BMC House Crisis: मुंबई नगर निगम की 227 सीटों में से 79 पार्षदों का चुनाव इस समय कानूनी जांच के दायरे में है। सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत मिली जानकारी के मुताबिक, इन चुनावों को अलग-अलग आधार पर चुनौती दी गई है। इनमें कथित तौर पर अमान्य जाति प्रमाणपत्र, चुनावी हलफनामों में गड़बड़ी और आपराधिक मामलों व संपत्ति से जुड़ी अहम जानकारियां छिपाने जैसे आरोप शामिल हैं।
यह जांच राजनीतिक दलों, खासकर विपक्ष के लिए नई चिंता का कारण बन गई है। चुनौती दी गई 79 सीटों में से 42 सीटें विपक्षी दलों के पार्षदों के पास हैं। यानी आधे से ज्यादा सीटें विपक्ष की हैं। यह जानकारी नागरिक कार्यकर्ता अनिल गलगली ने आरटीआई के तहत बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) से हासिल की है।
यह आंकड़े मुंबई की पूर्व मेयर और शिवसेना (यूबीटी) की पार्षद विशाखा राउत को छह साल के लिए अयोग्य घोषित किए जाने के कुछ दिन बाद सामने आए हैं। राउत को ऐसे जाति प्रमाणपत्र जमा करने के मामले में अयोग्य ठहराया गया, जिसे अधिकारियों ने गलत क्षेत्राधिकार के तहत जारी किया गया प्रमाणपत्र माना था।
चुनाव को चुनौती दिए गए 79 पार्षदों में से पांच को जाति प्रमाणपत्र से जुड़े मामलों में पहले ही अयोग्य घोषित किया जा चुका है। इनमें विशाखा राउत भी शामिल हैं। आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक, बाकी 74 मामलों की राज्य सरकार जांच कर रही है।
इन चुनावों को कई तरह के आरोपों के आधार पर चुनौती दी गई है। इनमें अमान्य या गलत तरीके से जारी जाति प्रमाणपत्र, चुनावी हलफनामों में गलत या विरोधाभासी जानकारी और आपराधिक मामलों, संपत्ति तथा वित्तीय हितों से जुड़ी जानकारियां कथित तौर पर छिपाने के आरोप शामिल हैं।
राज्य निर्वाचन आयोग के नियमों के अनुसार, चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को हलफनामा देकर अपनी व्यक्तिगत, आर्थिक और कानूनी जानकारी सार्वजनिक करनी होती है। इन घोषणाओं में किसी महत्वपूर्ण तरह की गड़बड़ी पाए जाने पर उसे चुनाव याचिका दायर करने का आधार बनाया जा सकता है।
बीएमसी की 227 सीटों में से 78 पिछड़े वर्गों के लिए रिजर्व हैं
बीएमसी में कुल 227 निर्वाचित पार्षद हैं। इनमें से 78 सीटें पिछड़े वर्गों के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं। इसलिए जाति प्रमाणपत्र से जुड़े दस्तावेजों की जांच काफी महत्वपूर्ण हो जाती है।
चुनौती दी गई 79 सीटों में से 42 विपक्षी दलों के पास हैं। इनमें सबसे ज्यादा 24 सीटें शिवसेना (यूबीटी) की हैं। इसके बाद कांग्रेस की 10, एआईएमआईएम की पांच, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) की दो और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) की एक सीट है। सत्तारूढ़ पक्ष की बात करें तो चुनौती दी गई सीटों में 16 सीटें बीजेपी और सात सीटें शिवसेना के पार्षदों के पास हैं।
आंकड़ों से संकेत मिलता है कि चल रही जांच के दौरान अगर कोई पार्षद अयोग्य घोषित होता है तो इसका राजनीतिक असर विपक्ष पर ज्यादा पड़ सकता है। इसमें भी शिवसेना (यूबीटी) पर इसका असर सबसे अधिक होने की संभावना है।
मुंबई नगर निगम अधिनियम, 1888 के तहत अगर किसी निर्वाचित पार्षद को अयोग्य घोषित कर दिया जाता है तो उसकी सीट चुनाव में दूसरे स्थान पर रहने वाले उम्मीदवार को मिल सकती है। हालांकि, कानून अयोग्य घोषित किए गए पार्षद को अदालत में इस फैसले को चुनौती देने का अधिकार भी देता है।
बीएमसी के वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि इस प्रावधान की वजह से कुछ खाली हुई सीटों को भरने की प्रक्रिया पहले ही जटिल हो गई है। एक वरिष्ठ नगर निगम अधिकारी ने कहा, “कुछ अयोग्य घोषित किए गए पार्षदों ने लघु वाद न्यायालय का रुख किया है। जब तक अदालत कोई आदेश नहीं देती, तब तक उन सीटों पर नियुक्ति नहीं की जा सकती। जिन मामलों में अयोग्य घोषित पार्षद ने अदालत का रुख नहीं किया है, वहां सीट अपने आप चुनाव में दूसरे स्थान पर रहने वाले उम्मीदवार को चली जाती है।”
चुनौती दी गई सीटों में 60 प्रतिशत पार्षद विपक्षी दलों से हैं।
227 — बीएमसी की कुल सीटें
79 — कानूनी जांच के दायरे में आई सीटें
मूल आंकड़ों के अनुसार 79 चुनौती दी गई सीटों में:
- 42 — विपक्षी दलों के पास
- 23 — सत्तारूढ़ दलों के पास
- 14 — अन्य/जिनका विवरण स्पष्ट नहीं किया गया है
किन दलों के पार्षदों पर सबसे ज्यादा असर?
शिवसेना (यूबीटी) — 24 सीटें
बीजेपी — 16 सीटें
कांग्रेस — 10 सीटें
शिवसेना — 7 सीटें
एआईएमआईएम — 5 सीटें
मनसे — 2 सीटें
एनसीपी — 1 सीट
पांच पार्षद पहले ही अयोग्य
जाति प्रमाणपत्र से जुड़े मामलों में अब तक पांच पार्षद अयोग्य घोषित किए जा चुके हैं। इनमें मुंबई की पूर्व मेयर विशाखा राउत भी शामिल हैं।
74 मामले अभी लंबित
बाकी 74 मामलों की जांच चल रही है। इनमें जाति प्रमाणपत्र, चुनावी हलफनामे, आपराधिक मामले और संपत्ति से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक नहीं करने जैसे मुद्दे शामिल हैं।
क्या होगा सीटों का?
अगर किसी पार्षद को अयोग्य घोषित किया जाता है तो उसकी सीट खाली हो सकती है। ऐसी स्थिति में चुनाव में दूसरे स्थान पर रहने वाले उम्मीदवार को सीट मिलने का रास्ता खुल जाता है। हालांकि, अगर अयोग्य घोषित पार्षद अदालत में फैसले को चुनौती देता है तो अदालत का फैसला आने तक सीट भरने की प्रक्रिया रुक सकती है।
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