ताज़ा खबर
 

सरोकार, बाजार और हिंदी ‘किताबवाला’

आॅक्सफोर्ड बिजनेस कॉलेज के अध्यक्ष प्रोफेसर स्टीव ब्रिस्टो कहते हैं, ‘भाषाओं में काम करने वाले सांस्कृतिक कर्मी हो जाते हैं।

Author नई दिल्ली | April 14, 2017 3:01 AM
‘किताबवाला’ माहेश्वरी के छापेखाने से निकली किताबों को अगर वैश्विक मंच पर पहचान मिल रही है तो वह है उसकी सार्वकालिकता, संस्कृति के साथ कदमताल और सरोकार की पहचान।

आॅक्सफोर्ड बिजनेस कॉलेज के अध्यक्ष प्रोफेसर स्टीव ब्रिस्टो कहते हैं, ‘भाषाओं में काम करने वाले सांस्कृतिक कर्मी हो जाते हैं। आॅक्सफोर्ड बिजनेस कॉलेज कल्चरल एंंत्रप्रेन्यूशिप सांस्कृतिक व्यवसाय को अहम मानता है और यह सम्मान अरुण माहेश्वरी को देते हुए गौरव महसूस कर रहा है’। इसके पहले ब्रिस्टो ने कहा, ‘21वीं सदी का सबसे बड़ा निवेश व बाजार का केंद्र माने जाने वाला देश भारत भाषायी रूप से सांस्कृतिक लेखन करते रहे और इसी कारण देश-विदेश में उन्हें कई सम्मान प्राप्त हुए’। आॅक्सफोर्ड बिजनेस कॉलेज में जब अरुण माहेश्वरी को एक्सीलेंस अवार्ड से नवाजा जा रहा था तो एक इंसान के साथ एक पूरी परंपरा, एक मिशन भी सम्मानित हो रहा था। आज जब हिंदी के साथ बाजार को जोड़ कर बाजार के अगुआ संस्थान में हिंदी का जिक्र किया जा रहा है तो उसके साथ सरोकार की भी चर्चा की जा रही है। आखिर वह किस तरह का साहित्य होता है जो भाषाई परिधि से छलांग मारक वैश्विक मंच पर अपनी हाजिरी लगा जाता है। आप उसे बाजार का हिस्सा कह सकते हैं लेकिन उससे संस्कृति और सरोकार नामक तत्त्व नहीं हटा सकते हैं।

टैगोर से लेकर प्रेमचंद से लेकर हाल में पुरस्कृत यतींद्र मिश्र की किताब ‘सुर लता गाथा’ को देखें। किताबें वही सार्वकालिक होती हैं, सर्वस्वीकार्य होती हैं जो गंभीरता से मानवता को कुछ देने का मिशन लेकर चलती है। हिंदी के गंभीर मुख्यधारा के साहित्य की सरोकार के साथ जुगलबंदी रहती है इसलिए, इसे खत्म नहीं किया जा सका है। सम्मान समारोह में प्रकाशक अरुण माहेश्वरी सतेंद्र ‘मनम’ की पंक्तियों के साथ कहते हैं, ‘दुकान किताब की महज इक दुकान नहीं…यहां आदमी को इंसां बनाने के सारे सामानात मिलते हैं’। आखिर किताबों में वह कौन सा सामान है जो आदमी को इंसान बनाने का माद्दा रखता है। और, क्या आज बाजार में बिकने वाली हर ‘बेस्ट सेलर’ किताब में यह बुनियादी सामान है? पिछले एक दशक में इंटरनेट ने हमारे लिखने, पढ़ने और समझने को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। एक बहुत बड़े वर्ग ने इसे अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। इंटरनेट लेखन पॉपुलर कल्चर का नया रूप था और प्रिंट विधा में इसे भुनाना जरूरी लगने लगा था। थोड़ा प्रेम, थोड़ा शहर, कुछ नॉस्टैल्जिया और चुटकी लेते हुए नारीवादी विमर्श। यूरोप में मशहूर हो चुकी इस शैली का भारत में नया बाजार बना। पिछले कुछ समय में हुए पुस्तक मेलों में इन किताबों का जमकर प्रचार हुआ। आखिर प्रकाशकों ने इन किताबों के प्रचार-प्रसार में सबसे ज्यादा संसाधन क्यों झोंका?

साहित्य, प्रकाशक और पाठक की त्रयी के बीच सबसे बड़ी चुनौती इंटरनेट और फेसबुक है। फेसबुक ने भाषा का नया बाजार गढ़ दिया है। इंटरनेट पर आम आदमी से जुड़ी भाषा पारंपरिक दायरों को नकारती है। यह तुरंता खाना जैसा है। ‘दो मिनट में मैगी’ हिंदुस्तान के उच्च से लेकर निम्न तबकों के घरों तक पहुंच जाती है। उसी तरह फेसबुक पर लिखे गए सरल भाषा के तुरंता नोट्स लोगों की पसंद बन गए। चाय पीते हुए, डॉक्टर का इंतजार करते हुए पाठक आसानी से इसके साथ जुड़ते हैं। और पाठकों से जुड़ना प्रकाशकों की मजबूरी भी है।
लेकिन, बाजार की इस मजबूरी के इतर सरोकारों की मशाल थामे रहने के कारण ही अरुण माहेश्वरी जैसे प्रकाशक संस्कृति-कर्मी का दर्जा पाते हैं और उनकी किताब की दुकान इंसान बनाने का सामान बेचने वाली के रूप में भी देखी जाती है। अरुण माहेश्वरी का वाणी प्रकाशन यतींद्र मिश्र की किताब ‘लता सुर-गाथा’ का प्रकाशन करता है जो राष्टÑीय फिल्म पुरस्कारों की श्रेणी के लिए स्वर्ण कलम के लिए चुनी जाती है। सिनेमाई पृष्ठभूमि के बावजूद इस किताब में विवादास्पद कुछ भी नहीं रखा गया है। लता मंगेशकर को लेकर इसमें कोई ऐसी बात नहीं लिखी गई, जिसे बाजार में किताब बेचने के लिए उछाला जाए। इस किताब में एक सार्वकालिक छाप है जो इसे आम फिल्मी किताब से अलग करती है। आॅक्सफोर्ड के समारोह में अरुण माहेश्वरी ने कहा, ‘प्रकाशन एक नोबल कॉज है, एक मुहिम है। मैं ईश्वर को धन्यवाद करता हूं कि मुझे हिंदी का प्रकाशक बनाया क्योंकि 21वीं सदी में भारतीय भाषाओं का प्रकाशन व्यवसाय विश्व के सभी व्यवसायों से अलग साबित होगा’। ‘किताबवाला’ माहेश्वरी के छापेखाने से निकली किताबों को अगर वैश्विक मंच पर पहचान मिल रही है तो वह है उसकी सर्वकालिकता, संस्कृति के साथ कदमताल और सरोकार की पहचान।

पिछले कुछ समय में वाणी प्रकाशन ने जिस तरह से साहित्य महोत्सवों की कड़ी शुरू कर हिंदी के मकबूल रचनाकारों से लेकर युवा साहित्यकारों को साझा मंच दिया है वह हिंदी को एक आधुनिक और लोकतांत्रिक चेहरा देता है। आॅक्सफोर्ड परिसर में माहेश्वरी भारतेंदु की निज भाषा उन्नति, सब उन्नति मूल को पढ़ते हुए अपने हिस्से का रचते भी हैं। ‘किताबवाला’ भारतेंदु की इन पंक्तियों को अक्षरश: अपने कर्म में भी उतारते हैं, ‘विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनके प्रकारा/सब देसन से लै करहू भाषा माहि प्रचारा’।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App