बेटियों का कत्ल और कठघरे में अल्ट्रासाउंड

केंद्रीय महिला व बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने भले ही लिंग जांच अनिवार्य करने संबंधी बयान वापस ले लिया है। लेकिन भ्रूण का लिंग परीक्षण बीच बहस में आ ही चुका है।

प्रतीकात्मक तस्वीर

केंद्रीय महिला व बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने भले ही लिंग जांच अनिवार्य करने संबंधी बयान वापस ले लिया है। लेकिन भ्रूण का लिंग परीक्षण बीच बहस में आ ही चुका है। चिकित्सा जगत के कुछ लोग इसे क्रांतिकारी कदम करार देते हुए इसके पक्ष में खड़े हैं तो कुछ इससे महिला उत्पीड़न और भ्रूण हत्या बढ़ने की आशंका जता रहे हैं। इस बीच हाई कोर्ट ने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की याचिका पर सुनवाई करते हुए अल्ट्रासोनोग्राफी करने वाले डाक्टरों के हक में फैसला दिया है जिसमें अल्ट्रसाउंड मशीनों के लिए डाक्टरों को परीक्षा न देने सहित कुछ रियायत दी है।

इस बीच तमाम चिकित्सकों ने भी अल्ट्रासाउंड की मशीनें चलाने की हर डाक्टर को अनिवार्यता की वकालत की है।
चिकित्सा में तकनीक के उपयोग को बढ़ा कर बेहतर नतीजे देने की वकालत करते डाक्टर जहां इसके पक्ष में हैं वहीं समाजशास्त्री व महिला मुद्दों पर काम कर रहे महिला संगठनों ने बढ़ती तकनीक को खतरनाक बताते हुए इसके खिलाफ आवाज बुलंद करने और मौजूदा कानून के हिसाब से प्रावधानों को अमल में लाने के उपाय करने पर बल दिया है।

एम्स की स्त्रीरोग विशेषज्ञ और प्रवक्ता डॉक्टर नीरजा भाटला का कहना है कि लिंग परीक्षण अनिवार्य करना अच्छा है। लेकिन इसे लागू करना व्यावहारिक कदम नहीं होगा क्योंकि देश की जो मौजूदा हालत है उसमें संसाधनों व विशेषज्ञों के लिहाज से सुरक्षित प्रसव कराना ही एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में हर गर्भ का अनिवार्य रूप से परीक्षण कर उस पर कौन निगरानी रखेगा? इसके लिए तो बहुत बड़े पैमाने पर संसाधन व विशेषज्ञ चाहिए।

प्रगतिशील महिला संठन की महासचिव व पेशे से वकील पूनम कौशिक ने कहा कि पहले तो भ्रूण हत्या के मामले दर्ज ही नहीं होते। अगर दर्ज हो भी जाएं तो उसमें सजा हो पाना उससे भी बड़ी चुनतौती है। मेडिकल लैंसेट के आंकड़ों के मुताबिक, 1980 से 2010 के बीच देश में एक करोड़ 20 लाख कन्या भ्रूण की हत्या की गई। लेकिन भारतीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, देश भर में पीसीपीएनडीटी एक्ट के तहत केवल 120 मामले दर्ज हुए जिसमें सजा केवल पांच मामलों में ही हो पाई है। महिला संगठनों का मानना है कि अच्छे डाक्टरों के लिए तो ठीक है, पर बड़े पैमाने पर मशीनें खरीदे जाने व जांच की छूट देने से स्थिति और बिगडेÞगी। इसके लिए कड़ी निगरानी जरूरी है।

लिंग परीक्षण अनिवार्य करने व हाई कोर्ट की ओर से अल्ट्रासाउंड करने के प्रावधानों में छूट मसले का फेडरेशन आॅफ आब्स्टैÑक्ट गायनकालजिस्ट्स आॅफ इंडिया (फोग्सी) की अध्यक्ष डॉक्टर अलका कृपलानी ने समर्थन किया है। उन्होंने क हा है कि यह कदम क्रांतिकारी है। जब सबको मालूम हो जाएगा कि गर्भ में लड़की है तो चोरी छुपे इसका गर्भपात संभव नहीं होगा। गर्भधारण करनेवाले परिवार को यह बताना होगा कि लड़की का क्या हुआ। इससे गर्भवती महिला को चिकित्सा जगत का सहयोग मिलेगा। सबको पता है कि कौन लिंग जांच कर रहा है। मशीनरी का कड़ाई से पालन हो और मजबूत इच्छाशक्ति हो तो इसे रोकना मुश्किल न होगा। यही दलील उन्होंने कोर्ट के हाल में आए फैसले के संदर्भ में भी दी। कहा कि इस आदेश से तमाम उन डाक्टरों को राहत मिलेगी जिसका लिंग परीक्षण से कोई लेना-देना नहीं था। फिर भी उन्हें अल्ट्रासाउंड मशीन खरीदने या उसके पंजीकरण से लेकर उपयोग तक में उत्पीड़न का सामना करना पड़ता था।

सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की निदेशक डॉक्टर रंजना कुमारी का कहना है कि इससे महिलाओं पर दबाव बढ़ेगा और भ्रूण हत्या भयावह रूप से बढ़ जाएगी। डॉक्टर कुमारी के तर्क हैं कि लिंग पता नहीं होने से तो कुछ लड़कियां लड़क़ा पैदा होने के उम्मीद में जन्म ले पाती हैं। जब पहले से ही पता चल जाए कि लड़की ही है तब तो परिवार महिला पर दबाव डालेगा ही कि गर्भ गिरा दे। या जिनकी एक या दो लड़की पहले से है, तब तो खुद महिला भी चाहेगी कि उसका समाज व घर में रहना दूभर न हो इसलिए लड़की का गर्भ गिर ही जाए। कहीं और जांच कराने के बाद गर्भपात कहीं दूसरी जगह से करवा लिया जाएगा।

अगर पता चल जाएगा तो कमाई के लालच में कोई भी नीम-हकीम कोई भी दवा लाकर दे देगा जो महिलाओं के लिए जानलेवा हो सकता है। जब सरकार चोरी-छिपे यह काम कर रहे कुछ हजार डॉक्टरों पर निगरानी नहीं रख पा रही है तो लाखों की तादाद में होने वाले प्रसव को कहां तक मानीटर किया जा सकेगा। देश में कुपोषण, संक्रमण व खराब हालत के कारण भी महिलाओं का गर्भपात हो जाता है। ऐसे में गर्भ अगर महिला की इच्छा के बिना ही गिराया गया तो वह महिला कहां व कैसे साबित करेगी कि उसने गर्भपात नहीं कराया। हमें मौजदूा तंत्र को कसना होगा। लोगोें को ही नहीं तमाम नोडल अफसरों तक को इनके अधिकारों का पता नहीं होता। संबंधित अधिकारियों की बैठक तक नहीं होती। नोडल अफसरों की कोई नहीं सुनता। प्रधानमंत्री को चाहिए की बेटी बचाओ अभियान के तहत इस पर ध्यान केंद्रित करें और इसी पर पैसे खर्च करें। जान जोखिम में डालकर हम जिन्हें पकड़ते हैं वे ऊंची रसूख के कारण छूट जाते हैं।

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने भी प्रसव पूर्व लिंग परीक्षण का समर्थन किया है। इसके साथ ही आएएमए की ओर से दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने अल्ट्रासाउंड जांच के पहले यह जांच करने वाले डाक्टरों को परीक्षा पास करने की अनिवार्यता खत्म करने सहित कई प्रावधान किए हैं। इसे आइएमए अपनी जीत करार दे रहा है। इसके महासिचिव डाक्टर केके अग्रवाल ने बताया कि पेट के ऊपरी हिस्से का अल्ट्रासाउंड करने वालों को भी पीसीपीएनडीटी के बाहर कर दिया गया है। हालांकि कुछ शर्तों के साथ यह रियायत दी गई है। हृदय और दूसरी बीमारियों के डाक्टर इसका उपयोग आसानी से कर सकेंगे।

दुरुपयोग के बारे में इनका मानना है कि वे जो पहले लिंग जांच करते थे वे अब भी करेंगे।

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