UP Politics: उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के लिए आधिकारिक घोषणा होने से कुछ महीने पहले कांग्रेस पार्टी ने अपने संगठन में बड़ा बदलाव किया। अविनाश पांडे से यूपी प्रभार लेकर ये जिम्मेदारी दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री राजेंद्र पाल गौतम को दी है, जो कि आम आदमी पार्टी से कांग्रेस में आए थे। कांग्रेस ने राजेंद्र पाल गौतम को पहले पार्टी में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) के अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी भी दी थी। इस बड़े बदलाव के जरिए कांग्रेस अखिलेश यादव के लिए नई चुनौतियां खड़ी करने का संकेत दे रही है।

दरअसल, राजेंद्र पाल गौतम को यूपी का प्रभार मिलना और उसके बाद उनका आक्रामक बयान देना यह संकेत दे रहा है कि सपा के लिए चुनाव से पहले सीट शेयरिंग के मुद्दे पर सहमति बनाना आसान नहीं होगा। सपा-कांग्रेस के गठबंधन ने 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को अपने जातीय समीकरण और संविधान, आरक्षण बचाने वाले मुद्दे के जरिए झटका दिया था। सपा सुप्रीमो लोकसभा वाले उस फॉर्मूले को अपने लिए सहज मान रहे हैं। इसीलिए वे सपा-कांग्रेस के गठबंधन को मजबूत बताते रहे हैं।

सीट शेयरिंग में बराबरी चाहती कांग्रेस

अखिलेश यादव भले ही कांग्रेस के साथ सहयोग की बात करें हों किंतु कांग्रेस के नए यूपी प्रभारी सपा पर दबाव बनाने का रुख अपनाते दिख रहे हैं। सपा के साथ सीट शेयरिंग के मुद्दे पर राजेंद्र पाल गौतम ने कहा, “मैं तो चाहूंगा कि बराबरी की हिस्सेदारी हो। जल्दी ही जब बातचीत होगी, तब शीर्ष नेतृत्व तय करेगा। मैं इतना अधिकृत नहीं हूं कि पहले ही घोषणा कर दूं, लेकिन हमारी बराबर की हिस्सेदारी की बात रहेगी।”

राजेंद्र पाल गौतम का सीट शेयरिंग पर बराबरी वाला बयान इसलिए मायने रखता है, क्योंकि कुछ हफ्ते पहले जब अखिलेश यादव से सीट शेयरिंग के संबंध में सवाल पूछा गया था, तो उनका कहना था कि बात सीट की नहीं बल्कि जीत की है। अखिलेश ने यह भी कहा था कि प्रत्याशियों के चयन के आधार पर सीट शेयरिंग होगी। इस पर यूपी कांग्रेस के नेताओं की तरफ से विभिन्न बयानबाजी हुई थी। लोकसभा सांसद इमरान मसूद से लेकर प्रदेश अध्यक्ष अजय राय तक अखिलेश के बयान की आलोचना कर रहे थे। कांग्रेस नेताओं का कहना था कि जब सीट ही नहीं होगी तो जीत की बात कैसे होगी।

2017 से ज्यादा सीटों की मांग

उत्तर प्रदेश कांग्रेस यूनिट के नेताओं का मानना है कि 2017 में समाजवादी पार्टी की सरकार थी। इसके बावजूद कांग्रेस को सपा ने गठबंधन में 105 सीटें थीं, जबकि इस बार सपा की सरकार नहीं है। इसीलिए कांग्रेस को 2017 के मुकाबले ज्यादा सीटें मिलनी चाहिए। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनना है, ऐसे में समाजवादी पार्टी कांग्रेस को नाराज करना नहीं चाहेगी।

गठबंधन या अकेले लड़ने को लेकर भी असमंजस

कांग्रेस पार्टी का एक धड़ा है, जो कि लोकसभा चुनाव में गठबंधन को यूपी में मिली सफलता के चलते सपा के साथ ही यूपी चुनाव लड़ना चाहता है। दूसरी ओर राजेंद्र पाल गौतम के आने के बाद एक बार फिर यूपी में कांग्रेस के अंदर से एकला चलो रे की आवाज उठने लगी है। अजय राय और अन्य वरिष्ठ नेताओं ने जोर देकर कहा है कि कांग्रेस फिलहाल राज्य की सभी 403 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने के लिए कार्यकर्ताओं को तैयार कर रही है।

कांग्रेस नेताओं का कहना है कि अगर समाजवादी पार्टी की तरफ से सीट शेयरिंग के तहत कांग्रेस को सम्मानजनक सीटें नहीं दी गईं तो कांग्रेस अकेले भी चुनावी मैदान में उतर सकती है। इसीलिए पार्टी सभी सीटों पर अपनी ताकत मजबूत करने लिए कैंपेन भी चलाएगी। कांग्रेस का ये रुख अखिलेश यादव को परेशान भी कर सकता है।

बिहार में कांग्रेस पर लगे थे आरोप

दूसरी ओर अखिलेश यादव के लिए सबसे बड़ा उदाहरण बिहार का है। बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान सीट शेयरिंग के मुद्दे पर विपक्षी महागठबंधन के घटक दल यानी आरजेडी और कांग्रेस में टकराव अंतिम समय तक जारी था। कई सीटों पर दोनों के बीच फ्रेंडली फाइट भी हुई थी। इसके चलते जो मोमेंटम विपक्ष पाना चाहता था, वो उसे हासिल नहीं हुआ। नतीजा ये एनडीए ने शुरुआत से ही बिहार चुनाव में बढ़त बना ली और विपक्षी दलों की करारी हार हुई।

दलित वोट बैंक पर फोकस

कांग्रेस पार्टी वर्तमान राजनीतिक समीकरणों में दलित राजनीतिक को बढ़ावा दे रही है। यूपी की सियासत में बहुजन समाज पार्टी हाशिए पर हैं और कांग्रेस-बसपा के दलित और जाटव वोट बैंक को साधने के प्रयास कर रही है। इसीलिए कांग्रेस ने वरिष्ठ दलित नेता राजेंद्र पाल गौतम को यूपी का प्रभार भी दिया।

ये राजेंद्र पाल गौतम वही हैं, जो कि तनुज पुनिया के साथ, कुछ दिन पहले मायावती से मिलने के लिए उनके आधकारिक आवास पर बिना किसी पूर्व जानकारी के पहुंच गए थे। हालांकि, उस दौरान मायावती ने उनसे मुलाकात की थी।

राहुल गांधी करते रहे हैं मायावती की आलोचना

एक अहम बात यह भी है कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी लोकसभा चुनाव के बाद से कई बार मायावती पर हमलावर हो चुके हैं। राहुल गांधी कई बार बीएसपी और मायावती पर ये आरोप लगा चुके हैं, कि अगर मायावती 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन का हिस्सा होतीं तो बीजेपी यूपी में हाशिए पर खिसक जाती, जिसके चलते बीजेपी नीत एनडीए गठबंधन की 2024 में सरकार नहीं बन पाती और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री भी नहीं बन पाते।

राहुल गांधी बार-बार मायावती पर बीजेपी की पर्दे के पीछे से मदद करने और 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को फायदा पहुंचाने का आरोप लगाते रहे हैं। हालांकि, एक तरफ राहुल गांधी मायावती पर हमला बोलते हैं, तो दूसरी ओर उनके नेता बिना बताए मायावती से मिलने उनके घर पहुंच जाते हैं। इसके जरिए कांग्रेस सीधे तौर पर अपने गठबंधन के सहयोगी यानी समाजवादी पार्टी पर दबाव बनाने की कोशिश कर रही है।

बसपा को भी बनाया विकल्प?

कांग्रेस, अखिलेश यादव पर ये दबाव भी बनाना चाहती है कि अगर सपा सीट शेयरिंग के मुद्दे पर कांग्रेस को सम्मानजनक सीटें नहीं देगी, तो कांग्रेस मायावती की पार्टी बसपा का विकल्प भी खुला रखे हुए हैं। कांग्रेस ये भी संकेत देना चाहती है कि वह मायावती के दलित वोट बैंक को अपने पाले में ट्रांसफर कर सकती है, क्योंकि कांग्रेस ने यह धारणा भी बनाई है, कि 2024 के चुनाव में सपा के प्रत्याशियों को कांग्रेस से गठबंधन का फायदा मिला था। इसीलिए यूपी के दलित और नॉन यादव ओबीसी वोटर्स बड़ी संख्या में विपक्षी गठबंधन को समर्थन दिया था।

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उत्तर प्रदेश के चर्चित नेता और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर फिर से सुर्खियों में हैं। आजकल ओमप्रकाश राजभर लगातार सपा मुखिया अखिलेश यादव पर निशाना साध रहे हैं। कुछ दिन पहले ही उन्होंने दावा किया कि समाजवादी पार्टी के आधे से अधिक सांसद बीजेपी में जाने के लिए तैयार बैठे हैं। हालांकि समाजवादी पार्टी और कई सांसदों ने इसका खंडन कर दिया। पढ़िए पूरी खबर…