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किसानों की अनदेखी पर घिरी केंद्र सरकार

विपक्ष ने सरकार पर कृषि क्षेत्र और किसानों को पूरी तरह नजरअंदाज करने का आरोप लगाया है। विपक्षी दलों के मुताबिक, सिर्फ कह देने भर से 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी नहीं होगी।

Author नई दिल्ली | Published on: March 11, 2016 1:45 AM
(File Pic)

विपक्ष ने सरकार पर कृषि क्षेत्र और किसानों को पूरी तरह नजरअंदाज करने का आरोप लगाया है। विपक्षी दलों के मुताबिक, सिर्फ कह देने भर से 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी नहीं होगी। सरकार को इसके लिए फौरी तौर पर राहत देने और ऋण माफी के साथ-साथ एक ठोस एकीकृत योजना भी बनानी होगी।

देश में फैले कृषि संकट पर गुरुवार को राज्यसभा में अल्पकालिक चर्चा की शुरुआत करते हुए कांग्रेस के प्रमोद तिवारी ने कहा कि संप्रग की तुलना में राजग सरकार में कृषि विकास दर में काफी अंतर दिख रहा है और कृषि की विकास दर काफी कम है। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान सरकार ने किसानों और युवाओं को पूरी तरह उपेक्षित कर दिया है।

उन्होंने कहा कि एक चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी का वेतन साल 1970 के मुकाबले आज 150 गुना बढ़ा है, शिक्षक व प्रोफेसर की आय 170 गुना, शीर्ष कार्य अधिकारियों की आय में1000 गुना की वृद्धि हुई है जबकि एमएसपी में मात्र 19 फीसद की ही वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि आज किसानों की हालत दयनीय है। पेट्रोलियम उत्पादों के दाम में गिरावट के लाभ से भी किसान वंचित रह गए। उन्होंने कृषि मंत्री से यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया कि किसानों की जरूरतों को पूरा किया जाए।

भाजपा के भूपेंद्र यादव ने चर्चा में हिस्सा लेते हुए कहा कि विगत लगभग 60 वर्षों में ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पादन में तो वृद्धि हुई लेकिन वह विकास टिकाऊ नहीं था। अन्य सामाजिक सूचकांकों के आधार पर देखा जाए तो उसके कारण किसानों की हालत बदतर होती गई। उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार ने कृषि क्षेत्र को गति देने के लिए तमाम पूर्व योजनाओं और कुछ नई योजनाओं को समायोजित कर इस वृद्धि को बढ़ाने और टिकाऊ बनाने का प्रयास किया है। उन्होंने कहा कि सरकार को किसानों की आय बढ़ाने के लिए खेती को बढ़ाने के साथ-साथ पशुपालन बढ़ाने की ओर भी अधिक ध्यान देना चाहिए।

सपा के चं्रदपाल सिंह यादव ने किसानों की दयनीय हालत के लिए केंद्र को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि उसे एक कानून बनाकर किसानों की तय आमदनी सुनिश्चित करनी चाहिए। अगर किसी कारण से किसानों को वह अपेक्षित लाभ नहीं होता तो सरकार उसकी भरपाई करे। सरकार खेती के लिए एक आयोग बनाए जो किसानों को उनकी लागत के साथ-साथ महंगाई के अनुरूप मूल्य दिलाने की व्यवस्था करे। बुंदेलखंड के किसानों की दुर्दशा का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि केंद्र को उत्तर प्रदेश सरकार की मदद के जरिए बुंदेलखंड के किसानों की मदद के लिए आगे आना चाहिए और उन्हें बगैर ब्याज के कर्ज दिया जाना चाहिए।

जदयू के केसी त्यागी ने कहा कि सरकार को किसानों के लिए एक माफी योजना लानी चाहिए ताकि उनके कर्ज माफ हो सकें और उन्हें कुछ राहत मिल सके। उन्होंने कहा कि केवल कहने से नहीं बल्कि करने से किसानों की समस्याएं हल होंगी इसलिए उनके लिए ठोस योजनाएं बनानी चाहिए। किसानों पर कुल एक लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। सरकार को उसे माफ करने की ओर ध्यान देना चाहिए क्योंकि वह निगमित घरानों को करोड़ों रुपए की कर्ज माफी देती है।

तृणमूल कांग्रेस के सुखेंदु शेखर राय ने कहा चुनाव से पहले सरकार ने किसानों के हित में स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों पर काम करने की मंशा जताई थी, लेकिन अब वह पीछे हट रही है। किसानों की उपज के लिए तय किया जाने वाला न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बगैर किसी वैज्ञानिक आधार के तय किया जाता है।

उन्होंने सरकार से पश्चिम बंगाल के महत्त्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्र जूट उद्योग को लाभप्रद बनाने के लिए भी काम करने को कहा। उन्होंने कहा कि जूट के लिए एमएसपी को इस स्तर पर तय किया जाए जो बाजार मूल्य से अधिक हो और जिससे किसान जूट उत्पादन के लिए प्रोत्साहित हो सकें।
बसपा के राजपाल सैनी ने कहा कि आज खेती फायदे के बजाए नुकसान दे रही है जिससे किसान खेती छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं। प्रधानमंत्री ने चुनाव से पहले स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों का समर्थन किया था, लेकिन उस वायदे को भुला दिया गया। उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने की मांग की और कहा कि यह क्षेत्र उत्पादन के मामले में अन्य जगहों को पीछे छोड़ने की ताकत रखता है।

किसानों के दो या पांच हजार के कर्ज के लिए तहसीलदार उसे बंद कर देता है, लेकिन करोड़ों रुपए का कर्ज हड़प कर जाने वाले उद्योगपतियों का कुछ नहीं किया जाता। उन्होंने कहा कि किसानों की उपज के भाव तय करने वालों को खेती के बारे में कुछ पता नहीं होता कि किसान किन हालातों और मुश्किलों में खेती करते हैं।

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