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डॉक्टरों ने सचिवालय पर धावा बोला

दिल्ली के दीनदलाय उपाध्याय अस्पताल के डॉक्टरों व मरीज के तीमारदारों में हुई मारपीट के बाद से कई अस्पतालों में चल रही हड़ताल शुक्रवार को भी जारी रही।

Author नई दिल्ली | April 8, 2017 1:38 AM
हड़ताल दिल्ली के दीनदलाय उपाध्याय अस्पताल के डॉक्टर

दिल्ली के दीनदलाय उपाध्याय अस्पताल के डॉक्टरों व मरीज के तीमारदारों में हुई मारपीट के बाद से कई अस्पतालों में चल रही हड़ताल शुक्रवार को भी जारी रही। शुक्रवार को हड़ताली डॉक्टरों ने दिल्ली सचिवालय पर धावा बोल दिया। इमरजंसी सेवाओं में हड़ताल शनिवार तक खत्म होने की उम्मीद है। अस्पतालो में डॉक्टरों के साथ चल रही कई तरह की ज्यादतियों के आरोप लगाते हुए फेडरेशन आॅफ रेजीडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (फोर्डा)ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। साथ ही रेजीडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन ने चेतावनी दी है कि सुनवाई नहीं होती है तो वे मरीज देखना पूरी तरह से बंद कर देंगे। राजधानी के दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल में तीमारदारों के हंगामे और डॉक्टरों व सुरक्षाकर्मियों से मारपीट की घटना के बाद से करीब 18 अस्पतालों में हड़ताल चली।

कई बड़े सरकारी अस्पतालों में रेजिडेंट डॉक्टर हड़ताल के समर्थन में सक्रिय दिखे। लेडी हार्डिंग, कलावती सरन, चाचा नेहरू, संजय गांधी, सरदार पटेल और अरुणा आसफ अली अस्पताल में हड़ताल का समर्थन जारी रहा। रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (आरडीए) ने सुनवाई होने व समाधान मिलने तक हड़ताल जारी रखने का एलान किया है। इस बीच खबर मिली है कि कुछ अस्पतालों में डॉक्टर शुक्रवार से काम पर लौट आए हैं। जिन अस्पतालों में डॉक्टरों ने काम शुरू करने का फैसला किया है उनमें मालवीय अस्पताल, महर्षि वाल्मीकि लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल, चाचा नेहरू, आंबेडकर अस्पताल, बाड़ा हिंदूराव अस्पताल व अन्य शामिल हैं। इनके रेजीडेंट डॉक्टर ने कहा है कि हमारी मांग अपनी जगह कायम है। हम मरीजों के हित में काम पर लौट रहे हैं। जिन अस्पतालों में हड़ताल कायम है उनमें डीडीयू ,जीटीबी, अरुणा आसफअली, हेडगेवार व अन्य अस्पताल शामिल हैं। एलएनजेपी जीबीपंत सफदरजंग व अन्य अस्पताल अभी तक बाहर रहे।  हड़ताल होने के कारण डीडीयू अस्पताल में एक भी मरीज का आॅपरेशन नहीं हुआ है। जिन मरीजों की हालत बेहद गंभीर है उन्हें लोकनायक अस्पताल व दूसरे अस्पतालों में भेजा गया है।

समस्या की जड़ तक जाने के लिए नुक्कड़ नाटक का सहारा

‘मैं अरुणा आसफ अली अस्पताल से डॉक्टर महेश (बदला नाम) बोल रहा हूं। मैं अस्पताल में इमरजंसी वार्ड में सेवाएं भी देता हूं। दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन के घर से चंद कदम की दूरी पर स्थित अरुणा आसफ अली अस्पताल के इमरजंसी वार्ड में कोई मरीज जहर खा कर या गलती से जहर की चपेट में आकर पहुंचे तो इमरजंसी मैनेजमेंट के तौर पर जो काम सबसे पहले करना होता है, वह है राइंंस ट्यूब डालकर पेट में से सारा जहर तुरंत निकालना। लेकिन अस्पताल की इमरजंसी में राइंस ट्यूब नहीं है। मैं बाहर से यह ट्यूब लाने को नहीं लिख सकता क्योंकि सरकार की ओर से मनाही है। नौकरी की परवाह न करके लिख भी दूं तो बाहर से ट्यूब लाने तक में बहुत देर हो जाती है और मरीज दम तोड़ देता है। मरीज के तीमारदार मौत के सदमे से बेकाबू हो जाते हैं। कभी-कभी उनका गुस्सा मारपीट में बदल जाता है। जरा सोचिए, जान बचाने वाला डॉक्टर व जिंदगी की भीख मांगते मरीज के परिजन क्या एक-दूसरे के दुश्मन हो सकते हैं। असली समस्या व असली समाधान है कि देश की बुनियादी स्वास्थ्य सेवा को मजबूत किया जाए। आइए पूछें कि निजी अस्पताल में झगड़े क्यों नहीं होते? निजी अस्पताल की मशीनें खराब क्यों नहीं होतीं और अगर होती भी हैं तो रातोंरात ठीक कैसे हो जाती हैं?’ यह पटकथा है एक नुक्कड़ नाटक की, जिसके जरिए दिल्ली के हड़ताली डॉक्टर मरीजों के बीच असली मुद्दे को लेकर अलख जगाने में जुटे हैं। इससे जुड़े एक डॉक्टर का कहना है कि वे अपनी मर्जी से इस पेशे में आए हैं और सरकारी अस्पताल में टिके हैं। सरकारी अस्पतालों में जितने मरीज आते हैं, उन्हें देखने के लिए 20 घंटे का वक्त चाहिए, जबकि यह काम उन्हें सिर्फ चार घंटे में करना होता है। इसमें गुणवत्ता का स्तर क्या होगा, इसका अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं। वे नुक्कड़ नाटक के जरिए यू-ट्यूब पर भी मुहिम चलाने की तैयारी में हैं।

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