छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में पुलिस ने एक बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा किया है। आरोप है कि कुछ लोगों ने मिलकर ऐसे लोगों की मौत को सांप के काटने से हुई मौत बताकर सरकार से मिलने वाली मुआवजे की रकम हड़पने की कोशिश की।
इस मामले में महाराष्ट्र के नागपुर की रहने वाली 37 साल की डॉक्टर प्रियंका सोनी को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस के मुताबिक, डॉक्टर पर फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार करने में मदद करने का आरोप है। वह इस मामले में गिरफ्तार किए गए 17 आरोपियों में शामिल हैं। पुलिस कुछ और डॉक्टरों की भूमिका की भी जांच कर रही है।
पूरे मामले में अब तक 16 एफआईआर दर्ज किए गये हैं
जांच में अब तक 16 एफआईआर दर्ज की गई हैं। पुलिस का कहना है कि आरोपियों ने पुरानी मौतों के मामलों का इस्तेमाल किया। इनमें सामान्य बीमारी, कैंसर, आत्महत्या और दूसरी वजहों से हुई मौतों को बाद में कागजों में सांप के काटने से हुई मौत दिखाने की कोशिश की गई। छत्तीसगढ़ सरकार सांप काटने से मौत होने पर पीड़ित परिवार को 4 लाख रुपये का मुआवजा देती है।
पुलिस के अनुसार, डॉक्टर प्रियंका सोनी ने यूक्रेन से एमबीबीएस की पढ़ाई की है। आरोप है कि उन्होंने फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट बनाने में मदद की और जांच के लिए जरूरी त्वचा के सैंपल भी नहीं लिए गए।
पुलिस अधिकारी ने बताया कि अब तक कम से कम चार फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट सामने आई हैं। इनमें सांप के काटने को मौत की वजह बताया गया था। इस पूरे मामले में कुछ और डॉक्टर भी जांच के घेरे में हैं। पुलिस का कहना है कि यह फर्जीवाड़ा साल 2019 से 2024 के बीच किया गया।
बिलासपुर के एसएसपी राजनेश सिंह के मुताबिक, इस गिरोह में एक वकील भी शामिल था। उसका काम था मृतकों के परिवारों को यह कहने के लिए तैयार करना कि उनकी मौत सांप काटने से हुई है। इसके बाद डॉक्टर से फर्जी प्रमाण पत्र बनवाया जाता था। वहीं, गिरोह के दूसरे लोग सरकारी अधिकारियों से इन दस्तावेजों को मंजूरी दिलाने का काम करते थे।
एसएसपी ने बताया कि फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट में SIMS अस्पताल के डॉक्टरों के नाम का इस्तेमाल किया गया और मौत की वजह गलत तरीके से सांप का काटना लिखी गई। इन दस्तावेजों को असली दिखाने के लिए पुलिस, पटवारी, डॉक्टर और अन्य सरकारी विभागों की नकली मुहर और हस्ताक्षर तक तैयार किए गए।
इन फर्जी कागजों के आधार पर सरकार से आर्थिक सहायता मंजूर कराई गई और पैसा लाभार्थियों के बैंक खातों में पहुंचा दिया गया। इसके बाद आरोपी आपस में रकम बांट लेते थे। जब पुलिस से पूछा गया कि यह मामला 2026 में ही क्यों सामने आया, तो एक अधिकारी ने बताया कि विधानसभा में एक विधायक ने यह मुद्दा उठाया था। इसके बाद सरकार ने मामले की जांच के आदेश दिए और पूरा फर्जीवाड़ा सामने आया।
