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एक शख्स ने बदल दिया चंबल का मिजाज, 16 साल में 1300 फुट ऊंचे टीले को ढहा कर बनाया रास्ता

चंबल घाटी को डाकुओं के आतंक के लिए बदनाम माना जाता रहा है। लेकिन त्रिभुवन सिंह के प्रयास ने चंबल की आम छवि बदल दी है..

Author इटावा | December 9, 2015 6:41 PM
चंबल की घाटी। (फाइल फोटो)

चंबल घाटी को डाकुओं के आतंक के लिए बदनाम माना जाता रहा है। लेकिन त्रिभुवन सिंह के प्रयास ने चंबल की आम छवि बदल दी है। उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के चकरनगर इलाके के डिभौली गांव के त्रिभुवन सिंह की कहानी बिहार के ‘माउंटेन मैन’ दशरथ मांझी से मिलती-जुलती है। त्रिभुवन ने अपनी 16 साल की कड़ी मेहनत से चंबल घाटी के चकरनगर इलाके में 1300 फुट ऊंचे टीले को समतल कर स्कूल के लिए रास्ता बनाया। इससे आस-पास के इलाके के लोगों के लिए आवाजाही का रास्ता बन गया। स्कूल बन जाने के बाद वहां कॉलेज भी खुलवाया जिसकी देखरेख 67 साल के त्रिभुवन खुद करते हैं। इसके अलावा वे इन दिनों चंबल घाटी के निवासियों को खेती के नए तरीके और पौधरोपण के लिए जागरूक कर रहे हैं।

त्रिभुवन 1999 में ब्लॉक प्रमुख थे। उन दिनों चंबल घाटी के आस-पास के इलाके गुंडागर्दी और डकैती के कारण बदनाम थे। आस-पास के गांव में पढ़ाई को लेकर न कोई माहौल था और न ही किसी का ध्यान खेती के प्रति था। ऐसे में त्रिभुवन ने इलाके की हालत सुधारने की ठानी। इलाके में आसपास कोई स्कूल नहीं था। ऊंचे टीले के कारण दूर बने स्कूलों में बच्चे पढ़ने नहीं जाते थे। त्रिभुवन नहीं चाहते थे कि इलाके के बच्चे अशिक्षा के दलदल में धंसें। उन्होंने टीला तोड़ने की ठानी। आस-पास के लोगों की मदद से टीले को घन (बड़े हथौड़े) से तोड़ना शुरू कर दिया।

शुरू में लोगों ने त्रिभुवन के काम को नहीं समझा। त्रिभुवन ने टीला समतल करने के साथ लोगों के मन से नाउम्मीदी का पहाड़ भी हटाना शुरू किया। ग्रामीणों को समझाया कि अगर टीले को समतल कर दिया तो आवाजाही आसान हो जाएगी और बच्चे भी स्कूल और कॉलेज जा सकेंगे। गांव के कुछ मजदूरों ने उनका साथ दिया। इसके साथ ही त्रिभुवन ने ‘बंदूक नहीं कलम चाहिए’ का नारा बुलंद कर चंबल घाटी विकास समिति बनाई जिसका लक्ष्य बालिका शिक्षा को बढ़ावा देना था।
चंबल घाटी में उन दिनों विलायती बबूल की खेती हुआ करती थी। इससे कटाव को रोकने में फायदा जरूर मिलता था। लेकिन इससे वहां की मिट्टी की उपजाऊ क्षमता कम होती जा रही थी। लोगों की सेहत पर भी इसका असर दिख रहा था। त्रिभुवन सिंह ने इलाके में आम के बागान लगाने के लिए जागरूकता फैलाई। इसके साथ ही खेती से जुड़े कई देसी नुस्खे बताए ताकि वहां के किसानों की स्थिति बेहतर हो सके।

त्रिभुवन की मेहनत का नतीजा दिखने लगा। गांव के पास एक स्कूल और एक कॉलेज की शुरुआत हुई। कुछ साल में टीला भी समतल कर दिया गया और दूसरे गांव के लोगों की आवाजाही के लिए आसान रास्ता भी बन गया। त्रिभुवन और उनके साथियों ने लोगों से घर-घर जाकर बच्चों को पढ़ने भेजने की अपील की। चंबल घाटी के चकर नगर इलाके में अब प्राइमरी स्कूल, इंटर कॉलेज और डिग्री कॉलेज भी है। गया प्रसाद वर्मा महाविद्यालय में आसपास के इलाकों से सैकड़ों छात्र-छात्राएं पढ़ने आते हैं। त्रिभुवन खुद इस महाविद्यालय की देखरेख करते हैं। इसके अलावा वे रोजाना ग्रामीणों के साथ खेती में सुधार के तमाम तरीकों पर भी चर्चा करते हैं। चंबल घाटी के इस इलाके में अब बंदूक नहीं विकास का बोलबाला है, जिसका बहुत श्रेय त्रिभुवन सिंह को भी जाता है।

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