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नृत्यः पुराने किले की प्राचीर से ‘एकला चलो’

राजधानी दिल्ली में साहित्य कला परिषद की ओर से आयोजित होने वाला प्रतिष्ठित नृत्य समारोह है-पुराना किला नृत्य समारोह।
(File Pic)

राजधानी दिल्ली में साहित्य कला परिषद की ओर से आयोजित होने वाला प्रतिष्ठित नृत्य समारोह है-पुराना किला नृत्य समारोह। इसमें इस वर्ष संतोष नायर, गुरु सरोजा वैद्यनाथन, गुरु किरण सहगल, गुरु कुमुदिनी लाखिया और गुरुवनश्री राव की रचनाओं को प्रस्तुत किया गया। पुराने किले के प्रांगण में हुए समारोह का आगाज संतोष नायर और साध्या समूह के कलाकारों से हुआ। संतोष नायर की नृत्य परिकल्पना द्युत क्रीड़ा थी। नृत्य में महाभारत के कौरव और पांडवों के बीच के लंल को पद व अंग संचालन के जरिए बखूबी दर्शाया गया। नृत्य में द्रौपदी की भूमिका में नेहा शर्मा व शुकनी के पात्र को संतोष नायर ने प्रभावी अंदाज में निरूपित किया। कथकलि, छऊ और समकालीन नृत्य शैलियों का यह सुंदर संयोग था। प्रस्तुति का प्रकाश प्रभाव और संगीत प्रभावशाली था।

पांच दिवसीय समारोह की दूसरी प्रस्तुति नमामि गंगा थी। भरतनाट्यम नृत्य शैली में इस प्रस्तुति की परिकल्पना गुरु सरोजा वैद्यनाथन ने की। गणेश नाट्यालय के कलाकारों की इस पेशकश का आरंभ शिव स्तुति से हुआ। रचना ‘कालाग्नि रुद्राय नीलकंठाय’, रावण तांडव स्तोत्र व ‘तम भगवते साक्षात’, ‘जय जय गंगे’, ‘भगीरथ शिव शंकरम शंभू’ पर आधारित थी। नृत्य रचना में गंगा-भगीरथ, भगीरथ-शिव, गंगा-शिव संवाद को शामिल किया। नृत्य के अगले चरण में गंगा स्वच्छता अभियान के प्रयासों को नृत्य में शामिल किया गया ।

समारोह की अगली पेशकश ओडिशी नृत्यांगना किरण सहगल की शिष्याओं की थी। पल्लवी ओडिशी नृत्य संगीत विद्यालय की कलाकारों ने ओडिशी और समकालीन नृत्य शैली में अपने नृत्य को पिरोया। उनकी पेशकश का आरंभ दशावतार से किया। यह जयदेव की रचना ‘प्रलय पयोधि जले’ पर आधारित थी। यह गुरु पंकज चरणदास की नृत्य रचना थी। अगले अंश में गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की रचनाओं को नृत्य में पिरोया गया था। नृत्य रचना ‘बांशी’ गुरुदेव की रचना ‘जीवन नव नव’ पर आधारित थी। नृत्यांगनाओं ने ‘एकला चलो’ और ‘सावणेर गगने गाए’ को भी नृत्य में मनभावन अंदाज में पिरोया। एकला चलो नृत्य की प्रस्तुति के क्रम में मुखौटों और लोक नृत्य का मोहक प्रयोग किया गया।

कदंब सेंटर फॉर डांस एंड म्यूजिक के कलाकारों ने कथक शैली में नृत्य रचना विवर्त पेश की। यह विदुषी कुमुदिनी लाखिया की रचना थी। इसके गीत ‘निर तत्धंग’ की संगीत रचना पंडित मधुप मुद्गल ने तैयार की थी। समापन वनश्री राव और रास यूनाइटेड की प्रस्तुति से हुआ। इसमें त्रिपुरासुर संहार, भक्त मारकंडेय रक्षक शिव, अभिमन्यु वध व महिषासुर मर्दिर्नी शामिल थे। छऊ और भरतनाट्यम शैली में पहली पेशकश त्रिपुरासुर संहार में शिव और त्रिपुरासुर के संघर्ष को मोहक अंदाज में पेश किया गया। प्रस्तुति के लिए ‘वंदे पंचामुखम त्रिनेत्र ललाटं’ व ‘त्राहिमाम शरणागतम’ का चयन किया गया था।

दूसरी पेशकश में भक्त मारकंडेय की कथा का वर्णन था। इस प्रस्तुति के शुरू में 12 ज्योर्तिलिंग का सुंदर विवेचन पेश किया गया। साथ ही संगीत बहुत ही मनोहारी और कर्णप्रिय था। अभिमन्यु वध की प्रस्तुति के क्रम में चक्रव्यूह में फंसे अभिमन्यु और अन्य वीरों के लंल को छऊ नृत्य शैली के जरिए मोहक अंदाज में दर्शाया गया। वहीं द्रोण-अभिमन्यु संवाद करुण रस से नृत्य को परिपूरित करता नजर आया। प्रस्तुति के अंत में महिषासुर मर्दिर्नी पेश किया गया। यह पंडित जसराज के गाए ‘जय जय हे महिषासुरमर्दिर्नी’ के संगीत पर आधारित था। भरतनाट्यम, छऊ और कुचिपुड़ी नृत्य शैली में पिरोई गई यह प्रस्तुति रौद्र रस से पूर्ण थी। सभी कलाकारों का नृत्य और आंगिक अभिनय सहज, सरल और प्रभावकारी था।

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