छत्तीसगढ़ में एक आदिवासी व्यक्ति की तीन दशक पहले फर्ज़ी मुठभेड़ में हत्या हो गई थी। अब जाकर परिवार को मुआवजे की उम्मीद जगी है। परिवार लंबे समय से मुआवजे की मांग कर रहा है। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के हालिया आदेश में ज़िला कलेक्टर को निर्देश दिया गया है कि वे 45 दिनों के भीतर उनके आवेदन पर फ़ैसला लें। यह घटना 26 मार्च 1992 की है, जब जशपुर ज़िले के डेंगुर जोर गांव में कानसाबेल पुलिस थाने की टीम ने रामनाथ नागवंशी को माओवादी होने के शक में गोली मार दी थी। बाद में पुलिस ने यह निष्कर्ष निकाला कि नागवंशी माओवादी नहीं था। इसके बाद 2002 में छह पुलिसकर्मियों को ‘गैर-इरादतन हत्या’ का दोषी ठहराया गया।
परिवार कर रहा 1 करोड़ रुपये मुआवज़े की मांग
इसी साल पीड़ित की पत्नी संझो बाई ने हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और 1 करोड़ रुपये के मुआवज़े की मांग की। उन्होंने दलील दी कि न्याय पाने के अन्य सभी रास्ते बंद हो चुके हैं। याचिका पर सुनवाई के बाद जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी ने जशपुर के कलेक्टर को निर्देश दिया कि वे 45 दिनों के भीतर इस आवेदन पर फ़ैसला लें।
संपर्क किए जाने पर जशपुर के कलेक्टर रोहित व्यास ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया कि प्रशासन राज्य सरकार को पत्र लिखकर पीड़ित परिवार को दिए जाने वाले मुआवज़े के संबंध में स्पष्टीकरण मांगेगा। हत्या वाले दिन की घटना को याद करते हुए उनके 62 वर्षीय भाई रिमनाथ (कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (CPI) के स्थानीय नेता हैं) ने बताया कि नागवंशी की मौत उनकी मदद करने की कोशिश में हुई थी।
रिमनाथ ने बताया, “उनकी हत्या से एक दिन पहले, हमारे गांव में CPI की एक बैठक हुई थी। मुझे और कुछ अन्य लोगों को गिरफ़्तार कर लिया गया था। जेल ले जाए जाने से पहले, मेरे बड़े भाई रामनाथ और कुछ रिश्तेदार हमारे लिए खाना और कपड़े लाने की कोशिश कर रहे थे। उसी दौरान पुलिस ने उन्हें धक्का देकर हटा दिया, जिसके बाद दोनों पक्षों में हाथापाई शुरू हो गई। फिर पुलिस ने गोली चला दी, जिससे मेरे भाई की मौत हो गई।”
केस लड़ने में बिक गई 2 एकड़ जमीन
रिमनाथ ने आरोप लगाया कि परिवार पर केस वापस लेने का दबाव डाला गया था, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से साफ़ इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, “रामनाथ की मौत के बाद हमें बहुत सारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। उनके तीन बेटे थे, जिनमें से दो की मौत हो चुकी है। उनका तीसरा बेटा बीच में ही स्कूल छोड़ चुका है और अब मजदूरी करके अपना गुज़ारा करता है। उनकी पत्नी भी मजदूरी करती हैं। केस लड़ने के लिए हमने लाखों रुपये खर्च कर दिए। यहां तक कि हमें अपनी दो एकड़ ज़मीन भी बेचनी पड़ी और अब भी हम पर कर्ज़ बाकी है। वह हमारे परिवार के मुखिया और हमारे संरक्षक थे।”
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