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खोए वोटों को सहेजने की कोशिश कर रही है कांग्रेस

अपने वजूद की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस की तैयारी कोई भी चुनाव लड़कर अपनी स्थिती सुधारने की है। इसीलिए दो साल से खाली पड़े नगर निगमों के 13 सीटों के उपचुनाव के लिए वह हाई कोर्ट में पक्षकार बनना चाहती थी।

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की बेटे राहुल के साथ फोटो

अपने वजूद की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस की तैयारी कोई भी चुनाव लड़कर अपनी स्थिती सुधारने की है। इसीलिए दो साल से खाली पड़े नगर निगमों के 13 सीटों के उपचुनाव के लिए वह हाई कोर्ट में पक्षकार बनना चाहती थी। हाई कोर्ट के अप्रैल में उपचुनाव के निर्देश दिल्ली सरकार को दिए। सरकार के जून में चुनाव करवाने की मोहलत मांगने पर फैसला सुरक्षित रख लिया। फैसला किसी भी दिन आ सकता है।

कांग्रेस ने दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार के खिलाफ अभियान चला रखा है। नेताओं और कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखने के लिए अरविंदर सिंह की तरह अजय माकन भी नई टीम का गठन टालते जा रहे हैं। माना जा रहा है कि टीम बनाने की प्रक्रिया जितनी धीमी होगी पार्टी के लोग पद पाने के नाम पर उतने ही सक्रिय होंगे। दिवाली तक प्रदेश की टीम घोषित करने के दावों के विपरीत अभी तक उन्होंने जिला अध्यक्ष और मोर्चा आदि के पदाधिकारी ही बनाए हैं। 2013 के विधानसभा चुनाव से अब तक कांग्रेस ने पार्टी को खड़ा करने की जितनी भी कोशिश की है, उसके सकारात्मक नतीजे नहीं दिखे।

इन तीन सालों में तो आम आदमी पार्टी (आप) ने भाजपा को कुछ नुकसान पहुंचाया लेकिन कांग्रेस का तो सफाया ही कर दिया। कांग्रेस के वोटर आप के वोटर बन गए। आप के नेता जानते हैं कि वे तभी तक दिल्ली में काबिज हैं जब तक कांग्रेस के वोटर कांग्रेस की ओर वापस नहीं लौटते। इसलिए कांग्रेस लगातार अपने लोगों को वापस लाने की कोशिश में आप पर जोरदार हमला कर रही है।

वह कांग्रेस के प्रहार से तिलमिलाती है लेकिन वार भाजपा पर ही लगातार करने का प्रयास कर रही है। जिस सरकारी विज्ञापन के हथियार से केजरीवाल सरकार विरोधियों पर सबसे तेज वार करते थे, उसे अदालत में ले जाकर कमजोर बनाने का काम कांग्रेस ने किया है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन और उनकी टीम कांग्रेस के परंपरागत वोटरों को कांग्रेस में लाने की कोशिश कारगर तरीके से कर रही है। उसके कुछ नतीजे 2017 के निगम चुनाव में दिख सकते हैं। कांग्रेस के नेता चाहते हैं कि निगम के आम चुनाव से पहले उपचुनाव के बहाने एक शक्ति प्रदर्शन का तो उसे मौका मिले।

दिल्ली में शुरू से ही कांग्रेस और भाजपा बदल-बदल कर शासन करती रही है। एक समय भाजपा की पुरानी पार्टी जनसंघ लगातार नगर निगम में तीन बार शासन में आ गई थी। उसका कारण था कि दिल्ली का वैसा विस्तार तब नहीं हुआ था जैसा पिछले कुछ सालों में हुआ है। जब भी दिल्ली में तीसरा दल ताकतवर हुआ तब कांग्रेस को नुकसान हुआ। इसी के चलते 1993 में दिल्ली विधानसभा में भाजपा जीती थी। उसके बाद लगातार तीन चुनाव कांग्रेस जीती। भाजपा के वोट तो 35-37 फीसद तक हर चुनाव में आते रहे। इन्हीं मतों के बूते वह लगातार दो बार निगम चुनाव (2007 और 2012) जीत गई। 2013 में बनी आप ने बिजली-पानी, छोटे भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे उठाकर कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाई और 2015 के चुनाव उसका सफाया कर दिया।

दिल्ली में रहने वाले पूर्वांचल (बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड आदि के मूल निवासी) के लोग पहले कांग्रेस के साथ थे तो कांग्रेस लगातार तीन बार दिल्ली में सरकार बना पाई अब आप के साथ हो गया तो उनकी सरकार बन गई। आप की सरकार पहले दिन से ही उपराज्यपाल के माध्यम से केंद्र की भाजपा की अगुवाई वाली सरकार पर सीधे हमला बोल कर दिल्ली की लड़ाई स्थायी तौर पर आप बनाम भाजपा बनाने में लगी हुई है। आप को भाजपा से ज्यादा खतरा नहीं है, अगर कांग्रेस ताकतवर हुई तो गरीब और कमजोर वर्ग के लोग आप से टूटेंगे। यह आप आसानी से होने देना नहीं चाहती है इसलिए हर मामले को उसी अंदाज में सामने रखती है।

अजय माकन ने शुक्रवार को कहा कि सम-विषम को दिल्ली के लोगों ने सफल कर दिया, अब सरकार की बारी है। सरकार ने साल भर के शासन में वाहन प्रदूषण कम करने के लिए क्या किया? सार्वजनिक वाहनों में सुधार के लिए न तो एक भी बस खरीदी न ही एक भी बस डिपो बढाए। इतना ही नहीं मेट्रो रेल के अगले चरण के लिए भी कोई योजना नहीं बनाई। अब तो लगता है कि उसका चौथा चरण 2016 में भी नहीं पूरा हो पाएगा। जबकि उसे 2015 में ही पूरा होना था।

उसी तरह सरकार के तमाम आर्थिक संकट के बावजूद बिजली और पानी पर सबसिडी जारी रखने की योजना है। इतना ही नहीं मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपने समर्थकों को लगातार यही समझाने में लगे हैं कि वे तो काम करना चाहते हैं। लेकिन केंद्र की भाजपा सरकार उन्हें काम नहीं करने दे रही है। हालांकि वे यह नहीं बता रहे हैं कि वे किस तरह से एक के बाद एक गैरकानूनी फैसले ले रहे हैं। जो बार-बार रद्द हो रहा है और जनता पर पैसे का बोझ बढ़ रहा है। इन हालात में कांग्रेस को अपने वोटरों को वापस अपने पक्ष में लाने की बड़ी चुनौती है।

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