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करगिल युद्ध: आर्मी टैंक ‘विजयंत’ के नाम पर पिता ने रखा था नाम, शहादत के बाद सामान से मिले सिर्फ 300 रुपये और चॉकलेट

कैप्टन विजयंत थापर के पिता कर्नल (रि.) वीएन थापर के पास करगिल से जब फोन आया तो वह अलवर में थे। उन्हें लगा कि बेटा सिर्फ गंभीर रूप से घायल हुआ होगा। कर्नल (रि.) थापर भी उसी साल सेना से रिटायर्ड हुए थे।

शहीद कैप्टन विजयंत थापर के पिता कर्नल वीएन थापर अपनी पत्नी तृप्ता के साथ। (फोटोः गजेंद्र यादव)

करगिल युद्ध को खत्म हुए 20 साल हो चुके हैं। करगिल युद्ध में शहीद होने वाले सैनिकों के मां-बाप के लिए अभी भी उनसे जुड़ी यादें बिल्कुल ताजा हैं। करगिल युद्ध में शहीद होने वाले कैप्टन विजयंत थापर के माता पिता के लिए अपने बेटे की मौत के बाद खाली हुई जगह के भरना बिल्कुल नामुमकिन लगता है।

बेटे के बारे में बात करते हुए रिटायर्ड कर्नल वीएन थापर कहते हैं, मैंने उसका नाम टैंक विजयंत के नाम पर रखा था। इसका मतलब है आखिर में जीत। उसकी यूनिट, 2 राजपूताना राइफल्स का मोटो भी यहीं था। नोएडा में रहने वाले कैप्टन विजयंत थापर के पिता कहते हैं कि बेटे की शहादत ने उन्हें गर्व का मौका दिया लेकिन उसके जाने का जख्म अभी तक नहीं भरा है।

कर्नल थापर कहते हैं, ‘हम उसे रोज याद करते हैं।’ कर्नल थापर ने बताया, ‘जब आर्मी की कैजुअल्टी यूनिट से उनके बेटे के बारे में फोन आया उस समय मैं अलवर में था। मुझे लगा गंभीर चोट लगी होगी लेकिन यह हमारे लिए बड़ी चोट थी। मैं भी उसी साल रिटायर्ड हुआ था। बेटे की शहादत को 20 साल हो चुके हैं लेकिन अभी भी उसकी बहुत याद आती है।’

घर के लिविंग एरिया में यूनिफॉर्म पहले विजयंत की बड़ी फ्रेम की हुई तस्वीर लगी है। अपने बेटे की बचपन की तस्वीरों को निहारते हुए पिता कर्नल थापर कहते हैं, ‘मेरा बेटा कुछ अलग ही था।’ वे बताते हैं जब करगिल से उसका सामान आया तो उसके बॉक्स में 300 रुपये और चॉकलेट थी।

कैप्टन थापर की मां बताती हैं, ‘जब वह अपने छोटे भाई के साथ खेलता था तो वह उसे हमेशा पाकिस्तान बनाता था और उसे हराता था। इस बात पर मेरा छोटा बेटा अकसर शिकायत करता था।’ अपन बेटे के दयालुता का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि जब बेटा कॉलेज में था तो उसे पॉकेट खर्च के लिए हर सप्ताह 50 रुपये मिलते थे।

एक बार उन्होंने देखा कि बेटे ने सारे पैसे भिखारी को दे दिए। मां तृप्ता ने बताया, जब मैंने उससे पूछा कि तुम अब अपने सप्ताह का खर्च कैसे चलाओगे तो बेटे ने कहा, ‘मैं चला लूंगा… आप चिंता ना करें। वह काफी किफायत से जीवन चलाने वाला था।’

कैप्टन विजयंत थापर के दयालुता की झलक उनके उस पत्र में भी मिलती है जिसमें उन्होंने छह साल की लड़की रुकसाना को पैसे भेजने की बात कही थी। कैप्टन थापर रुकसाना से कुपवाड़ा में पोस्टिंग के दौरान मिले थे। रुकसाना के पिता आतंकी हमले में मारे गए थे। आखिरी बार घर पर किए गए फोन में कैप्टन विजयंत ने अपनी मां से रुकसाना के लिए कुछ सूट सिलवाने के लिए कहा था।

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