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कमजोर अगुआई, पर कांग्रेस ने आस टिकाई

Delhi Assembly Elections 2020: केंद्रीय मंत्री रहे अजय माकन ने अध्यक्ष पद छोड़कर खुद ही अपने आप को नेतृत्व के मामले में किनारे कर लिया। सूत्र बताते हैं कि सूबे का नया प्रदेश अध्यक्ष तय करने के लिए हुई बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने माकन से उनके स्वास्थ्य के बहाने यह जानने की कोशिश की थी कि क्या वे दोबारा दिल्ली कांग्रेस की अगुआई को तैयार हैं, लेकिन माकन ने मना कर दिया।

Author नई दिल्ली | Updated: January 8, 2020 12:16 PM
दिल्ली कांग्रेस चीफ सुभाष चोपड़ा

अजय पांडेय

दिल्ली में लंबे समय तक सूबे में हुकूमत कर चुकी कांग्रेस सत्ता वापसी की जंग में है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि प्रदेश अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा या चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष कीर्ति आजाद के कमजोर नेतृत्व के सहारे कांग्रेस शून्य से आगे बढ़कर सत्ता का वह जादुई आंकड़ा कैसे हासिल करेगी।
कांग्रेस के पास किसी जमाने में एचकेएल भगत, जगदीश टाइटलर, सज्जन कुमार, दीपचंद बंधु, रामबाबू शर्मा और शीला दीक्षित जैसे चमकते चेहरे थे। लेकिन इनमें से कुछ दंगों की दाग की वजह से दागदार हो गए तो कुछ गुजर गए। शीला दीक्षित के व्यक्तित्व में दिल्ली के लोग किस कदर भरोसा करते थे इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अस्सी पार की उम्र में भी लोकसभा के चुनाव में खम ठोकर मैदान में उतरीं इस पूर्व मुख्यमंत्री ने आम आदमी पार्टी को पीछे धकेल कर दिल्ली में दूसरे नंबर पर अपनी जगह बना ली। लेकिन उनके गुजर जाने से कांग्रेस के सामने नए नेतृत्व को आगे बढ़ाने की चुनौती आ गई।

केंद्रीय मंत्री रहे अजय माकन ने अध्यक्ष पद छोड़कर खुद ही अपने आप को नेतृत्व के मामले में किनारे कर लिया। सूत्र बताते हैं कि सूबे का नया प्रदेश अध्यक्ष तय करने के लिए हुई बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने माकन से उनके स्वास्थ्य के बहाने यह जानने की कोशिश की थी कि क्या वे दोबारा दिल्ली कांग्रेस की अगुआई को तैयार हैं, लेकिन माकन ने मना कर दिया। दूसरी ओर शीला दीक्षित के पुत्र संदीप दीक्षित भी सामने आकर नेतृत्व संभालने को तैयार नहीं हुए। हालांकि पार्टी के कुछ नेता ऐसा कहते हैं कि यदि कांग्रेस हाईकमान ने दीक्षित को बुलाकर नेतृत्व संभालने की जिम्मेदारी दी होती तो शायद वे इनकार नहीं कर पाते।

सूत्रों की मानें तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने दिल्ली अध्यक्ष पद के लिए कीर्ति आजाद का नाम तय कर दिया था। लेकिन भाजपा से कांग्रेस में आए इस नेता के खिलाफ दिल्ली के जमीनी कांग्रेसी नेता इकट्ठे हो गए और पार्टी हाईकमान के सामने यह दलील दी कि भाजपा से कांग्रेस में आए आजाद को पार्टी कार्यकर्ता स्वीकार नहीं कर पाएगा और चुनावी साल में ऐसा करना ठीक नहीं होगा। ऐसे में किसी ऐसे नेता को यह जिम्मेदारी दी जाए जो सभी को एकसाथ लेकर चल सके।

परिणाम यह हुआ कि आखिरी क्षणों में आजाद का नाम अध्यक्ष पद से हटाकर अभियान समिति के प्रमुख के तौर पर तय हुआ और सुभाष चोपड़ा अध्यक्ष बनाए गए। दोनों को इस ताकीद के साथ दिल्ली की बागडोर सौंपी गई कि दोनों मिलकर कांग्रेस को मजबूत करेंगे। पंजाबी समाज से ताल्लुक रखने वाले चोपड़ा मजबूत व प्रभावशाली पंजाबी समाज को वापस लाएंगे तो पूर्वांचल के मतदाताओं को कीर्ति आजाद साधने का काम करेंगे।

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