कई राज्यों में जहरीली शराब पीने से होने वाली मौतों के मामलों के बावजूद दिल्ली सरकार इस मुद्दे पर गंभीर नहीं दिखी। 30 सितंबर, 2025 को पुरानी शराब नीति की समय सीमा समाप्त होने के बाद देसी शराब को पुराने नियम और दरों पर बेचने की अनुमति तीन माह देरी से जनवरी में दी गई। इस देरी के कारण 25 से 30 करोड़ रुपए के राजस्व नुकसान का आकलन किया जा रहा है।

जनवरी से सितंबर, 2025 के बीच देसी शराब की बिक्री से दिल्ली सरकार को करीब 85 करोड़ रुपए का राजस्व प्राप्त हुआ। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की अध्यक्षता में 13 जनवरी को कैबिनेट बैठक में वित्त विभाग के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई थी, जिसने देसी शराब की आपूर्ति पुरानी दरों व नियम शर्तों के तहत 31 मार्च, 2026 तक जारी रखने का निर्णय लिया गया। यह अनुमति नई निविदा पूरी होने तक या 31 मार्च तक, जो भी पहले हो, लागू रहेगी।

अधिकारियों के अनुसार आबकारी विभाग ने अब 2025-26 के लिए नई निविदा भी जारी कर दी है। दिल्ली पुलिस हर रोज बड़ी मात्रा में हरियाणा से लाई जाने वाली अवैध शराब बरामद करती है। बावजूद इसके सितंबर से जनवरी तक देसी शराब की बिक्री पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया। इस वजह से घटिया और कच्ची शराब के सेवन का खतरा बढ़ गया और राजस्व पर भी असर पड़ा। विभाग का उद्देश्य अवैध शराब पर अंकुश लगाना है, लेकिन देरी के कारण चालू वित्त वर्ष में घाटा उठाना पड़ा।

2023-24 के मुकाबले घटी शराब की बिक्री

अर्थ एवं सांख्यिकी निदेशालय की दिल्ली सांख्यिकीय पुस्तिका-2025 के अनुसार, राजधानी में कुल 83 देसी शराब की दुकानें और 714 भारत निर्मित विदेशी शराब (आइएमएफएल) की लाइसेंसी दुकानें हैं। 2022-23 में देसी शराब की बिक्री 24,45,796 डिब्बे रही, जो 2023-24 में 15,50,000 और 2024-25 में घटकर 7,22,732 डिब्बे हो गई। बीयर की बिक्री 2024-25 में 2,32,54,551 डिब्बे रिकार्ड हुई, जबकि भारतीय बीयर 7,02,622 डिब्बे।

कोरोना काल और नई आबकारी नीति के बाद देसी शराब की बिक्री बढ़ी थी। आबकारी विभाग को वैट सहित कुल उत्पाद शुल्क 2024-25 में 8,254.76 करोड़ रुपए प्राप्त हुआ, जबकि 2023-24 में यह 7,430.97 करोड़ था। विशेषज्ञों का कहना है कि देरी से निर्णय लेने की पुरानी प्रक्रिया और गरीब वर्ग के लिए सस्ती शराब की उपलब्धता प्रभावित हुई, जिससे अवैध शराब का खतरा बढ़ा और राजधानी में वित्तीय घाटा हुआ।

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