पूर्व एएमयू कुलपति के खिलाफ सीबीआई ने केस दर्ज किया, नियुक्ति के समय कानून तोड़ने का आरोप

सीबीआई ने यह कार्रवाई वर्ष 2007 में नसीम अहमद के पद से इस्तीफा देने के लगभग 10 साल बाद की है। वह 2002 से 2007 तक एएमयू के कुलपति थे।

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केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी सीबीआई।

केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के पूर्व कुलपति नसीम अहमद के खिलाफ वर्ष 2005 में विश्वविद्यालय में की गई एक अधिकारी की नियुक्ति में कथित अनियमितता और धोखाधड़ी के संबंध में मामला दर्ज किया है। सीबीआई ने यह कार्रवाई वर्ष 2007 में अहमद के पद से इस्तीफा देने के लगभग 10 साल बाद की है। वह 2002 से 2007 तक एएमयू के कुलपति थे। अधिकारियों ने कहा कि मामला एएमयू में वर्ष 2005 में सहायक वित्त अधिकारी के रूप में शकेब अरसलान की नियुक्ति से जुड़ा है। आरोप है कि यह नियुक्ति करते समय एएमयू के नियम कानून का उल्लंन किया गया। उन्होंने बताया कि सीबीआई ने अरसलान (जो अब संयुक्त वित्त अधिकारी हैं), यास्मीन जलाल बेग (अब वित्त अधिकारी) तथा अहमद के खिलाफ आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार रोकथाम कानून के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया है।

मामले के अनुसार अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने एक जनवरी 2014 को सहायक वित्त अधिकारी और उप वित्त अधिकारी के पद पर रिक्ति भरने के लिए विज्ञापन दिया था। इसके लिए 22 उम्मीदवारों ने आवेदन किया था। सीबीआई ने आरोपों पर प्रारंभिक जांच में पाया कि आवेदन करने वाले 22 उम्मीदवारों में से नौ उम्मीदवार सहायक वित्त अधिकारी पद के लिए योग्य पाए गए। इसमें अरसलान का नाम नहीं था। इसने कहा कि अरसलान ने सूची में अपना नाम न होने पर अभिवेदन दिया कि आवेदन छंटनी की प्रक्रिया में चार्टर्ड एकाउंटेंट की उनकी डिग्री को स्रातकोत्तर डिग्री के बराबर नहीं माना जा रहा है, जबकि एएमयू की अधिसूचना इन डिग्रियों का बराबर मानती है।

एजेंसी ने कहा कि उन्होंने तीन फरवरी 2005 को हुए साक्षात्कार में खुद को बुलाए जाने का आग्रह किया। तत्कालीन उप वित्त अधिकारी बेग ने तय नियम शर्तों का कथित उल्लंघन कर साक्षात्कार के लिए इस आधार पर अरसलान को बुलाए जाने की सिफारिश की कि चार्टर्ड एकाउंटेंट (सीए) की डिग्री किसी भी वित्तीय व्यक्ति के लिए अनुकूल योग्यता है और यदि किसी सीए ने सहायक वित्त अधिकारी पद के लिए आवेदन किया है तो विभाग के लिए एक संपत्ति होगा। सीबीआई की प्रांरभिक जांच के दौरान सामने आया कि फाइल बेग को नहीं भेजी गई थी, फिर भी उन्होंने इस पर नोट लिखा। इसने कहा कि नोट को रजिस्ट्रार के जरिए आगे भेजा गया और तत्कालीन कुलपति नसीम अहमद ने इसे मंजूरी दे दी।

प्राथमिकी में कहा गया कि सीबीआई की प्रारंभिक जांच में यह भी सामने आया कि सीए डिग्रीधारक एक और उम्मीदवार भी था जिसके 60 प्रतिशत अंक थे और अन्य उम्मीदवार भी थे जिन्होंने स्रातकोत्तर में 55 प्रतिशत से अधिक अंक हासिल किए थे जो विज्ञापन के अनुसार पद के लिए निर्धारित योग्यता अंक थे। अरसलान ने अपने अभिवेदन में यह छिपाया कि उन्होंने सीए की परीक्षा में 55 प्रतिशत से कम अंक हासिल किए थे और पार्ट-1 की अंकतालिका लगाकर अधिकारियों को गुमराह किया जिसमें उनके 55 प्रतिशत अंक थे।

इसने आरोप लगाया कि बेग ने यह छिपाया कि सीए डिग्रीधारक एक और उम्मीदवार भी था तथा आपराधिक साजिश के तहत अरसलान के नाम की सिफारिश कर दी। साक्षात्कार के आधार पर अरसलान उन तीन उम्मीदवारों में शामिल थे जिनके नाम की सिफारिश सहायक वित्त अधिकारी के पद के लिए की गई और कुलपति ने कार्यकारी परिषद की ओर से इसे मंजूरी दे दी। सीबीआई ने पाया कि कुलपति विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद की ओर से विशेष शक्तियों का इस्तेमाल कर सकता है, लेकिन इस तरह के फैसलों के बारे में आवश्यक रूप से परिषद को सूचना दी जानी चाहिए और चार अक्तूबर 2005 को हुई बैठक में ऐसा नहीं किया गया।

प्राथमिकी में आरोप लगाया गया है कि इस तरह खुलासा हुआ कि तत्कालीन कुलपति नसीम अहमद ने विज्ञापन में दी गई योग्यता के मानक से इतर जाकर एएमयू में सहायक वित्त अधिकारी पद के साक्षात्कार में बुलाने के लिए शकेब अरसलान की उम्मीदवारी को मंजूरी दे दी। नियुक्ति के मामले में दी गई ढील और मानक से इतर होने के बारे में सूचना कार्यकारी परिषद को नहीं दी गई और न ही उनसे पुष्टि कराई गई।

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