उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने एक व्यक्ति के खिलाफ यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (पाक्सो) के मामले में कार्यवाही रद्द कर दी, जब उसने इस बात पर गौर किया कि आरोपी और पीड़िता अब कानूनी रूप से विवाहित हैं। उनका एक बच्चा भी है और महिला उसके (आरोपी के) साथ रहना चाहती है।

पति के साथ शांतिपूर्वक रहना चाहती है पीड़िता

न्यायमूर्ति आलोक वर्मा ने कहा कि मुकदमे को जारी रखने या आरोपी को जेल भेजने की कार्रवाई परिवार को अस्त-व्यस्त कर देगी। ऐसी परिस्थितियों में कार्यवाही जारी रखने की अनुमति देना न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति नहीं करेगा। अदालत ने पाया कि अपराध प्रेम से प्रेरित था, न कि वासना से, और पीड़िता अपने पति के साथ शांतिपूर्वक रहना चाहती थी।

यह मामला पोक्सो के विशेष सत्र न्यायाधीश के समक्ष लंबित था। आरोपी ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर अपने खिलाफ जारी आदेश पत्र और समन को रद्द करने का अनुरोध किया था। याचिका में कहा गया था कि दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया था और उन्होंने शादी कर ली थी। इसमें यह भी बताया गया कि अब उनका एक बच्चा भी है।

पीड़िता की ओर से यह प्रस्तुत किया गया कि वह बालिग है। आधार कार्ड में दर्ज जन्मतिथि से भी इसकी पुष्टि हुई। याचिका में कहा गया कि पीड़िता ने 12 मई, 2023 को अपनी मर्जी से आरोपी से शादी की थी और 27 अक्टूबर, 2023 को एक बेटे का जन्म हुआ।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर चर्चा

गौरतलब है कि कोर्ट कई बार ऐसे फैसले सुनाता है, जो चर्चा का विषय बन जाता है। ऐसा ही एक फैसला बीते साल सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया था। सुप्रीम कोर्ट ने दो वयस्कों के बीच सहमति से बने संबंध को तोड़ना उस व्यक्ति के खिलाफ बलात्कार के आरोप लगाने के लिए आपराधिक अपराध नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर, 2025 में औरंगाबाद के एक वकील [समाधान बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य] के खिलाफ दर्ज बलात्कार का मामला खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया था।

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दिल्ली हाई कोर्ट ने ‘घर पर खाली बैठी पत्नी’ की धारणा को खारिज करते हुए कहा है कि एक गृहिणी का श्रम कमाने वाले जीवनसाथी को प्रभावी ढंग से कार्य करने में सक्षम बनाता है, और भरण-पोषण की राशि तय करते समय उसके योगदान को नजरअंदाज करना अन्यायपूर्ण है। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें…