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दिल्ली मेरी दिल्ली: भाजपा की चिंता, पार्टी में बिखराव और हार का अनुमान

लोकसभा चुनाव में तो पार्टी नेतृत्व ने केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण को सुपर प्रभारी बनाकर गुटबाजी को काबू करने की कोशिश की थी। दूसरा, पूरा ही चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर हो रहा था, इसलिए गुटबाजी का ज्यादा असर नहीं दिखा।

Author May 27, 2019 4:02 AM
करीब ढाई साल पहले दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष बने मनोज तिवारी का पहले ही दिन से भाजपा का एक वर्ग विरोध कर रहा है और पार्टी में ही काबिज लोग असहयोग कर रहे हैं।

बेदिल-

लोकसभा चुनाव में भारी विजय के बाद दिल्ली भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी ने अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारी का एलान कर दिया। जाहिर है मनोज तिवारी दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष हैं और दोबारा लोकसभा चुनाव जीते हैं तो उनको ऐसा कहना ही चाहिए। उनके समर्थक उन्हें मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाने का अभियान 2017 के निगम चुनावों से चलाए हुए हैं, वे भी पहले से ज्यादा इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाएंगे, लेकिन मूल सवाल है कि ऐसे हालात में दिल्ली भाजपा विधानसभा चुनाव की ढंग से तैयारी कर पाएगी। करीब ढाई साल पहले दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष बने मनोज तिवारी का पहले ही दिन से भाजपा का एक वर्ग विरोध कर रहा है और पार्टी में ही काबिज लोग असहयोग कर रहे हैं। दिल्ली भाजपा में पहली बार ऐसा हुआ है कि प्रभारी और संगठन महामंत्री का भाजपा अध्यक्ष से तालमेल नहीं है। लोकसभा चुनाव में तो पार्टी नेतृत्व ने केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण को सुपर प्रभारी बनाकर गुटबाजी को काबू करने की कोशिश की थी। दूसरा, पूरा ही चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर हो रहा था, इसलिए गुटबाजी का ज्यादा असर नहीं दिखा। अब तो सब कुछ दिल्ली पर केंद्रित होगा। भाजपा दिल्ली की सत्ता से 21 साल से बाहर है। चुनावी तैयारी से बड़े सवाल दिल्ली भाजपा को संभालने की लगती है।

पार्टी में बिखराव
पांच साल पहले देश का नेता बनने के लिए सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती देने वाराणसी पहुंचे आम आदमी पार्टी (आप) के मुखिया अरविंद केजरीवाल के सामने अपनी पार्टी के वजूद को बचाने की चुनौती है। वे लोकसभा चुनाव तक अपनी पार्टी को दिल्ली से बाहर निकालकर कई राज्यों की पार्टी बनाने की हसरत पाले हुए थे और इसी के कारण दिल्ली के अलावा हरियाणा, पंजाब, चंडीगढ़ और गोवा में कांग्रेस के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ना चाहते थे। इस अति महत्त्वाकांक्षा के कारण देश का नेता बनना तो दूर अब दिल्ली के नेता बनने पर भी सवाल उठने लगे हैं। पिछली बार पंजाब में लोकसभा की चार सीटें जीतने के बाद स्थानीय विधानसभा में उसे सत्ता का दावेदार माना जा रहा था। विधानसभा चुनाव ‘आप’ हारी और दो सांसदों के पार्टी छोड़ने के बाद पार्टी छोड़ने वालों की लाइन ही लग गई। पंजाब में आई एक सीट ने ‘आप’ का मान बचाया, दिल्ली में वे तीसरे नंबर पर पहुंच गए। अब सवाल दोबारा विधानसभा जीतने के साथ-साथ पार्टी में बिखराव रोकने का भी है।

हार का अनुमान
चुनाव में जीत का दावा करने में हर उम्मीदवार आगे रहता है। चाहे वह किसी पार्टी से हो या निर्दलीय। नेताजी के दावों को कोई काट नहीं सकता। दिल्ली के पांच संसदीय क्षेत्र में 20 से ज्यादा लोग चुनाव मैदान पर थे। गिनती तक सब जीत रहे थे, लेकिन कनॉट प्लेस स्थित एनपी बंगाली गर्ल्स सीनीयर सेकेंडरी स्कूल में हुई नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र के मतगणना केंद्र में पहले चुनाव लड़ रहे कई लोग तो पहुंचे ही नहीं। जो पहुंचे भी उनमें से ज्यादातर पहले ही राउंड में चलते बने। किसी ने ठीक ही कहा-ये सच्चे मौसम वैज्ञानिक साबित हुए। जीत वाली सुनामी व हार वाले तुफान दोनों को तुरंत अनुमान लगा बैठे। अपनी नैय्या भी तो बचानी थी। तभी तो पहले खिसक लिए। क्योंकि दस घंटे बाद जो नतीजे आए उसने सब कुछ साफ कर दिया। किसी को 200 तो किसी को 400 वोट मिलते नजर आए। 22 उम्मीदवार तो एक हजारी नहीं बन सके। दो को छोड़ सबकी जमानत जब्त।

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