सांस से आस

चुनाव के समय में तमाम पुराणे मुद्दे गौण हो जाते हैं तो कुछ बाहर ही नहीं आते।

चुनाव के समय में तमाम पुराणे मुद्दे गौण हो जाते हैं तो कुछ बाहर ही नहीं आते। कुछ मुद्दे नए बनते हैं तो कुछ को जबरन बनाया जाता है। अब दिल्ली में ही देखिए, यहां सांसों के संकट से शुरू हुई प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई अब राजनीतिक दलों का सियासी हथियार बनती नजर आ रही है। यहां की खराब होती हवा को नेता लोग और हवा देने में जुट गए हैं। इसके सहारे तो एक पार्टी दूसरे राज्य में भी अपना सिक्का जमाने में लगे हैं। पता चल रहा है कि सभी पार्टियों की प्रदूषण के मामले में उनके राज्य में हालत खराब ही है। इसलिए राज्यों को दोष देने का मतलब है खुद के लिए गड्ढा खोदना, इसलिए पार्टियां अब मुद्दे पर केंद्र की सरकार को घेरने में जुट गई हैं। देखिए, यह हवा किसका जीना दुश्वार करती है।
चूक ही चूक
दिल्ली से लगे नोएडा में जमीन से जुड़े कामकाज देखने वाले विभाग की जितनी कमियां सामने आती हैं वह एक तरह से कम ही हैं, क्योंकि यहां कमियों के भंडार में कोई कमी नहीं। कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी परियोजना पर काफी सख्त टिप्पणी की थी, उसके बाद भी सावधानी से काम करने की कोशिश भी सफल नहीं हो पाती है। यहां बिल्डर परियोजनाओं में सीवन शोधन संयंत्र को अनिवार्य बताने के नियम के चलते संबंधित विभाग के अधिकारी कार्रवाई के मूड में नजर आए। उसने धड़ाधड़ क्लब हाउस व बिल्डर के सेल्स कार्यालय को ही सील कर दिया। लेकिन बाद में अधिकारियों ने अपना माथा पकड़ लिया जब बिल्डर कंपनियों ने उल्टा नियम विभाग को पढ़ा दिया। हुआ दरअसल यूं कि जो बिल्डर कंपनियों ने दस्तावेज दिखाएं हैं उसमें 10 से 12 साल पहले कब्जा दे चुकी परियोजनाओं में क्रियाशील संयंत्र का कोई जिक्र ही नहीं है। अब बेचारे खिसयाए अधिकारी अपनी चूक मानते हुए सील खोलते फिर रहे हैं और मामले को रफा-दफा करने की कोशिश में जुटे हैं।
अर्थ का अनर्थ
हिंदी भाषा के प्रसार और प्रचार को लेकर सरकारी विभाग कितने संवेदनशील हैं या फिर प्रयासरत हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन दिनों हिंदी पखवाड़ा अधिकतर सरकारी विभागों में चल रहा है। कई विभाग हिंदी भाषा में सूचना साझा कर रहे हैं। पर मजेदार बात यह है कि पखवाड़े के दौरान सूचनाओं को साझा करने से पहले कई विभाग के संबंधित अधिकारी भाषा शैली का बिल्कुल भी ध्यान नहीं रख रहे हैं। कई बार तो देखा गया है कि अंग्रेजी भाषा से हिंदी में अनुवाद करने के लिए गूगल के अनुवाद टूल का इस्तेमाल किया जाता है। इस कारण कई बार अर्थ का अनर्थ होने की संभावना अधिक होती है। बावजूद इसके संबंधित विभाग अपनी आंखे बंद किए रहते हैं। बेदिल ने किसी को कहते सुना कि अगर हिंदी भाषा में जानकारी मिल रही हो तो उसे अंग्रेजी भाषा में दी गई जानकारी से मिला जरूर लो, वरना कुछ का कुछ समझ आएगा।
अजब समस्या
बीते दिनों रोहिणी अदालत में हुई गोलीबारी को लेकर वकीलों ने सुरक्षा व्यवस्था के लिए पुलिस को जिम्मेदार ठहराया। यह एक बड़ी समस्या बताई गई जिसके समाधान की जरूरत है। इसे लेकर पुलिस और वकील दोनों आमने-सामने है। लेकिन पुलिस की दिक्कत को कौन समझे भला। अदालत में प्रवेश से पहले जब भी वकीलों की जांच होने लगती वे इसे अपने मान और सम्मान से जोड़ बैठते। यहां बात खत्म नहीं हुई तो अपने लिए अलग से प्रवेश द्वार आबंटित करा लिया गया। जिसपर अपेक्षाकृत जांच हल्की होती है। अब पुलिस करे तो क्या करे! अदालत में गोलीबारी करने वाले अपराधी वकीलों के भेष में दाखिल हुए थे और संभवतया इसलिए वे हथियार लेकर अदालत परिसर में दाखिल होने में कामयाब हो गए। वारदात के बाद भी वकीलों के नेता सीसीटीवी कैमरों की चुस्ती सहित जांत की तकनीक बढ़ाने की बात कर रहे हैं, शारीरिक जांच की नहीं। किसी ने ठीक ही कहा, जब पुलिस की नहीं चलने दोगे तो व्यवस्था चाक-चौबंद कैसी होगी। दूसरे ने कहा-चित भी मेरी और पट भी मेरी, केवल शिकायत की नियत मेरी!
इतिहास रचेंगे
पुलिस विभाग के नए मुखिया ने शायद कुछ खास करने की कसम खा ली है। यही कारण है कि नियुक्ति के बाद से ही वे विभाग को बदलने के कोई न कोई नुस्खा तैयार रखते हैं। पहले पुलिस मुख्यालय में सीपी सचिवालय, फिर पुलिस वालों के लिए हरेक शुक्रवार को जनसुनवाई, थाने और पीसीआर को मिलाकर कुछ अहम फैसले लिए गए। यह सब चल ही रहा था कि रोहिणी कोर्ट में गोलीबारी हो गई। वैसे तो दिल्ली में पहले भी ऐसी घटनाएं हुई हैं लेकिन इस घटना ने तो सबको चौंका दिया, सुरक्षा व्यवस्था पर उंगली उठी अलग से। इसलिए इसका असर अगले ही दिन 40 आइपीएस के स्थानांतरण के रूप में दिखा। बेदिल को पता चला कि दिल्ली पुलिस के इतिहास में पहली बार एक साथ 40 आइपीएस का स्थानांतरण हुआ है। यह भी इतिहास रचने के समान है।
कुर्सी की चाहत
कुर्सी का मोह क्या-क्या नहीं कराता। यह अपनों में भी बैर करा देता है। दिल्ली के एक निगम में महापौर की गद्दी पर बैठ चुके नेता जी आजकल खाली हैं। जब वे पहली बार पार्षद बने तो पार्टी की ऐसी दया हुई कि वे एक समिति की सीढ़ी से चढ़कर महापौर की गद्दी तक पहुंचे। इनको सभी तरह के बड़े पद मिले उसमें निर्माण समिति से लेकर स्थायी समिति भी शामिल है। लेकिन पिछले चुनाव में हारने के बाद ही उनकी कामयाबी को जैसे ग्रहण लग गया। दिल्ली में अपना काफी व्यापार स्थापित कर चुके पूर्व माननीय ने अपनी खोई ताकत पाने और कुर्सी की चाहत में अब जोड़-घटाना शुरू कर दिया है। इसके लिए वे अपनी पार्टी के पार्षद के खिलाफ ही काम कर रहे हैं। बेदिल को पता चला कि अगर मौजूदा पार्षद की खामियां नजर नहीं आईं तो इनको टिकट मिलने से रहा। अगर टिकट नहीं मिला तो चुनाव लड़ना काफी मुश्किल होगा। इसलिए वे सभी बड़े पदों पर बैठे पदाधिकारियों को अपने पार्षद के खिलाफ चिट्ठी भेज रहे हंै।
-बेदिल

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