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मेडिक्‍लेम के भुगतान में हो देरी तो मिलेगा ब्‍याज, कंज्‍यूमर कमीशन का बड़ा फैसला

महाराष्ट्र उपभोक्ता आयोग ने एक मामले में फैसला सुनाया है कि अगर मेडिक्लेम के भुगतान में देरी होती है तो पॉलिसी होल्डर ब्याज का दावा ठोक सकता है। एक महिला ने ओवरी की सर्जरी कराई थी, जिसके लिए करीब तीन साल बाद उसे इसमें खर्च किए गए 1.7 लाख रुपये की प्रतिपूर्ति की गई।

तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: pixabay)

मेडिक्लेम पॉलिसी होल्डर्स के लिए अच्छी खबर है। महाराष्ट्र उपभोक्ता आयोग ने एक मामले में फैसला सुनाया है कि अगर मेडिक्लेम के भुगतान में देरी होती है तो पॉलिसी होल्डर ब्याज का दावा ठोक सकता है। टीओआई की खबर के मुताबिक एक महिला ने ओवरी की सर्जरी कराई थी, जिसके लिए करीब तीन साल बाद उसे इसमें खर्च किए गए 1.7 लाख रुपये की प्रतिपूर्ति की गई। मामले को लेकर आयोग ने कहा कि महिला राशि पर 9% ब्याज की हकदार है। जबकि न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड ने शुरू में दावे को ठुकरा दिया लेकिन 2013 में एक बीमा लोकपाल के द्वारा उसके पक्ष में फैसला सुनाने के बाद उसे आखिरकार यह पैसा मिला। एक जिला फोरम के आदेश को एक तरफ करते हुए महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने कहा कि सभी तथ्यों पर उचित तरीके से विचार नहीं किया और गलत तरीके से यह माना गया कि शिकायतकर्ता ने अपने दावे की पूर्ण और अंतिम संतुष्टि के लिए राशि स्वीकार कर ली है, इसलिए वह लागत और मुआवजे के साथ उस राशि पर ब्याज पाने की हकदार नहीं थी।

राज्य उपभोक्ता आयोग ने कहा, ”विपक्षी (न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड) ने यह दिखाने के लिए रिकॉर्ड पर कोई दस्तावेज पेश नहीं किया कि शिकायतकर्ता को उसके दावे की पूर्ण और अंतिम संतुष्टि के लिए राशि प्राप्त हुई थी, इस प्रकार लागत और मुआवजे के साथ उस राशि पर ब्याज पाने के उसके अधिकार को माफ कर दिया। जैसा कि उसने लगभग तीन वर्षों के बाद यह राशि प्राप्त की है, उस राशि पर वह ब्याज पाने की हकदार है।” आयोग ने न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को शिकायत के मुआवजे और लागत के रूप में उसे 30,000 रुपये का भुगतान करने का भी आदेश दिया।

महिला ने राज्य आयोग के समक्ष 2017 में एक जिला फोरम द्वारा दिसंबर 2016 में उसकी शिकायत खारिज किए जाने के बाद अपील की थी। उसने बताया कि वह 26 और 30 अप्रैल 2011 के बीच अस्पताल में भर्ती थी, जहां उसकी ओवरी की सर्जरी हुई थी। महिला ने बताया कि 15 अक्टूबर 2013 को उसका दावा खारिज होने के बाद एक बीमा लोकपाल ने बीमा कंपनी को उसे राशि का भुगतान करने का आदेश दिया था। महिला ने दिसंबर 2013 में कंपनी से चेक प्राप्त किया था। उसने चेक भुना लिया था। फिर, फरवरी 2014 में, उसने बीमा कंपनी को एक पत्र लिखा जिसमें आरोप लगाया कि उसके दावे की प्रतिपूर्ति तीन साल बाद हुई, इसके लिए वह लागत और मुआवजे के साथ अपने दावे की राशि पर ब्याज पाने की हकदार है। जब इंश्योरेंस कंपनी ने इसके लिए इनकार किया को महिला ने कंज्यूमर कम्पलेंट कर दी।

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