छत्तीसगढ़ के नए रायपुर में टुटा मैदान में मिड डे मील बनाने वाली महिलाएं धरना दे रही हैं। उनकी अनिश्चितकालीन हड़ताल के पीछे मुख्य मांग है कि रोजाना की मजदूरी 66 रुपये से बढ़ाकर 440 रुपये हो। हालांकि ग्रुप में ज्यादातर लोग मानते हैं कि MGNREGA मज़दूरों को मिलने वाले 261 रुपये भी मिल जाएं तो यह एक अच्छी शुरुआत होगी। वहीं राज्य सरकार का प्रस्ताव है कि हर महीने 500 रुपये की बढ़ोतरी होगी, जो रोजाना 17 रुपये से थोड़ा कम है।
शिक्षा विभाग ने दी है कार्रवाई की चेतावनी
इसके अलावा शिक्षा विभाग ने उन कुक के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी भी दी है जो मिड-डे मील में रुकावट डालते हैं। शिक्षा विभाग न ज़िला अधिकारियों से यह सुनिश्चित करने को कहा है कि यह सिस्टम (जिसमें लगभग 70,000 कुक काम करते हैं) बाधित न हो। दोनों पक्षों के अपनी बात पर अड़े रहने से स्थिति गतिरोध में पहुंच गई है। इस हफ़्ते की शुरुआत में विरोध प्रदर्शन में शामिल दो महिलाएं दुलारी यादव और रुक्मणी सिन्हा की तबीयत बिगड़ने के बाद मौत हो गई। हालांकि डॉक्टरों ने कहा कि दोनों को पहले से बीमारियां थीं। लेकिन इन मौतों ने पहले से ही तनावपूर्ण स्थिति को और भड़का दिया है।
गुरुवार रात को 500-600 कुक ने अपनी मांगों को मनवाने के लिए मंत्रालय तक मार्च करने का फैसला किया, और पुलिस द्वारा रोके जाने पर वे सड़क पर बैठ गए। जब शुक्रवार को प्रशासन की कई चेतावनियों के बावजूद वे नहीं माने तो उनके खिलाफ दंगा करने और ट्रैफिक जाम करने की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया।
31 साल में केवल 51 रुपये बढ़ी मजदूरी
एक मिड-डे मील कुक और छत्तीसगढ़ स्कूल मिड डे मील रसोइया संयुक्त संघ के सचिव मेघराज बघेल ने कहा, “31 सालों से हमने सरकार के लिए चुपचाप काम किया। 1995 में मैं रोज़ 15 रुपये कमाता था और 2026 में यह 66 रुपये है। यानी हर साल औसतन लगभग 1.65 रुपये की बढ़ोतरी। मैंने उस दिन भी काम किया जिस दिन मेरे पिता की मौत हुई थी। हम प्रतिबद्ध हैं, लेकिन क्या वे हमारी स्थिति को नहीं समझ सकते? हम दिन में पांच घंटे काम करते हैं और हमें जो भुगतान किया जाता है, वह महंगाई के हिसाब से बिल्कुल भी काफी नहीं है।”
मिड-डे मील बनाने वाले रसोइयों ने की थी वेतन बढ़ाने की मांग, पुलिस ने लगा दी दंगे की धारा
वहीं राज्य शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने मांगों पर टिप्पणी के लिए किए गए कॉल और मैसेज का जवाब नहीं दिया। शिक्षा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि प्रदर्शनकारी जितनी सैलरी बढ़ाने की मांग कर रहे हैं, वह बहुत ज़्यादा है।
कांकेर ज़िले की 45 वर्षीय शिप्रा तरफदार 2008 से कुक का काम कर रही हैं। इंडियन एक्सप्रेस से बात करते-करते रो पड़ीं। उन्होंने कहा, “मैं अपने बच्चों को अकेला छोड़कर यहां आई हूं। मेरे पति एक टीचर थे और एक साल पहले ही उनकी मौत हो गई, इसलिए मुझे पेंशन नहीं मिलती। मेरे दो बेटे हैं और उन्हें पालना बहुत मुश्किल है। हम खाने, कपड़ों और हर चीज में कटौती करते हैं।”
आर्थिक तंगी की वजह से बेटे को मां नहीं दिला पाई बैट
शिप्रा ने याद किया कि जब उनका बेटा क्रिकेट का सामान खरीदने के लिए पैसे मांगने की ज़िद कर रहा था, तो उन्होंने उसे मारा था। उन्होंने कहा, “उसने कई दिनों तक खाना नहीं खाया। मैं यहां नहीं रहना चाहती, लेकिन मुझे अपने बच्चों के लिए लड़ना है। कम से कम हमारी दिहाड़ी बढ़ाकर 261 रुपये प्रतिदिन कर दें।” एक और प्रदर्शनकारी त्रिवेणी यादव ने कहा, “मैं यहां आने के लिए अपनी जेब से 1,200 रुपये खर्च कर चुकी हूं। मुझे अभी दिसंबर की सैलरी नहीं मिली है। दिवाली के दौरान जब हमारे बच्चे तोहफ़े चाहते हैं, तो हमें उनकी इच्छाएं पूरी करने के लिए पैसे उधार लेने पड़ते हैं।”
नहाने के लिए प्रदर्शनकारी पास के एक तालाब का इस्तेमाल करते हैं, जिसे उन्होंने साफ़ किया है। त्रिवेणी यादव ने कहा, “जब हम यहां आए, तो जगह बहुत गंदी थी, इसलिए हमने उसे साफ किया। हम छोटे-छोटे ग्रुप में अपना खाना खुद बनाते हैं और जमीन पर सोते हैं। कुछ लोगों ने टेंट लगाए हैं। हम घर जाना चाहते हैं, लेकिन सरकार हमारी हालत पर ध्यान नहीं दे रही है।”
बेमेतरा की 42 वर्षीय लीलावती चतुर्वेदी ने कहा कि 15 साल पहले उन्हें 40 रुपये प्रतिदिन मिलते थे, जो आज के 66 रुपये से बहुत ज़्यादा अलग नहीं है। उन्होंने कहा, “सरकार हमें इसलिए नजरअंदाज कर रही है क्योंकि हम शांतिपूर्ण हैं और हमें कमज़ोर समझा जाता है। मेरे पति मजदूर हैं लेकिन रोजाना काम नहीं मिलता। हमारे दो बच्चे हैं। जब कोई बीमार पड़ता है तो हम कर्ज़ लेते हैं और उसे चुकाना मुश्किल होता है।”
महासमुंद के 42 वर्षीय कचरा चंद्राकर ने कहा, “सरकार हमें मुफ़्त चावल और नमक देती है। हमें महतारी वंदना योजना (राज्य सरकार की योग्य शादीशुदा महिलाओं के लिए एक योजना) के तहत 1,000 रुपये भी मिलते हैं। इसके बावजूद बढ़ती कीमतों के कारण सब्ज़ियां खरीदना मुश्किल है।” 57 वर्षीय उल्फी यादव ने बताया कि उनके काम का दिन कैसा होता है। उन्होंने कहा, “हम सुबह 10 बजे काम शुरू करते हैं। हम चावल और सब्जियां साफ करते हैं। फिर हम लकड़ी से आग जलाते हैं ताकि चावल, दाल और सब्जियां पका सकें। हम खाना परोसते हैं और बर्तन साफ करते हैं। हम करीब 3 बजे काम खत्म कर देते हैं।” पढ़ें छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के अंदर नारेबाजी को लेकर जज ने कही सख्त बात
