गोवाः आदिवासियों के विरोध के बाद विधेयक से हटाना पड़ा ‘भूमिपुत्र’ शब्द, जानें क्या है इसका मतलब

गोवा सरकार ने ‘गोवा भूमिपुत्र अधिकारणी बिल’ में से भूमिपुत्र शब्द हटाने का फैसला किया है। प्रमोद सावंत सरकार को इस शब्द पर भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा था।

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गोवा सीएम प्रमोद सावंत (फोटो-@DrPramodPSawant)

गोवा सरकार ‘गोवा भूमिपुत्र अधिकारणी बिल’ में से भूमिपुत्र शब्द हटाने के लिए तैयार हो गई है। मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने मंगलवार को कहा कि सरकार गोवा भूमिपुत्र अधिकारिणी विधेयक, 2021 से “भूमिपुत्र ” शब्द को हटा देगी। इस बिल को 30 जुलाई को विधानसभा में पारित किया गया था।

मंगलवार देर शाम प्रमोद सावंत ने सोशल मीडिया पर अपने एक संबोधन में कहा- “भूमिपुत्र शब्द से कई लोगों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं और सरकार इस शब्द को बिल से हटाने के लिए तैयार है। मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि हम विधेयक से भूमिपुत्र शब्द को हटा देंगे। इसे गोवा भूमि अधिकारिणी विधेयक नाम देना संभव है”।

सीएम की इस घोषणा से कुछ घंटें पहले ही बीजेपी एसटी मोर्चा ने ‘भूमिपुत्र’ शब्द के इस्तेमाल पर कड़ी आपत्ति जताते हुए प्रमोद सावंत को एक ज्ञापन सौंपा था। मोर्चा ने कहा था कि इस शब्द से राज्य के लगभग सभी आदिवासियों की भावनाओं को बहुत ठेस पहुंची है। पूरा समुदाय इसका विरोध कर रहा है। जो उचित सुधार ना होने पर विनाशकारी प्रभाव डाल सकता है।

इससे पहले सीएम से मुलाकात के बाद, गोवा राज्य अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष रमेश तावड़कर ने कहा था कि भूमिपुत्र शब्द का इस्तेमाल अब तक गौड़ा, कुनबी, वेलिप समुदायों के लिए किया जाता रहा है। इसलिए इस पर कुछ निराशा हुई। सीएम ने हमें आश्वासन दिया है कि वह इसे विधेयक के नाम से हटा देंगे।

इस मामले पर विपक्ष भी लगातार सरकार को घेर रहा था। विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने बिना चर्चा के इस बिल को पास कर दिया। गोवा प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गिरीश चोडनकर ने मंगलवार को कहा कि पार्टी विधेयक के विरोध में ‘भूमिपुत्र यात्रा’ निकालेगी।

गोवा भूमिपुत्र अधिकारिणी विधेयक उस व्यक्ति को भूमिपुत्र का दर्जा देता है जो कम से कम 30 वर्षों से गोवा में रह रहा हो। एक बार भूमिपुत्र के रूप में मान्यता प्राप्त होने के बाद, वह 1 अप्रैल, 2019 से पहले बनाए गए 250 वर्ग मीटर के अपने घर के स्वामित्व का दावा कर सकता है।

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