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सिविक सेंटर पर कब्जे की होड़

दिल्ली नगर निगम का चुनावी बिगुल बज चुका है, लेकिन निगमों की हालत बेहद खराब है। मार्च में निगमों के चुनाव के बाद अप्रैल की पहली बैठक नए निगम की होगी, लेकिन अभी भी उत्तरी, दक्षिणी के साथ पूर्वी निगम में सिविक सेंटर पर कब्जा करने की होड़ लगी हुई है। वित्तीय संकट झेल रहे […]

Author नई दिल्ली | January 14, 2017 1:53 AM
कचरा

दिल्ली नगर निगम का चुनावी बिगुल बज चुका है, लेकिन निगमों की हालत बेहद खराब है। मार्च में निगमों के चुनाव के बाद अप्रैल की पहली बैठक नए निगम की होगी, लेकिन अभी भी उत्तरी, दक्षिणी के साथ पूर्वी निगम में सिविक सेंटर पर कब्जा करने की होड़ लगी हुई है। वित्तीय संकट झेल रहे दो निगमों में कर्मचारियों के वेतन से लेकर निगम फंड से होने वाले विकास कार्य और विधवा व विकलांग पेंशन तक के लाले पड़े हुए हैं। अपनी लंबित मांगों को लेकर सफाई कर्मचारी लगातार हड़ताल कर रहे हैं और उधर वाहवाही बटारने के लिए अत्याधुनिक तकनीक से अवैध निर्माण रोकने के लिए ऐप का सहारा लिया जा रहा है। कैशलेस ट्रांजैक्शन के साथ कचरा प्रबंधन संयंत्र जैसी योजनाएं लाकर निगम पदाधिकारी और अधिकारी खोई प्रतिष्ठा वापस पाने की जुगत में लगे हुए हैं। विपक्ष का अलग रोना है। तीनों निगमों में विपक्ष साफ तौर पर भाजपा शासित निगम की दुर्व्यवस्था पर चोट करने से बाज नहीं आ रहा। आयुक्त की अपनी दलील है और वे खुद को बढ़-चढ़कर बजट प्रस्ताव लाने से महरूम नहीं करना चाहते। 

मार्च का मुकाबला खास
दिल्ली नगर निगम के चुनाव मार्च के अंत तक होने हैं। तीनों निगमों में सत्तासीन भाजपा, कांग्रेस, बसपा और अन्य छोटी पार्टियों के साथ इस बार सबसे ज्यादा चुनौती आम आदमी पार्टी (आप) दे रही है। पिछले साल निगम की 13 सीटों पर हुए उपचुनाव में आप ने पांच सीट पर आसानी से जीत दर्ज कर यह संकेत दे दिया था कि निगम चुनाव में वह बढ़-चढ़कर भाग लेगी। उपचुनाव की 13 सीटों में कांग्रेस ने निर्दलीय मिलाकर पांच सीटें, भाजपा ने तीन और आप ने पांच सीटें जीतीं। 2012 के पिछले चुनाव में तीनों निगमों की 272 सीटों में भाजपा को 138, कांग्रेस को 77, बसपा को 15, लोकजनशक्ति पार्टी को एक, निर्दलीयों को 24, इंडियन नेशनल लोकदल को तीन, नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी को छह, जनता दल यू को एक और समाजवादी पार्टी को दो सीटें मिली थीं। तब आप वजूद में नहीं थी और इस समय उसने सभी पार्टियों की नाक में दम कर रखा है। इसलिए इस साल का निगम चुनाव कई मायनों में चौंकाने और चुनौती देने वाला है।
बंटवारे से बढ़ा बवाल
साल 2012 में तीन हिस्सों में बंटे निगमों की खस्ता हालत ने कई बार इस निकाय की महत्ता और उपयोगिता पर सवालिया निशान लगाए हैं। पिछले चुनाव में कुल 36 फीसद वोट पाकर जिस तरह से भाजपा निगम में सत्तासीन हुई, उसके उलट खुद भाजपा के लिए ही इस बार का चुनाव चुनौती भरा होने वाला है। साल 2016 बीतते-बीतते जिस तरह पूर्वी नगर निगम ने खुद के सिविक सेंटर में जाने का प्रस्ताव पास किया, उससे निगम विभाजन पर ही सवालिया निशान लगने शुरू हो गए। जिन उद्देश्यों को लेकर निगम का विभाजन किया गया था उनमें अब तक कोई भी पूरा नहीं हुआ। दिल्ली सरकार के समानांतर काम कर रहे नगर निगम सालों तक तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को अखरते रहे थे। निगम को सरकार के अधीन लाने की कवायद पर जब केंद्र सरकार राजी नहीं हुई तो निगम की सीटें 138 से बढ़ाकर 272 कर दी गर्इं और निगम पार्षदों की हैसियत कम कर निगम पुनर्गठन के लिए कई समितियां बना दी गर्इं। इससे दीक्षित को निगम पर नियंत्रण तो नहीं मिला, लेकिन 2012 में निगम को तीन भागों में बांट कर इसके मूल उद्देश्यों का बंटाधार कर दिया गया।
लौट आए सिविक सेंटर
पूर्वी दिल्ली नगर निगम की स्थायी समिति के अध्यक्ष जितेंद्र चौधरी का मानना है कि निगम को तीन करोड़ रुपए हर साल रखरखाव के लिए डीएसआइडीसी को देने पड़ते हैं। लिहाजा निगम ने फैसला किया है कि जब तक नया मुख्यालय नहीं बन जाता तब तक इसे भी सिविक सेंटर में स्थानांतरित कर दिया जाए ताकि रखरखाव का पैसा बचाकर निगम के विकास में लगाया जाए। वहीं पूर्वी निगम के उपमेयर राजकुमार ढिल्लो का मानना है कि पूर्वी निगम शुरू से ही आर्थिक तंगी में रहा है। मौजूदा समय में दक्षिणी निगम पर उत्तरी निगम के करीब आठ सौ करोड़ के बकाए पर भी खुलेआम विरोध जताया जा रहा है। दक्षिणी निगम की अपनी दलील है। उसके पदाधिकारी का कहना है कि जिस समय सिविक सेंटर बना था उस समय दिल्ली में एक ही नगर निगम था। फिर किराया देने जैसी बातें क्यों हो रही हैं।
नकदी और पेपर रहित
दक्षिणी निगम ने पेपर रहित होने का फैसला किया है। इस योजना के तहत सबसे पहला आइपैड नेता सदन सुभाष आर्य को दिया गया। इसके बाद स्थायी समिति के अध्यक्ष और सभी पार्षदों को भी आइपैड बांटे गए। स्थायी समिति और सदन की आगामी बैठकों में सभी एजंडे आइपैड पर ही पास होंगे। अगले तीन सालों में कागजों पर होने वाले खर्च में लगभग 4 करोड़ रुपए की बचत होगी और पर्यावरण को बचाने में भी मदद मिलेगी। इसके अलावा अवैध निर्माण से निपटने के लिए उत्तरी नगर निगम ने ऐप का सहारा लेने पर जोर दिया है। इसके लिए निगम ने वेब आधारित ऐप्लिकेशन जारी किया है जिसमें लोग किसी भी तरह के अनधिकृत निर्माण की शिकायत कर सकते हैं। इसके बाद निगम शिकायतों की जांच और उन पर कार्रवाई करेगा।
सफाई, हड़ताल और वेतन
दक्षिणी निगम ने भी चौका मारते हुए पेंशन पा रहे लोगों के लिए आधार कार्ड की अनिवार्यता खत्म करने की घोषणा की है। यह घोषणा और दावा ऐसे समय में किया जा रहा है जब देश की राजधानी होने के बावजूद दिल्ली में चारों ओर डेंगू और कई बीमारियां फैली हुई हैं। जिन पर दिल्ली को साफ रखने की जिम्मेदारी है वे अपनी लंबित मांगों को लेकर हड़ताल पर हैं। उपराज्यपाल, मुख्यमंत्री, मेयर और आयुक्त के दफ्तर पर सफाई कर्मचारियों का प्रदर्शन हो चुका है। उनकी मुख्य मांगों में देरी से लागू हुए सातवें वेतन आयोग का एरिअर और बोनस बढ़ाकर देने, दिल्ली सरकार के बढ़ाए न्यूनतम वेतन आयोग को तुरंत लागू करने, निगमों की खस्ता हालत को देखते हुए केंद्र सरकार से विशेष आर्थिक पैकेज दिलाने, तीनों निगमों में स्थायी किए गए सफाई कर्मचारियों को बकाया वेतन तुरंत देने, शिक्षा विभाग में तैनात चौकीदारों की ड्यूटी हर 8 घंटे की शिफ्ट में करने, तीनों नगर निगमों का एकीकरण करने, सफाई के काम में ठेकेदारी प्रथा बंद करने, सभी निगम कर्मचारियों को कैशलेस मेडिकल कार्ड मुहैया कराने, दिल्ली की जनसंख्या के हिसाब से कर्मचारियों की भर्ती किया जाना शामिल हैं। दिल्ली हाई कोर्ट ने भी सफाई कर्मचारियों की हर महीने देर से मिलने वाली तनख्वाह पर सख्त रुख अपनाया। कोर्ट ने आदेश दिया है कि सफाई कर्मचारियों को हर महीने की 7 तारीख तक वेतन मिल जाना चाहिए।
दावे और आरोप
निगमों में विपक्ष के नेताओं के अपने दावे और आरोप हैं। उत्तरी निगम में विपक्ष के नेता मुकेश गोयल, दक्षिणी निगम में फरहाद सूरी और पूर्वी निगम की वरयाम कौर का कहना है कि भाजपा ने पिछले पांच सालों में निगम का बंटाधार कर दिया है। निगमों की आर्थिक तंगी को वित्तीय कुप्रबंधन का नतीजा बताते हुए इन नेताओं ने कहा कि निगम ने दो साल से वेज एंड मींज लोन की किस्त अदा नहीं की, तीसरे साल भी कर्ज का भुगतान न करना पड़े, इसके लिए निगम छूट मांग रहे हैं। निगम 314 करोड़ रुपए का और वेज एंड मींज लोन ले रहे हैं। इसके बावजूद निगम के कर्मचारियों को समय पर वेतन नहीं मिल रहा और उन्हें हड़ताल करनी पड़ रही है। पेंशनभोगियों को समय से पेंशन नहीं मिल रही। पैनल अस्पतालों में पेंशनरों का कैशलेस इलाज नहीं हो रहा क्योंकि अस्पतालों के पिछले बिलों का भुगतान नहीं हुआ। निगम में हजारों पद खाली पड़े हैं, उन्हें भी धन के अभाव में भरा नहीं जा रहा, कर्मचारियों के पेंशन फंड और जीपीएफ से कई सौ करोड़ रुपए वेतन पर खर्च कर दिए गए हैं। सेवानिवृत्त कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति के दिन पेंशन, ग्रेच्युटी, लीव एनकैशमेंट तो क्या, जीपीएफ की राशि तक नहीं दी जा रही और आयुक्त दावा करते हैं कि निगम की वित्तीय स्थिति में सुधार हो रहा है।
प्रस्तुति : अमलेश राजू

वृद्धों, अनाथों व विधवाओं की पेंशन का भुगतान रोक दिया गया है, विधवाओं की पुत्रियों के विवाह के लिए अनुदान राशि का भुगतान नहीं हो रहा, पार्षदों को अपने क्षेत्रों में सड़कों की छोटी-मोटी मरम्मत के लिए फंड जारी करने के लिए अधिकारियों के कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं और आयुक्त निगम की वित्तीय स्थिति में सुधार का दावा कर रहे हैं।
परिसीमन का सवाल
निगमों में चुनाव की तैयारी जोरों पर है। निगम के वार्डों के परिसीमन का अंतिम मसौदा पास नहीं होने से सभी दल पसोपेश में हैं। दिल्ली कांग्रेस ने धमकी तक दे दी है कि अगर आप सरकार अगले कुछ दिनों में निगम के वार्डों के परिसीमन का अंतिम मसौदा तैयार करने में नाकाम रहती है तो वह अदालत जाएगी। कांग्रेस ने आप सरकार पर वार्डों के परिसीमन के अंतिम मसौदा आदेश पर कुंडली मार कर बैठने का आरोप लगाते हुए कहा है कि आप को निगम चुनावों में हार का डर है, इसलिए वह अप्रैल में होने वाले चुनाव में देरी कराने के लिए इसे दबाए बैठी है।
प्रस्तुति : अमलेश राजू

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