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चंदौली लोकसभा सीट: गठबंधन के कारण कांटे की लड़ाई

राजनीतिक प्रेक्षकों का कहना है कि पिछली बार सपा-बसपा अलग अलग चुनाव लड़े थे लेकिन इस बार महागठबंधन हुआ है इसलिए इस बार चुनाव में भाजपा को काफी मेहनत करनी पड़ रही है।

Author May 13, 2019 3:37 AM
महेंद्र नाथ पांडेय और शिवकन्या कुशवाहा।

आशुतोष तिवारी

भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र नाथ पांडेय के कारण चंदौली लोकसभा सीट उत्तर प्रदेश में अंतिम चरण के मतदान के दौरान आकर्षण की एक और सीट है। बगल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी से लड़ रहे हैं जिस पर पूरे देश की निगाहें हैं। चंदौली में महागठबंधन से संजय सिंह चौहान चुनावी दंगल में पांडेय की चुनौती देने उतरे हैं जबकि कांग्रेस तथा जन अधिकार पार्टी से बाबूराम कुशवाहा की पत्नी शिवकन्या कुशवाहा मैदान में हैं। यहां पर मुख्य रूप से लड़ाई भाजपा, महागठबंधन एवं कांग्रेस में है।

तीनों राजनीतिक दल अपनी विजय पताका फहराने के लिए जातीय समीकरण बिठाने में लगे हुए हैं जबकि यहां की समस्याएं हाशिए पर हैं। चंदौली लोकसभा में पांच विधानसभा सीटें हैं जिनमें मुगलसराय, सैयदराजा तथा सकलडीहा तीन चंदौली जिले की हैं जबकि शिवपुर, अजगरा वाराणसी में आती हैं। कहीं किसी पार्टी के कार्यकर्ताओं के जरिए राष्ट्र हित की बातें करते हुये अपनी उपलब्धियां बताई जा रही है। तो कहीं एक दूसरे के उपर झूठ बोलने तथा गुमराह करने का आरोप लगाया जा रहा है। तथा कहीं पर काफी दिनों से देश को लूटने का बढ़ चढ़ कर आरोप लगाते हुये अपनी पार्टी का गुणगान करते हुये अपने प्रत्याशी को जिताने के लिए कहा जा रहा है। तथा कहीं युवाओं को दलितों तथा पिछड़ी एवं अति पिछड़ी जाति के वोटो को अपने पक्ष में करने के लिए अनेको लोक लुभावने सपने दिखाये जा रहे हैं। साथ ही कहीं-कहीं जाति तो कहीं धर्म का ककहरा पढ़ाते हुए मतदाताओं को पक्ष में करने का पूरा प्रयास किया जा रहा है।

भाजपा राष्ट्रवाद तथा विकास के मुद्दे पर वोट मांग रही है। जबकि अन्य दल भी विकास तथा मुख्य रूप से भाजपा की वादाखिलाफी को उठाकर चुनाव मैदान में हैं। चंदौली कृषि प्रधान जनपद है। यहां की मुख्य समस्याओं पर ध्यान देता हुआ कोई भी उम्मीदवार अभी तक चुनाव लड़ता दिखाई नहीं दे रहा है। हालांकि महेन्द्र नाथ पांडेय उन्हें दुबारा जिताने की अपील करते हुए वादा कर रहे हैं कि देश के पांच विकसित लोकसभा क्षेत्रों की श्रेणी में चंदौली लोकसभा से शामिल करवाएंगे।

राजनीतिक प्रेक्षकों का कहना है कि पिछली बार सपा-बसपा अलग अलग चुनाव लड़े थे लेकिन इस बार महागठबंधन हुआ है इसलिए इस बार चुनाव में भाजपा को काफी मेहनत करनी पड़ रही है। अगर 2014 के लोकसभा चुनाव को देखा जाए तो बसपा के उम्मीदवार डेढ़ लाख वोटों से हारकर दूसरे स्थान पर रहे थे जबकि सपा उम्मीदवार दो लाख मतों के साथ तीसरे स्थान पर आए थे। लेकिन इस बार सपा-बसपा व कुछ अन्य दलों का महागठबंधन होने से लड़ाई कांटे की रहेगी। वहीं कांग्रेस और जन अधिकार पार्टी का गठबंधन भी नुकसान पहुंचा सकता है। चंदौली से भाजपा के तीन बार सांसद रह चुके आनंद रत्न मौर्य भी पार्टी से नाराज होकर अलग हो गए हैं। इसका भी असर भाजपा के मतों पर पड़ सकता है। पहली बार मतदान के लिए मतदान केंद्रों पर पहुंचने वाले मतदाता भाजपा तथा मोदी को पसंद कर रहे हैं। लेकिन वहीं कुछ पुराने मतदाता तथा व्यापारी भाजपा की नीति से संतुष्ट नहीं हैं।

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