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जोखिम के बीच बस चलाने को मजबूर चालक

कलस्टर बस सेवा के संवाहक हरीश कुमार बताते हैं कि वे नंदनगरी से रूट नंबर 261 बस से प्रतिदिन सवारियों को ले जा रहे हैं। सरकार की तरफ से चालकों को दस्ताने या सेनेटाइजर की कोई सुविधा नहीं दी जा रही है।

व्यवस्था के लिए मार्शल बेहद जरूरी बसें शुरू होने के बाद से ही बसों में मार्शल नहीं है।

पंकज रोहिला

कोरोना काल में सवारियों को संक्रमण से बचाने के लिए दिल्ली सरकार ने गाड़ियों में बैठने की सम-विषम व्यवस्था लागू की है, लेकिन बस चालक और संवाहक विषम परिस्थितियों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इनके पास न तो दस्ताने हैं और नहीं सेनेटाइजर। ये हाल कलस्टर व डीटीसी बसों का है। कुछ गाड़ियों में तो चालक खुद खरीदकर सेनेटाइजर व दस्ताने प्रयोग कर रहे हैं। वहीं, बसों से मार्शल हटने के बाद भीड़ नियंत्रण का जोखिम भी बढ़ गया है।

कलस्टर बस सेवा के संवाहक हरीश कुमार बताते हैं कि वे नंदनगरी से रूट नंबर 261 बस से प्रतिदिन सवारियों को ले जा रहे हैं। सरकार की तरफ से चालकों को दस्ताने या सेनेटाइजर की कोई सुविधा नहीं दी जा रही है। बस में भीड़ से संक्रमण का खतरा बना हुआ है। भीड़ को नियंत्रण में रखने के लिए चालकों ने अपनी सीट के पीछे बांस बंध ली है। राजघाट डिपो के चालक श्याम ने बताया कि सभी लोग बस में आने के बाद चालक सीट के पास खड़े हो जाते थे। इस डंडे की वजह से यह दूरी तय हो सकी है। अब सवारी को पहले की जगह पीछे दरवाजे से ही चढ़ाया व उतारा जा रहा है। उन्होंने बताया कि अब तक 8-9 घंटे की ड्यूटी थी, जो कोरोनाकाल में बढ़कर 12-14 घंटे हो गई है।

व्यवस्था के लिए मार्शल बेहद जरूरी बसें शुरू होने के बाद से ही बसों में मार्शल नहीं है। चालक सत्येंद्र शर्मा बताते हैं कि इस समय भीड़ को नियंत्रित करने के लिए मार्शल का बंदोबस्त फिर से होना चाहिए। ये बसों में रहेंगे तो तापीय परीक्षण बाद ही कोई बस में चढ़ पाएगा।

ठेका कर्मचारी बोले हमें कोई राहत भी नहीं होगी: ठेके पर काम कर रहे चालक व संवाहकों ने बताया कि कोरोना होने की स्थिति में हमें स्वास्थ्य लाभ मिलेगा या नहीं। इस पर भी संदेह है। दिल्ली सरकार किसी भी होमहार्ड को संक्रमण होने पर आर्थिक मदद करती है। सरकार को चाहिए कि ठेके पर काम कर रहे कर्मचारियों के लिए इस नियम को स्पष्ट करना चहिए। स्वास्थ्य बीमा और मुआवजे की व्यवस्था होनी चाहिए।

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