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MP चुनाव: बुंदेलखंड में यूपी इफेक्ट, यहां लीड रोल में कांग्रेस या बीजेपी नहीं बल्कि कोई और है

उत्तर प्रदेश से सटे जिलों में पड़ोसी राज्य की राजनीतिक छाप बाखूबी दिख रही है। बुंदेलखंड की 30 सीटों पर बीजेपी और कांग्रेस के अलावा बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) और समाजवादी पार्टी (एसपी) का दमखम देखने को मिल रहा है। जातीय समीकरण हावी होने की वजह से कई सीटों पर लड़ाई काफी पेचीदा है।

फोटो सोर्स: एक्सप्रेस आर्काइव

मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस में अधिकांश सीटों पर सीधी जंग है। लेकिन, राज्य के बुंदेलखंड क्षेत्र में लड़ाई दूसरे तरह की है। यहां पर सियासी समीकरण प्रदेश के बाकी इलाकों से बिल्कुल जुदा है। उत्तर प्रदेश से सटे जिलों में पड़ोसी राज्य की राजनीतिक छाप बाखूबी दिख रही है। बुंदेलखंड की 30 सीटों पर बीजेपी और कांग्रेस के अलावा बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) और समाजवादी पार्टी (एसपी) का दमखम देखने को मिल रहा है। जातीय समीकरण हावी होने की वजह से कई सीटों पर लड़ाई काफी पेचीदा है।

यही वजह है कि बीजेपी के विरोधी दल कई सीटों पर दोस्ताना फाइट कर रहे हैं। मसलन, जहां बीएसपी प्रभावी है वहां एसपी थोड़ा नरम होकर चल रही है और जहां एसपी या कांग्रेस प्रभावी है वहां पर बीएसपी नरम रुख अपनाए हुए है। इस इलाके की राजनीति यहां की भौगोलिक बनावट की तरह ही उबड़-खाबड़ है। जाति, समाज और मुद्दों के ट्राएंगल को साधने के लिए सभी अपना-अपना गणित भिंड़ा रहे हैं। गौरतलब है कि बुंदेलखंड में दलित और पिछड़ा वर्ग का वोट खासा प्रभाव रखता है। जिस तरफ यह वर्ग अपना रुख करता है उस प्रत्याशी की जीत पक्की मानी जाती है। ऐसे में दलित राजनीति की स्टालवार्ट मायावाती की बीएसपी और पिछड़ों में अच्छी-खासी पैठ रखनी वाली समाजवादी पार्टी का प्रभाव अधिकांश सीटों पर दिखायी दे रहा है।

जिस तरह से बीजेपी लगातार 15 सालों से सत्ता में बनी है और कांग्रेस उसे हटाने की पुरजोर कोशिश में लगी है। उसके मद्देनज़र बुंदेलखंड के यूपी से सटे जिलों में इन पार्टियों की लड़ाई डायरेक्ट नहीं है। यहां पर दोनों ही पार्टियों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बीएसपी या एसपी के नाव पर ही सवार होने की जरूरत है। हालांकि, स्थानीय स्तर पर नेता इसी गोटी को साधने की जीतोड़ कोशिश में जुटे हैं। लक्ष्य तक पहुंचने के लिए इन इलाकों में जातियों को साधने की हर मुमकिन कोशिश चल रही है।

बीजेपी विरोधी नेताओं का मानना है कि लगातार 15 सालों की सरकार-विरोधी लहर का लाभ गैर-बीजेपी पार्टियों को जरूर मिलने जा रहा है। एक तो लगातार तीन बार का शासन और ऊपर से पिछड़ों तथा दलितों की नाराजगी इस क्षेत्र में बीजेपी पर भारी पड़ती दिखायी दे रही है। हालांकि, बीजेपी के नेता इस परिस्थिति को सिरे से खारिज कर रहे हैं। उनका कहना है कि लोगों के जहन में शिवराज सरकार के कार्यकाल में हुए विकास को जनता अपने जहन में रखे हुए है और उसी को देखते हुए अपने मत के अधिकार का इस्तेमाल करेगी। बीजेपी नेताओं का कहना है कि बुंदेलखंड में शिवराज सरकार ने विकास के कई काम किए हैं और जनता को यह दिखायी भी दे रहा है। लिहाजा, जनता किसी भी जातिवाद के प्रभाव में नहीं आने वाली।

वैसे बीजेपी और कांग्रेस से अलग समाजवादी पार्टी और बीएसपी अपने-अपने फॉर्मूले पर काम कर रही हैं। एसपी का फोकस पूरी तरह बुंदेलखंड के 6 जिलों पर हैं। इसमें दमोह और दतिया भी शामिल है। वहीं, बीएसपी चंबल और विध्य क्षेत्र में अपनी बैठ मजबूत करने की कोशिश में जुटी है। वर्तमान विधानसभा में बीएसपी के 4 विधायक हैं। जिनमें सतना जिला (विध्य) से 2 और मुरैना जिला (चंबल) से 2 विधायक हैं। बीएसपी ने इस बार भी अपने चारों विधायकों को उनकी मौजूदा विधानसभा सीट से टिकट दिया है। माना जा रहा है कि बीएसपी प्रमुख मायावती 21 नंवबर से बुंदेलखंड, चंबल और विध्य क्षेत्र के विधानसभा सीटों पर प्रचार करेंगी। वहीं, एसपी की रणनीति में बीजेपी की ताकत को रोकना प्रमुख रूप से शामिल है। पार्टी के नेता भी मानते हैं कि कुछ सीटों पर कांग्रेस और बीएसपी के साथ उनकी अच्छी समझ बन गयी है।

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