दिल्ली जिमखाना क्लब में बनी ‘एम्पायर स्टोर’ और एक ‘छोटी बनिया दुकान’ जैसी अवैध इमारतों के निर्माण से लेकर प्रधानमंत्री आवास से सटी 1.99 एकड़ जमीन के प्रस्तावित अधिग्रहण तक, इस प्रतिष्ठित क्लब को पिछले छह दशकों में कई बार ध्वस्तीकरण और बेदखली के नोटिस दिए गए हैं।

हर बार मामला किसी ना किसी तरह सुलझा लिया गया। ‘अवैध निर्माणों’ को गिरा दिया गया, व्यावसायिक दुकानों को बंद कर दिया गया और प्रधानमंत्री आवास की सुरक्षा संबंधी चिंताओं के मामले में कुछ स्टाफ क्वार्टरों को दूसरी जगह शिफ्ट कर दिया गया।

जिमखाना क्लब और आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) के भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) के बीच हुए पत्राचार से पता चलता है कि सरकार ने पहली बार 1956 में नोटिस जारी किया था। इस नोटिस में क्लब से ‘अनधिकृत निर्माण’ हटाने को कहा गया था। धीरे-धीरे कथित अनधिकृत निर्माणों की सूची लंबी होती गई। L&DO ने साल 2000 में परिसर का ‘शांतिपूर्ण कब्जा’ लेने के आदेश जारी किए।

एक पत्राचार में क्लब ने स्वीकार किया कि इसके बाद क्लब को कई और नोटिस मिले। इनमें क्लब से कई अन्य अनधिकृत निर्माणों/उल्लंघनों को हटाने के लिए कहा गया।

29 सितंबर 2000 को लिखे एक पत्र में L&DO ने क्लब को इस बात के लिए फटकार लगाई कि उसने ना तो ‘उल्लंघनों’ को हटाया और ना ही जुर्माना अदा किया। पत्र में कहा गया, ”संबंधित लीज़ समझौते के अंतर्गत आने वाला पूरा भूखंड तथा उस पर स्थित सभी भवन, संरचनाएं, निर्माण और फिटिंग्स पट्टेदार के अधिकार में निहित हो जाएंगी।”

2004 में क्लब ने कुल 74.22 लाख रुपये का जुर्माना अदा किया जिसमें 38.16 लाख रुपये अनधिकृत निर्माण के लिए, 2.61 लाख रुपये एम्पायर स्टोर चलाने के लिए और 23.91 लाख रुपये ‘जंबो शॉप’ के लिए शामिल थे।

2008 में क्लब ने सरकार को जानकारी दी थी कि परिसर पर कभी ‘दोबारा कब्ज़ा’ नहीं किया था और दिल्ली हाई कोर्ट में दायर अपनी याचिका वापस ले ली है क्योंकि ‘रेगुलाइराइज़ेशन’ चार्ज का भुगतान कर दिया गया था। इसके बाद मामला सुलझा हुआ प्रतीत हो रहा था लेकिन इसके पांच साल बाद दिसंबर 2009 में L&DO ने क्लब को पत्र लिखकर सूचित किया कि वह ‘री-एंट्री’ आदेश वापस ले रहा है।

पत्राचार से पता चलता है कि 1956 के मूल नोटिस के बाद एम्पायर स्टोर को 1980 में ध्वस्त कर दिया गया था जबकि जंबो शॉप को 2001 में बंद कर दिया गया था। क्लब को साल 2001-2002 में प्रधानमंत्री आवास से सटी 1.99 एकड़ भूमि के ‘पुनः अधिग्रहण’ के लिए नोटिस मिले थे। यह मामला भी उच्च न्यायालय के समक्ष गया था और अंततः ‘अदालत के बाहर’ समझौते के जरिए सुलझा लिया गया। क्लब की बाहरी सीमा पर बने स्टाफ क्वार्टरों को ट्रांसफर कर दिया गया और ‘सुरक्षा क्षेत्र’ को सुरक्षित एवं खाली कराया गया।

रिकॉर्ड्स से पता चलता है कि 2001 में भूमि के ‘पुनर्ग्रहण’ संबंधी नोटिस मिलने के बाद 178 परिवारों/क्वार्टरों की एक सूची तैयार की गई थी। मई 2000 में नगर निगम ने उनके पुनर्वास के आदेश जारी किए जिसके तहत शिफ्टिंग प्रोजेक्ट की लागत 81.88 लाख रुपये आंकी गई। यह राशि क्लब ने अदा की और उस क्षेत्र को ‘ग्रीन बेल्ट’ में बदल दिया गया।

उस समय सरकारी वकील ने हाई कोर्ट से कहा था कि यह मान लेना मूर्खता होगी कि प्रधानमंत्री की सुरक्षा को दिल्ली जिमखाना क्लब के अधिकारियों के भरोसे छोड़ा जा सकता है।

मई 2001 में दिल्ली पुलिस के एक गोपनीय पत्र में कहा गया था, ”दिल्ली जिमखाना क्लब क्षेत्र में 150 से अधिक सर्वेंट क्वार्टर हैं जिन्हें रेस कोर्स रोड के सबसे पास होने के कारण सबसे संभावित खतरे वाले क्षेत्रों में माना गया है। इसलिए यह फैसला लिया गया है कि इन सर्वेंट क्वार्टरों को तत्काल हटाया जाना चाहिए।” पुलिस ने स्क्वैश कोर्ट की छत और स्टोर रूम्स को भी ‘छिपने के सुविधाजनक स्थान’ की कैटेगरी में रखा था।

पूर्व अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल विकास सिंह ने 2001-2002 में उच्च न्यायालय के समक्ष जिमखाना क्लब की ओर से पैरवी की थी। उन्हों याद करते हुए कहा, ”पहले भी प्रधानमंत्री की सुरक्षा का मुद्दा मंत्रालय द्वारा उठाया गया था और उसे सौहार्दपूर्ण तरीके से सुलझा लिया गया था। उस समय सरकार ने दिल्ली की बाहरी सीमा पर मोलरबंद में क्लब कर्मचारियों को वैकल्पिक भूमि दी थी जिन्हें अपने घर खाली करने के लिए कहा गया था। तब भी 2001 में 1928 की लीज़ की धारा 4 के तहत मुआवज़ा देने के आदेश जारी किए गए थे।”