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आधी आबादी: जन्म से जीवन संध्या तक चिकित्सा में भेदभाव

आधी आबादी की नुमाइंदगी करने वाली महिला को न केवल जन्म के समय बल्कि उम्र के हर पड़ाव पर स्वास्थ्य सेवाएं पाने में भेदभाव का शिकार होना पड़ता है।

Author नई दिल्ली | March 14, 2018 1:48 AM
सांकेतिक फोटो

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की हाल में आई रपट बताती है कि देश भर मे तीन साल में शिशु गहन चिकित्सा इकाई में भर्ती होने वाले बच्चों में लड़कों की संख्या ज्यादा है। इसका अर्थ यह है कि नवजात लड़का अगर बीमार पड़ता है तो उसे हर स्तर पर इलाज कराने व बचाने की कोशिश होती है भले वह जीवन भर शारीरिक या मानसिक विकलांग ही क्यों न रहे। देश भर में 700 बीमार शिशु चिकित्सा इकाई (एसएनसीयू) होने के बावजूद लड़कियों को फायदा कम मिल पाता है। 2016-17 में इन केंद्रों में भर्ती लड़कों का फीसद 58.6 था जो 17-18 में 58.8 हो गया। लड़कियों की तादाद उसी अनुपात में कम हुई।

आधी आबादी की नुमाइंदगी करने वाली महिला को न केवल जन्म के समय बल्कि उम्र के हर पड़ाव पर स्वास्थ्य सेवाएं पाने में भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। सरकारी आंकड़े जहां नवजात शिशुओं (लड़का-लड़की) में भेदभाव को रेखांकित करते हैं वहीं स्वास्थ्य क्षेत्र के विशेषज्ञों के काम के दौरान मिले अनुभव भी यही कहते हैं कि महिलाओं को जीवन बचाने का अधिकार संविधान में ही मुकम्मल तौर पर हासिल है, जमीन पर ऐसा नहीं है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि नवजात शिशुओं को इलाज के लिए अस्पताल लाने के फैसले में यह अहम बिंदु है कि नवजात लड़का है कि लड़की। जो बच्चियां अस्पताल पहुंच भी जाती हैं उनका भी इलाज बीच में ही छोड़ दिया जाता है।

पंजाब के लुधियाना स्थित दयानंद मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में सन 2015-16 में दिल में सुराख (पीएफओ) से पीड़ित 519 बच्चों पर किए एक सर्वे में पता चला कि इसमें इलाज के लिए लाए गए लड़कों का फीसद 67 था जबकि लड़कियों का महज 33। जबकि अधिकांश मामलों में लड़कों की तुलना में यह बीमारी लड़कियों में ज्यादा है। बच्चों में दिल की बीमारी के मुफ्त इलाज के लिए देश भर में घूम कर काम करने व मध्य प्रदेश में वर्ष 2003 से स्पंदन नाम से मुहिम (जिसे बाद में मध्य प्रदेश सरकार ने अपना लिया) चलाने वाली डॉ स्मिता मिश्रा ने बताया कि बच्चों के दिल में जन्मजात नुस्क (एएसडी पीडीए ) के मामले सात से 10 फीसद होते हैं। इनमें से लडकों की तुलना में लड़कियों में यह कंजेनाइटल हार्ट डिफेक्ट दो गुना होता है। पेटेंट फोरामेनआवेल नामक बीमारी लड़कों में कम लड़कियों में अधिक होती हैं।

इसके बावजूद लोग लड़कों का इलाज कराने ज्यादा आते थे। उन्होंने बताया कि हमने रीवा में भी मुफ्त इलाज की मुहिम चलाई थी इसके बावजूद वहां भी लड़कियों को लेकर कम आते थे। इसी तरह ग्वालियर व छत्तीसगढ़ के रायपुर के अनुभव बताते हुए उन्होंने कहा कि अब भी मुफ्त इलाज के लिए तो फि र भी लड़कियों को लाते हैं पर उनके लिए जेब से खर्च करना तो अभी भी दूर की कौड़ी है। एम्स के रुमैर्टोआर्थराइटिस विभाग क ी डॉ उमा कुमार ने बताया कि यह बीमारी अधिकांशत: महिलाओं को होती है। इसमें महिला पुरुष का फीसद क्रमश: 80 व 20 है। इसके बावजूद यहां डे केअर में इलाज के लिए भर्ती मरीजों में महिलाओं का फीसद 60 व पुरुषों का 40 है। एम्स भुवनेश्वर के निदेशक डा एके महापात्रा ने बताया कि मस्तिष्क की ऐसी बीमारी जिसमें सर्जरी की जरूरत पड़ती है उसमें अस्पताल लाई जाने वाली महिलाओं का फीसद महज 35 से 40 है।

जबकि बीमारी महिलाओं में कम नहीं बल्कि ज्यादा ही है। उन्होंने बताया कि यों तो न्यूरो सर्जरी विभाग में महिला व पुरुष का वार्ड अलग नहीं होता जो भी बेड खाली है उसमें रख लेते हैं लेकिन दूसरे विभागों में तो पुरुषों के लिए 25 बिस्तर होते हैं तो महिलाओं के लिए महज10। जबकि थाइराइड, गालब्लडर, कैंसर ब्लडप्रेशर जैसी बीमारियां भी पुरुषों क ी तुलना में महिलाओं में अधिक होती है।

गुर्दे की बीमारी के विशेषज्ञ डॉ डी भौमिक ने बताया कि विडंबना है जहां कुर्भीनी सेक्रीफाइज की जरूरत होती है वहां महिलाएं अधिक होती हैं जहां फायदा देने की बात आती है उनकी संख्या कम हो जाती है। उन्होंने बताया कि गुर्दे के प्रत्यारोपण के लिए लाए जाने वाले कुल मरीजों में 65 फीसद पुरुष व 35 फीसद महिलाएं होती हैं, जबकि इनके लिए गुर्दा देने वालों में महिलाओं का फीसद 65 व पुरषों का महज 35 है। जहां जान को जोखिम में डालने की बारी आती है वहां भी महिलाओं को आगे कर दिया जाता है। बुजुर्गो में होने वाली बीमारी के विभाग (जेरियाट्रिक) के डॉ एबी डे का कहना है कि महिलाओं का स्वास्थ्य सबसे ज्यादा वंचित होता है। समाज की ऐसी संरचना बनी हुई है कि महिला खुद भी अपनी बीमारी असहनीय होने तक छुपाती है। डॉ राममनोहर लोहिया अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डा बीके तिवारी ने कहा कि महिलाओं की बीमारी का पता देर से चलता है और पुरुषों की तुलना में महिलाएं अधिक जीवट वाली होती हैं। यह बात चिकित्सकीय आधार पर बच्चों में भी देखी गई है कि लड़कियों की थोड़ी देखभाल भी उनकी सेहत बेहतर कर सकती है जबकि लड़कों में इसकी अधिक जरूरत पड़ती है।
 

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