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कहां गए वो लोग जो अपनों के खिलाफ भी मोर्चा लेते थे? जब अटल सरकार के पीछे पड़ गए थे दत्तोपंत ठेंगड़ी

अटल सरकार की विनिवेश नीति के पीछे पड़ गए थे दत्तोपंत ठेंगड़ी। देना पड़ा था यशवंत सिन्हा को वित्त मंत्री के पद से इस्तीफा।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और दत्तोपंत ठेंगड़ी। (एक्सप्रेस आर्काइव)

कहां गए वे लोग जो सत्य और अपने विश्वास के लिए किसी से भी टकरा सकते थे। अपनों से भी। ऐसी ही एक हस्ती थे, मजदूर नेता, आरएसएस प्रचारक, विचारक और सांसद दत्तोपंत ठेंगड़ी। और तो और, एक मर्तबा वे अपने साथी और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से ही भिड़ गए थे। ऐसा था उनका सत्याग्रह।

अप्रैल 2001 की बात है। दिल्ली के रामलीला मैदान में आहूत विशाल रैली में ठेंगड़ी मुक्त बाज़ार व्यवस्था को लेकर तत्कालीन अटल सरकार के रुख को चुनौती देने में जुटे थे।

आरएसएस से जुड़े भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) की इस रैली में सत्तर साल पार कर चुके ठेंगड़ी सीधे तत्कालीन वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा की खबर ले रहे थे। उन्होंने अपने भाषण में कहा कि विभिन्न सेक्टर्स को एफडीआइ (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) के लिए खोलना एक आपराधिक कृत्य है। इस लांछन पर सिन्हा तिलमिला उठे और उन्होंने अटल के पास जाकर इस्तीफे की पेशकश कर दी। अटल ने उनकी बात स्वीकार नहीं की। यशवंत वित्त मंत्री बने रहे। लेकिन ठेंगड़ी मुलायम नहीं पड़े और वे सिन्हा पर दबाव बढ़ाते चले गए। और, सिन्हा को एक साल बाद वित्त मंत्री का पद छोड़ना ही पड़ा।

ठेंगड़ी के निशाने पर सिन्हा के अलावा विनिवेश मंत्री अरुण शौरी भी थे। मामला यह था कि विभिन्न पीएसयू का विनिवेश कैसे हो। सिन्हा और शौरी यह काम रणनीतिक बिक्री यानी स्ट्रैटजिक सेल के माध्यम से करना चाहते थे। ठेंगड़ी विनिवेश के खिलाफ नहीं थे। वे बस इतना चाहते थे कि यह काम पीएसयू को स्टॉक मार्केट में सूचीबद्ध करके किया जाए।

आज सार्वजनिक उपक्रमों के विनिवेश पर सरकार का रुख वही हो गया है, जिसकी ठेंगड़ी मुखालफत करते थे। ठेंगड़ी अब नहीं है। 1920 में जन्मे इस दिग्गज संघ प्रचारक की जन्मशती मनाई जा चुकी है। क्या संघ को उनकी याद आती है?
ठेंगड़ी प्राइवेट निवेश के खिलाफ नहीं थे पर वे चाहते थे कि अर्थव्यवस्था में एमएसएमई बड़ा रोल निभाएं। वे कारोबारी मैत्री की प्रवृत्ति के उभरने के भी खिलाफ थे।

अटल और ठेंगड़ी युवावस्था में ही संघ से जुड़ गए थे। व्यक्ति प्रचारक बने। एक प्रधानमंत्री बना तो दूसरा दो मर्तबा (1964-76) राज्यसभा सदस्य। लेकिन, ठेंगड़ी को विचारक के रूप में बहुत महत्ता हासिल रही है। माना जाता है कि इमरजेंसी के बाद जनता पार्टी को मूर्त रूप देने में भी उनकी खास भूमिका रही थी।

ठेंगड़ी को भारतीय मज़दूर संघ, भारतीय किसान संघ, स्वदेशी जागरण मंच का जनक माना जाता है। विद्यार्थी परिषद, अधिवक्ता परिषद, ग्राहक पंचायत और भारतीय विचार केंद्र के वे संस्थापक सदस्यों में थे। ये तमाम संगठन ही आज संघ और भाजपा के महती काम आते हैं। दिलचस्प बात यह कि ठेंगड़ी ने पचास के दशक में जब बीएमएस और बीकेएस का गठन किया, उस दौरान ट्रेड यूनियन का काम कम्यूनिस्ट ही करते थे। नारा लगा करता थाः लाल किले पर लाल निशान, मांग रहा है हिंदुस्तान।

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