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फूटा पटाखा, मतलब आगे सिग्नल है…

रेलयात्रियों के लिए दिसंबर और जनवरी का महीना दुखदायी होता है। इस बार भी पिछले दो हफ्ते से पूरा उत्तर भारत कोहरे से घिरा है। इससे रेलगाड़ियां लगातार देरी से चल रही हैं।

Author नई दिल्ली | Updated: December 10, 2016 1:46 AM
Indian Railwayहरदत्तपुर रेलवे स्टेशन से रवाना होते समय पवन एक्सप्रेस का इंजन बोगी से अलग हुआ। जिसे स्टेशन के गेट पर ही रोक लिया गया।

रेलयात्रियों के लिए दिसंबर और जनवरी का महीना दुखदायी होता है। इस बार भी पिछले दो हफ्ते से पूरा उत्तर भारत कोहरे से घिरा है। इससे रेलगाड़ियां लगातार देरी से चल रही हैं। हालांकि, रेलवे का दावा है कि उसके पास कोहरे से निपटने के पर्याप्त इंतजाम हैं। रेलवे की मानें तो इस साल कोहरे से निपटने के लिए तीन हजार फॉगमैन और तीन लाख पटाखों से लैस दस्ता लगाया है। इसके साथ ही उत्तर रेलवे ने अपने 60 फीसद अधिकारियों को रेलगाड़ियों, ट्रैक और सिग्नलों के निरीक्षण में तैनात किया है। ये अधिकारी रेलगाड़ियों के इंजन में जाते हैं और ड्राइवर के साथ बैठकर उसके सिग्नल और दूरी की जांच करने की परख का जायजा लेते हैं। रेलवे के सीपीआरओ नीरज शर्मा ने बताया कि दिल्ली-पलवल सेक्शन के बीच वीसीडी (विजिलेंस कंट्रोल डिवाइस) की सुविधा दी गई है। इससे कोहरे में दृश्यता को बरकरार रखा जा सकता है। इंजन में वीसीडी के लगने से रेलवे के चालक और सहायक चालक को कोहरे के दिनों में गाड़ी चलाने में सहूलियत मिल रही है।

सारे चालकों को बुकलेट दी गई है, जिसमें सिग्नल और दूरी को बकायदे बताया गया है जिसे देखकर चालक घने कोहरे में आभास लगा सकता है कि अमुक सिग्नल यहां है और स्टेशन या रेलवे की अन्य जरूरी चीज इतनी दूरी पर है। वहीं कई बार कोहरे के कारण सिग्नल उसमें छुप जाता है और चालक को इसका पता नहीं चलता। इसके लिए सिग्नल से पचास मीटर की दूरी पर पटाखा लगाया जाता है, जिस पर से रेलगाड़ियां गुजरने पर पटाखे फूटते हैं और ड्राइवरों को इस बात की जानकारी हो जाती है कि आगे सिग्नल है। सिग्नलों को लेकर भी बदलाव किए जाते हैं। इस समय नए और चटक रंग के सिग्नल लगाए जाते हैं। कोहरे के दिनों में ट्रैक के बीच पत्थरों को चूना करने का भी काम किया जाता है। इससे पत्थरों पर गिरी ओस के कारण नमी शोषित करने में मदद मिलती है और उस जगह नमी खत्म की जाती है। वहीं बोरियम-रेडियम से पेंटिंग कर रेलवे ट्रैक के आस-पास के पोल और पुलिया को चमकाने का काम होता है, जिससे रेल चालक आस-पास की गतिविधियों से अवगत होते रहें और पता चल सके कि उसे आगे क्या करना है। ठंड में ट्रैक सिकुड़ने की घटना होने से रेलवे इसके लिए (यूएसएफडी) अल्ट्रासोनिक फ्लड टेस्टिंग मशीन से जांच करती है। इससे रेलवे की पटरियों की खामियों का पता चलता है। रेलवे अधिकारियों का कहना था कि महीनों पहले रेलवे कर्मचारियों को खास प्रशिक्षण दिया जाता है।

गाड़ियों के लगातार देरी से चलने के बारे में रेलवे अधिकारियों का कहना था कि रेलवे ट्रैक पर क्षमता से दो गुनी गाड़ियां चल रही हैं। इसमें एक के पीछे दूसरी गाड़ी लगी होती है। उन्होंने बताया कि रेलवे के कर्मचारी दिन-रात लगकर बेहतर सुविधा देने की कोशिश में लगे हैं। पिछले दिनों के बारे में बताया कि 107 गाड़ियां दिल्ली पहुंचीं, जिसमें से 50 गाड़ियों को फौरन तैयार कर बिना देरी के रवाना किया गया। जबकि इसमें कोई छठ घंटे की देरी से थी तो कोइ आठ घंटे की देरी से चली। जबकि गाड़ियां का देर से चलना बदस्तूर जारी है। ट्रेनों को स्टेशन से रवाना करने के बारे में एक अधिकारी ने बताया कि रेलवे की आरपीबीसी सर्टीफिकेशन के तहत किसी गाड़ी को 3500 किमी तक चलाया जा सकता है। अगर वह गाड़ी एक हजार किलोमीटर की दूरी तय करके पहुंची है तो उसके चलने की हालत को लेकर कोई नया सटिर्फिकेट जारी नहीं किया जाता। उसे एक घंटे के भीतर पानी और शौचालय की सफाई संबंधी बुनियादी व्यवस्था करके रवाना कर दिया जाता है। इन दिनों लगातार गाड़ियों के हालात को लेकर सर्टिफिकेट का भी ध्यान दिया जाता है ताकि चालू हालत में गाड़ियों को बिना रोके और बिना किसी अनावश्यक देरी के रवाना किया जा सके।

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