कुंद है भाजपा के जवाबी आरोपपत्र की धार!

हिमाचल प्रदेश में आरोपपत्रों का भूत एक बार फिर से सिर उठा रहा है।

सांकेतिक फोटो।

ओमप्रकाश ठाकुर

हिमाचल प्रदेश में आरोपपत्रों का भूत एक बार फिर से सिर उठा रहा है। कांग्रेस तो प्रदेश की जयराम सरकार के भ्रष्टाचारों के कारनामों को लेकर आरोपपत्र तैयार करने में जुटी ही है, लेकिन अब जयराम सरकार भी पिछली वीरभद्र सिंह सरकार के खिलाफ तत्कालीन भाजपा की ओर से राज्यपाल को सौंपे आरोपपत्रों को लेकर कांग्रेस के नेताओं को खामोश करने में जुट गई है। यह दीगर बात है कि जयराम सरकार को साथ ही समझ आ गया है कि पिछले आरोपों को चार साल बाद सामने लाने का कोई ठोस फायदा नहीं होने वाला।

नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री कुछ अरसा पहले जयराम सरकार के भ्रष्टाचार के कारनामों को लेकर बहुत मुखर हो गए थे। देखादेखी कौल सिंह और जीएस बाली भी सक्रिय होने लगे थे। इस बीच एक दिन जयराम ठाकुर ने राज्य सतर्कता ब्यूरो के अधिकारियों की बैठक तलब की और 2017 से पहले तत्कालीन कांग्रेस सरकारों के खिलाफ पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल की कमान में सौंपें आरोपपत्रों पर चल रही जांच को लेकर कुछ समीक्षा कर ली। जयराम की ओर से इतना भर ही करना था कि कांग्रेस के इन नेताओं की मुखरता कुछ नरम हो गई। जयराम सरकार के अभी चार साल पूरे नहीं हुए हैं। ऐसे में कांग्रेस के नेता जानते हंै कि आरोपपत्रों के सहारे अगर राजनीतिक जुबान से ही जनता के बीच मुहिम चलाई गई तो कांग्रेस में 2022 के चुनावों में मुख्यमंत्री पद के कई दावेदारों की दावेदारी खतरे में आ जाएंगी।

कांग्रेस में अभी छह नेता है जो पूर्व वीरभद्र सिंह सरकार में मंत्री रहे थे। इनके कारनामों को लेकर तब तत्कालीन भाजपा ने खूब शोर मचाया था। अगर पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल मुख्यमंत्री बन गए होते तो निश्चित तौर पर वह कांग्रेस को कमजोर करने के लिए इन नेताओं के खिलाफ जांच चलाते। लेकिन धूमल 2017 का विधानसभा का चुनाव हार गए और वे मुख्यमंत्री नहीं बन पाए। ऐसे में जयराम ठाकुर मुख्यमंत्री बन गए।

पार्टी के बड़े नेताओं ने उन्हें पहले दिन से ही मुख्यमंत्री मंजूर नहीं किया, लेकिन जयराम आलाकमान के सहारे धूमल व उनके खेमे को हाशिए पर धकेलने में कामयाब रहे। इस दौरान उन्होंने भाजपा के आरोपपत्रों को ठंडे बस्ते में डाल दिया। तात्कालिक तौर पर इसका उन्हें लाभ भी मिला और कांग्रेस उन्हें लेकर ज्यादा मुखर नहीं रही। पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र ने तो एक तरह से जयराम ठाकुर को अपना पूरा समर्थन ही दे दिया था। वे उनकी तरफदारी करने में कभी भी पीछे नहीं रहे। वीरभद्र सिंह नहीं चाहते थे कि धूमल किसी भी तरह से मजबूत हो। यही जयराम भी चाहते थे।

इसी तरह जयराम सरकार के तीन साल निकल गए और कांग्रेस नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के तमाम इल्जाम हवा हो गए। लेकिन अब अचानक कांग्रेस ने जयराम सरकार के खिलाफ आरोपपत्र तैयार करने को लेकर एक समिति गठित कर दी है। इस आरोपपत्र समिति का अध्यक्ष दस जनपथ के करीबी नेता व पूर्व कांग्रेस विधायक राजेश धर्माणी को बनाया गया है।

समिति में ऐसा एक भी नेता नहीं है जिसके खिलाफ भ्रष्टाचार का इल्जाम रहा हो। कहा जा रहा है कि कांग्रेस ने यह सब सोची समझी रणनीति के तहत किया है। ऐसे में जयराम व उनकी सरकार को अब जाकर पता चला कि अगर वे शुरू से ही कांग्रेस नेताओं के खिलाफ आरोपपत्र में लगाए गए आरोपों की जांच चलाए रखते तो उस जांच को अब जाकर राजनीतिक तौर पर भुनाया जा सकता था। लेकिन इस मामले में अब उनके हाथ में कुछ नहीं बचा है। वे सतर्कता ब्यूरों के अधिकारियों की बैठकें कर कुछ दिनों तक कांग्रेसियों को चुप तो करा सकते हंै लेकिन यह ज्यादा दिन तक चलने वाला नहीं है।

कांग्रेस नेताओं की रणनीति तो है ही यह कि जयराम सरकार सतर्कता ब्यूरो की जांच को लेकर जितनी देरी से बात करेगी उन्हें उतना ही लाभ मिलेगा। एक तो सतर्कता ब्यूरो अब ज्यादा कुछ करेगा नहीं। दूसरे कांग्रेस के पास अब यह हल्ला मचाने का मौका मिल जाएगा कि अगर कांग्रेस नेताओं ने भ्रष्टाचार किया होता तो सरकार को जांच कराने में चार साल नहीं लगते। संभवत: जयराम ठाकुर व उनके कुनबे में कुछ नेताओं को अब समझ आ रहा है कि बड़ी चूक हो गई है। जयराम व उनकी सरकार अब उपचुनावों के मुहाने पर है व इसके बाद 2022 के चुनाव हैं।

वह खुद तो कांग्रेस के भ्रष्टाचार को लेकर बने आरोपपत्र को लेकर कोई जांच नहीं करा सकी लेकिन अब उल्टे उनके खिलाफ कांग्रेस ही आरोपपत्र बनाने पर आ गई है। जयराम ठाकुर जिस आरोपपत्रों की संस्कृति को खत्म करने की मंशा पाले हुए थे अब वह उन्हीं आरोपपत्रों की आंच में आने वाले हंै।

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