ताज़ा खबर
 

मिलेगा शक्ति सर्वेक्षण का नमूना

हाई कोर्ट के आदेश से तीस अप्रैल तक होने वाले नगर निगमों के 13 सीटों के उपचुनाव दिल्ली में सक्रिय राजनीतिक दलों के लिए एक शक्ति प्रदर्शन बनने वाला है।

Author नई दिल्ली | Published on: January 31, 2016 2:11 AM

हाई कोर्ट के आदेश से तीस अप्रैल तक होने वाले नगर निगमों के 13 सीटों के उपचुनाव दिल्ली में सक्रिय राजनीतिक दलों के लिए एक शक्ति प्रदर्शन बनने वाला है। संयोग से ये सीटें तीनों नगर निगमों की और हर इलाके की हैं। इसलिए यह चुनाव एक तरह से विधानसभा चुनाव के बाद और 2017 के निगम चुनाव से पहले सैंपल सर्वे का चुनाव बनने वाला है। दिल्ली सरकार के न चाहते हुए सीधे अदालत के फैसले से यह चुनाव हो रहा है।

इसे लेकर वैसे तो एक जनहित याचिका पर सुनवाई हुई लेकिन कांग्रेस ने इसमें सक्रिय भूमिका अदा की। प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन ने यह दावा भी किया कि सरकार को चुनाव करवाने के लिए मजबूर किया गया। लगातार दो विधानसभा और एक लोकसभा चुनाव में बुरी तरह से पिट गई कांग्रेस के पास इन 13 सीटों में एक भी नहीं थी। कांग्रेस को आप और भाजपा के मुकाबले खड़ा करने के लिए किसी भी चुनाव में जीत की संजीवनी का इंतजार है। इसके कारण राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है।

वैसे अब दिल्ली के तीनों निगमों की सीटों की संख्या 272 हो गई है। उस लिहाज से 13 सीटों के चुनाव का ज्यादा महत्त्व नहीं है लेकिन ये 13 सीटें दिल्ली के हर इलाके की हैं, इसलिए इसका महत्त्व ज्यादा है। इनमें पूर्वी दिल्ली नगर निगम की दो सीटें-झिलमिल और खिचड़ीपुर, उत्तरी नगर निगम की चार सीटें-वजीरपुर, शालीमार बाग, कमरूद्दीन नगर, बल्लीमारान और दक्षिणी दिल्ली नगर निगम की सात सीटें-मटियाला, भाटी, नानकपुरा, मुनीरका, नवादा, तेखंड और विकास नगर शामिल हैं। जिन तेरह पार्षदों के विधायक बनने से ये सीटें खाली हुई हैं उनमें छह भाजपा (विनोद कुमार बिन्नी बाद में शामिल हुए) के और सात आप के विधायक बने। आप के विधायक बने नेता अलग-अलग दलों से आप में आकर चुनाव लड़ कर विधायक बने। उपचुनाव आप के विधायकों के लिए भी इम्तिहान साबित होगा कि उनके अपने इलाके में कितनी लोकप्रियता है।

दिल्ली के मुख्य चुनाव आयुक्त राकेश मेहता ने कहा कि दिसंबर 2013 में नई सरकार बनने और थोड़े ही दिनों में राष्ट्रपति शासन लगने के कारण उन्होंने विधानसभा चुनाव की इंतजार करना तय किया। साल 2013 के विधानसभा चुनाव में निगम के छह पार्षदों के विधायक बनने से ये सीटें खाली हुई थीं। फरवरी 2015 में विधानसभा के मध्यावधि चुनाव में सात और पार्षद के विधायक बनने से सात और सीटें खाली हो गर्इं। उन्होंने अप्रैल में दिल्ली सरकार को उपचुनाव के लिए लिखा तो कहा गया कि अभी बजट आना बाकी है। जून 2015 में बजट आने के बाद से ही 13 सीटों के उपचुनाव करवाने के लिए आयोग दिल्ली सरकार के हरी झंडी के इंतजार में है।

हाई कोर्ट ने 29 जनवरी के फैसले में दिल्ली सरकार को चार हफ्ते तक चुनाव के लिए पैसे और कर्मचारी तो सरकार को ही मुहैया कराने के आदेश दिए। अदालत ने इसे आधार माना कि अभी आम चुनाव में डेढ़ साल से ज्यादा का समय है, इसलिए उप चुनाव करवाया जाना जरूरी है। निगम सीटों का परिसीमन का शुरू हो गया है। उसे अगले साल जुलाई तक पूरा किया जाना है। अगर उप चुनाव होने हैं तो उससे पहले करवाने चाहिए, अन्यथा सीटों का भूगोल और मतदाता बदल जाएंगे।

पिछले दो चुनावों से कांग्रेस की हर कोशिश के बावजूद भाजपा चुनाव जीतती रही है। 2007 में दिल्ली सरकार ने निगमों की सीटों को 138 से बढ़ाकर 272 कर दिया। 2012 में दिल्ली नगर निगम को तीन हिस्सों में बांट दिया गया। बावजूद इसके 2012 के चुनाव में भाजपा ने तीनों निगमों में जीत हासिल की। साल 2013 के विधानसभा चुनाव में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला। लेकिन पहली बार चुनाव लड़ रही आप ने कांग्रेस के समर्थन से 49 दिनों की सरकार चलाई। 2014 के लोक सभा चुनाव में दिल्ली की सातों सीटें भाजपा ने जीतीं। लेकिन 2015 के विधानसभा चुनाव में आप को 70 में से 67 सीटें मिली थीं। उस चुनाव ने दिल्ली के सारे परंपरागत राजनीतिक समीकरण ध्वस्त कर दिए थे। उसके बाद यह पहला ऐसा चुनाव होना है जिसमें साल भर पहले हुए विधानसभा चुनाव के बाद राजनीतिक दलों को अपने जनाधार का थाह मिल पाएगा।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories