीं किया है। नतीजन अब काम धंधे खुलने के बाद भी पुराना बकाया नहीं दे पाने वाले निम्न मध्यमवर्गीय लोग रातों-रात जैसे-तैसे अपना सामान लेकर गांवों की तरफ जाने को मजबूर हो रहे हैं।
आपदा में अवसर
कोरोना विषाणु संक्रमण के प्रसार को रोकने के लिए लगाई गई देशव्यापी पूर्णबंदी के दौरान स्कूल और कॉलेज बंद हैं। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय स्कूलों को खोलने की योजना पर काम कर रहा है। निजी स्कूल प्रबंधक भी स्कूलों को खोलने की तैयारी कर रहे हैं। साथ ही वे इस आपदा को अवसर में बदलने की भी तैयारी कर रहे हैं। दरअसल, पिछले दिनों सोशल मीडिया पर एक निजी स्कूल के नाम वाला बच्चे का मास्क बहुत वायरल हुआ। इस मास्क की कीमत 400 रुपए बताई जा रही है। अगर ऐसा है तो निजी स्कूल के प्रबंधकों ने तो इस आपदा को अवसर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। अब अभिभावकों को किताबों और वर्दी के साथ मास्क भी स्कूल से लेना होगा।

जल्दबाजी अच्छी नहीं
कई बार जल्दीबाजी में बिना तथ्यों को जांचे दिया गया आधिकारिक बयान बड़े बड़ों की छीछालेदर करा डालता है। ऐसा ही एक बयान जारी कर अब मौन धारण कर बैठे हैं दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी के एक पूर्व अध्यक्ष। जी हां, उन्होंने एक नई पंथक पार्टी भी बना रखी है। बीते दिनों पूर्व प्रधानजी ने दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी के गुरुनानक सुखशाला (वृद्ध आश्रम) में 3 बुजुर्गों की मौत पर बयान जारी कर इस पर कमेटी को कठघरे में खड़ा किया। और सही देखभाल ना कर पाने का आरोप भी लगाए। जब सच्चाई सामने आई तो सब चौंक गए। कमेटी ने बताया कि जिन बुजुर्गों की मौत हुई थी उनमें से ज्यादा अपने घर चले गए थे। और उनकी उम्र 90-92 साल के बीच थी। इतना ही नहीं कमेटी ने अपने पूर्व प्रधान को खरी खोटी भी सुनाई। उसके बाद सबकों मानो सांप सुंघ गया। किसी ने ठीक ही कहा, जल्दीबाजी में बिना तथ्यों को जांचे दिया गया आधिकारिक बयान बड़े बड़ों की छीछालेदर करा ही डालता, खासकर जब ओहदा बड़ा हो।

जान की गारंंटी की मांग
कोरोना में दफ्तर का काम कैसे निबटे। यह चिंता अधिकारियों के लिए सिरदर्द बनी हुई है। कोरोना में जहां निगम अधिकारियों के हाथ पांव फुले हुए हैं, वहीं कनिष्ठों का पौ बारह हो रहा है। उनके दफ्तर आने के बार-बार के निर्देश का एक ही तर्क हो रहा है कि साधन नहीं हैं और वायरस चपेट में नहीं लेगा उसकी गारंटी कौन लेगा। निगम के एक अधिकारी ने बेदिल से बताया की इस समय दफ्तर में काम करना बहुत मुस्किल है। खुद ही फाइल ढूंढ़ो, उसका नोट बनाओ, उसके ऊपर दस्तखत करो और फिर सबसे उसे डिस्पेच करने के लिए सीढ़ियों चढ़ो। ऐसे में बेहतर काम की गुंजाइश नहीं के बराबर रह जाती है। दफ्तर में काम करने वालों को बुलाओ तो सबसे पहले जान की गारंटी मांगी जाती है फिर आने जाने के साधन नहीं होने का तर्क दिया जाता है। हमें तो आना ही पड़ेगा लेकिन मस्ती उनकी हो रही है जिनके बदले हम काम करते हंै।
-बेदिल

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