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पटेल आंदोलन पर बनी फिल्म को नहीं मिली सेंसर बोर्ड की हरी झंडी

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) ने पटेल आरक्षण आंदोलन पर बनी गुजराती फिल्म को हरी झंडी देने से इनकार कर दिया है।

Author अमदाबाद | June 16, 2016 4:58 AM
पहलाज निहलानी सेंसर बोर्ड (CBFC) के अध्यक्ष हैं।

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) ने पटेल आरक्षण आंदोलन पर बनी गुजराती फिल्म को हरी झंडी देने से इनकार कर दिया है। बोर्ड ने ‘सलगतो सवाल अनामत’ को यह कहते हुए प्रमाण पत्र देने से इनकार कर दिया कि मौजूदा स्वरूप में अगर यह फिल्म प्रदर्शित होती है तो इससे कानून व्यवस्था से जुड़ी समस्या और बिगड़ सकती है। सेंसर बोर्ड को फिल्म के संवादों से भी दिक्कत है। उसका मानना है कि संवाद भारत के संविधान निर्माता बीआर आंबेडकर के खिलाफ हैं। फिल्म को 17 जून को रिलीज किया जाना था।

क्षेत्रीय फिल्मों से जुड़े मामलों को देखने वाले सीबीएफसी कार्यालय अधीक्षक केडी कांबले ने कहा कि फिल्म को प्रमाण पत्र देने से इनकार इसलिए किया गया है क्योंकि इसके मौजूदा स्वरूप में इसे रिलीज किया गया तो इससे कानून व्यवस्था से जुड़ी समस्या और बिगड़ सकती है। क्योंकि फिल्म आरक्षण आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल के जीवन पर आधारित है, जो जेल में हैं और मामला विचाराधीन है। साथ ही फिल्म में डॉक्टर आंबेडकर और आरक्षण नीति के खिलाफ संवाद हैं।

निर्माताओं ने अब अपना आवेदन सीबीएफसी की पुनरीक्षण समिति को भेजा है और वे उसकी मंजूरी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। निर्देशक राजेश गोहिल ने कहा कि हम लोगों को हाल में सीबीएफसी की तरफ से जवाब मिला है, जिसमें उसने कहा है कि फिल्म हार्दिक पटेल पर आधारित है और वह जेल में हैं और कानून व्यवस्था से जुड़ी हुई दिक्कत के कारण उनके खिलाफ मामला चल रहा है। गोहिल ने कहा- हमारी फिल्म हार्दिक पटेल के जीवन पर आधारित नहीं है। हम लोगों की फिल्म पाटीदार आरक्षण आंदोलन पर आधारित है। हम लोगों ने यह बात कही है।

फिल्म में अहम भूमिका निभाने वाले मोबिन खान ने कहा- ऐसा लगता है कि सेंसर बोर्ड को गुजराती भाषा की भी बहुत कम जानकारी है। उसने कहा है कि फिल्म में बोले गए संवाद बाबा साहब आंबेडकर के खिलाफ हैं लेकिन बात ऐसी नहीं है। ठीक से सुना जाए तो सिर्फ एक बार उनका जिक्र है जब एक पात्र कहता है कि आंबेडकर ने भारतीय संविधान में आरक्षण की व्यवस्था की।

निर्माताओं ने कहा कि पिछले साल अमदाबाद के जीएमडीसी मैदान में पाटीदार आंदोलन के शुरू होने के एक महीने के भीतर ही उन्होंने फिल्म निर्माण शुरू कर दिया था और दो महीने पहले प्रमाणन के लिए इसे सेंसर बोर्ड को भेजा था। गुजराती फिल्म की कहानी दीपक पटेल पर केंद्रित है, जिसे उसके पिता की मौत के बाद अपनी शिक्षा और नौकरी के लिए संघर्ष करते हुए दिखाया गया है।

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