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जनलोकपाल बिल पास, पर AAP सरकार के विधायकों का भविष्य अधर में?

दिल्ली जनलोकपाल बिल विधानसभा में शुक्रवार को पास हो गया। गुरुवार को पास हुए दिल्ली के विधायकों के वेतन और भत्ते बढ़ने वाले विधेयक की तरह लोकपाल बिल भी मंजूरी के लिए केंद्र सरकार को भेजा जाएगा।

Author नई दिल्ली | Updated: December 5, 2015 12:31 PM
अरविंद केजरीवाल।

दिल्ली जनलोकपाल बिल विधानसभा में शुक्रवार को पास हो गया। गुरुवार को पास हुए दिल्ली के विधायकों के वेतन और भत्ते बढ़ने वाले विधेयक की तरह लोकपाल बिल भी मंजूरी के लिए केंद्र सरकार को भेजा जाएगा। माना जा रहा है कि जिस तरह नियमों को दरकिनार कर बिल सदन में लाए और पास करवाए गए, उसे अपनी प्रतिकूल टिप्पणी के साथ उपराज्यपाल राष्ट्रपति को भेजेंगे और फिर सालों ये बिल लटके रहेंगे।

माना जा रहा था कि विधायकों के वेतन और भत्ते वाले बिल में कानून का पालन किया गया है। लेकिन सूत्रों के मुताबिक उस बिल को पेश करने की केंद्र से इजाजत मांगने की अर्जी राजनिवास में आई थी। लेकिन इजाजत ली नहीं गई। जनलोकपाल बिल के लिए तो कोई औपचारिकता ही नहीं की गई है।

पिछली बार 13 फरवरी 2014 को इसी बिल के दूसरे रूप को बिना केंद्र की अनुमति विधानसभा में पेश करने से रोकने के लिए उपराज्यपाल ने विधानसभा को संदेश भेजा। इससे नाराज होकर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस्तीफा दे दिया था। इस बार ऐसा न होने पर बताया जा रहा है कि पिछली बार विधानसभा में गैर कानूनी काम होने की रिपोर्ट उपराज्यपाल को दिल्ली के मुख्य सचिव ने भेजी थी। इसलिए उपराज्यपाल ने उस पर संज्ञान लिया। इस बार राजनिवास को कोई रिपोर्ट नहीं मिली। इसका एक कारण तो केंद्र की भाजपा सरकार के दिल्ली की आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार से अभी टकराव न लेने की नीयत मानी जा रही है, दूसरे दिल्ली के मौजूदा उपराज्यपाल को दिल्ली सरकार ने एक तरह से पैदल कर रखा है। बताते हैं कि उनके पास तबादलों-तरक्की तक की नियमित फाइलें नहीं जा रही हैं।

इस सत्र में जनलोकपाल के अलावा नौ बिल पास किए गए। किसी भी बिल को पेश करने से पहले उसकी केंद्र सरकार से मंजूरी नहीं ली गई। दिल्ली के विधान (जीएनसीटी एक्ट) में साफ लिखा है कि कोई भी बिल जिसमें सरकारी मद से पैसा जा रहा हो उसकी पूर्व अनुमति उपराज्यपाल के माध्यम से केंद्र सरकार से लेना जरूरी है। ट्रांजेक्शन आॅफ बिजनेस रूल की धारा 55 (1ए) और 55 (1बी) में भी यही लिखा है। दिल्ली में तो बिना केंद्र की अनुमति के जनलोकपाल पास होना इसलिए भी संभव नहीं है कि केंद्र सरकार में 2013 से लोकपाल कानून काम कर रहा है। दिल्ली केंद्रशासित प्रदेश है। दिल्ली के सरकारी कर्मचारियों पर वही कानून लागू होते हैं जो केंद्र सरकार में लागू होते हैं। ऐसा कोई कानून दिल्ली विधानसभा नहीं बना सकती है जो केंद्र के कानून को ओवरलैप करे।

दिल्ली के विधायकों के वेतन और भत्ते बढ़ाने का मामला भी आम आदमी के गले नहीं उतर रहा है। आम जनता के बीच आम जन जैसा रहने के वायदे से जन सेवा करने आए इन जन सेवकों को किसी अन्य नौकरी पेशा वालों की तरह वेतन क्यों चाहिए? क्या विधायक बनने से पहले उन्हें इसकी जानकारी न थी कि विधायकों को वेतन भत्ते समेत कुल 88 हजार रुपए हर महीने मिलते हैं। इतने पैसे दिल्ली के पांच फीसद परिवारों को भी नहीं मिलते हैं। फिर दिल्ली नगर निगमों के पार्षदों को वेतन देने की बात गंभीरता से क्यों नहीं उठनी चाहिए जिन्हें वेतन तो मिलता ही नहीं और बैठकों के लिए केवल तीन सौ रुपए प्रति बैठक की दर से भत्ता मिलता है।
विधायकों के वेतन बढ़ाने वाली कमेटी के प्रमुख पीडीटी आचार्य का कहना था कि संविधान में समय-समय पर जन प्रतिनिधियों के वेतन भत्ते भढ़ाने का प्रावधान है। पिछली बढ़ोतरी नवंबर 2011 में हुई थी। महंगाई और दूसरी जरूरतों को ध्यान में रख कर ये बढ़ोतरी प्रस्तावित की गई। इसी तरह की सफाई विधानसभा में उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने दी और बाहर आप के नेता दे रहे थे। यह कहना अजीब है कि वेतन भत्ते बढ़ने से विधायक भ्रष्टाचार नहीं करेंगे।

इस पर तो अनेक लोग सहमत हैं कि एक विधायक को लोगों के काम के लिए लगातार फोन करने पड़ते हैं, उसके लिए उन्हें आठ हजार रुपए हर महीने देने का प्रावधान था। इलाके के लोग विधायक के घर या दफ्तर पर आते हैं तो उनपर चाय-पानी का खर्च होता है, उसके लिए पहले ही 18 हजार रुपए हर महीने का प्रावधान था। उसे कुछ बढ़ाया जाए लेकिन वह 50 हजार हो जाए यह सही नहीं लगता। लोगों के लिए चिट्ठी लिखने आदि के लिए पहले ही दो अंशकालिक कर्मचारियों के लिए 30 हजार रुपए का प्रावधान था। उसे 70 हजार करने की सिफारिश की गई है। इसके अलावा दिल्ली के आला अफसरों को हर महीने दो सौ लीटर पेट्रोल के पैसे दिए जाते हैं, वह विधायकों को भी दिए जाएं।

बिजली-पानी बिल के पहले चार हजार रुपए मिलते थे, वह दिए जाएं। मूल वेतन को 12 हजार से बढ़ाकर न केवल 50 हजार किया गया है बल्कि उसके साथ दफ्तर का 25 हजार किराया, दफ्तर के फर्नीचर के लिए एक लाख रुपए, लैपटाप के लिए एक लाख रुपए तो सालान यात्रा पर तीन लाख रुपए आदि शामिल हैं। पहले भी कार खरीदने के लिए मामूली ब्याज पर चार लाख कर्ज मिलता था अब उसे 12 लाख करने की सिफारिश की गई है। विधानसभा चलने पर हर रोज के भत्ते दो हजार रुपए और पेंशन दो गुणा किया गया।

नियमों को देखते हुए तो लगता ही नहीं कि कोई बिल पास होकर कानून बन पाएगा। अगर बिल पास करवाना है तो दिल्ली सरकार को कोई बीच का रास्ता खोजना होगा। उसमें केंद्र सरकार के रूख पर काफी कुछ निर्भर करेगा। अभी तो यही लग रहा है ये बिल कानून कम राजनीति का हथियार ज्यादा बनेंगे।

 

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