ताज़ा खबर
 

बेबाक बोल- बेकार सियासत

आत्ममुग्ध होने की भी हद है और खुद पर मोहित रहना एक कला ही है। अब धीरे-धीरे पुरानी पड़ रही दिल्ली की आम आदमी की सरकार को भी शायद यही लग रहा है कि अपने फैसलों पर खुद ही इतरा कर और दूसरों पर थोप कर वह महानता का दर्जा हासिल कर लेगी।

दिल्ली में फेल ओड-इवन का खेल

दिल्ली में प्रदूषण पर आपातकाल जैसे हाल के बाद और अदालती फटकार के बाद इस साल के शुरू में आम आदमी पार्टी की सरकार ने पंद्रह दिनों के लिए सम-विषम योजना शुरू की। पहले चरण में तो लोगों ने इसे पिकनिक की तरह लिया, स्कूल बंद होने के कारण बहुत से मां-बाप बच्चों को लेकर दिल्ली से बाहर निकल गए और दिल्ली की जीत, दिल्लीवालों की जय-जयकार के बीच सब ठीक से निपट गया। सरकार ने एलान किया कि चालान से जुटे पैसों का उपयोग साइकिल ट्रैक बनाने और सड़कों से धूल हटाने वाली मशीन मंगवाने में खर्च किया जाएगा। लेकिन दो महीने बाद सरकार ने सड़कों पर सूरते हाल संवारने के बजाए फिर से अपनी वाहवाही के लिए सम-विषम को उन लोगों के सिर थोप दिया जो अपनी कार से सड़कों पर निकलते हैं। जनता भी समझ गई कि सम-विषम महज आप का शिगूफा है। सड़कों पर निकले लोगों ने खूब चालान कटवाए और ‘कारवाले’ होने का दंड भुगतने के लिए सरकार को ‘दिल से’ कोसा। सरकार पर पलटवार के लिए फर्जी सीएनजी स्टिकर, नंबरों का गोरखधंधा भी शुरू हुआ और नतीजा था सड़कों पर बेकाबू जाम और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का बयान, ‘वायु की गुणवत्ता में सुधार का कोई आंकड़ा नहीं है’। कुछ लोगों को बे-कार कर आत्ममुग्ध सत्ता का हासिल क्या रहा, पढ़ें बेबाक बोल में।

आत्ममुग्ध होने की भी हद है और खुद पर मोहित रहना एक कला ही है। अब धीरे-धीरे पुरानी पड़ रही दिल्ली की आम आदमी की सरकार को भी शायद यही लग रहा है कि अपने फैसलों पर खुद ही इतरा कर और दूसरों पर थोप कर वह महानता का दर्जा हासिल कर लेगी। इसलिए उसे यह परवाह भी नहीं कि उसके इस दंभ की कोई बुनियाद है भी या फिर यह महज एक छलावा है।
मुश्किल यह है कि आत्मतुष्टि के इस भाव की महिमा ऐसी गजब है कि कोई कभी भी इस पर पुनर्विचार के लिए भी तैयार नहीं होता। यह भी सच है कि घर में अपनी जिस अलमारी को आप खुद ही अपना विजयोपहार मान कर सजाते हैं, उसे आप अपनी नाकामी के हस्ताक्षर के तौर पर कैसे स्वीकार कर सकते हैं!

ऐसे में यह हैरानी की बात नहीं कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की सरकार अपनी सम-विषम योजना पर समग्र तरीके से विचार करने को तैयार ही नहीं। अपने फैसले पर सरकार खुद ही अपनी ऐसे जय-जय कर रही है कि वह हरेक उस पहलू को बिना सुने ही नजरअंदाज कर दे रही है, जो इसके विपरीत हो। सोने पर सुहागा तो यह है कि आत्मतुष्टि के अतिरेक में इसी को आत्मप्रचार का माध्यम भी बना लिया गया। लिहाजा हर खंभे पर केजरीवाल की तस्वीर मानो सम-विषम की घोषणा कर रही है। छोटे पर्दे पर वे खुद ही आकर छोटे-छोटे बच्चों से अपील कर रहे हैं कि जो भी ‘अंकल जी’ नियमों की अवहेलना करते दिखाई दें, उन्हें एक फूल देकर या बिना फूल दिए कहें, ‘अंकल जी गलती से आप गलत गाड़ी ले आए हैं, प्लीज वापस चले जाएं’। गोया कानून को धता बताने निकले ‘अंकल जी’ को किसी बच्चे की बात की परवाह होगी। यह भी तय नहीं कि सम-विषम के चक्कर में आॅटो या रिक्शा या बस या दुपहिया वाहन या किसी भी और वाहन से स्कूल जाने को विवश ये बच्चे ‘केजरीवाल अंकल’ से नाराज न हों। हालांकि स्कूली बच्चों को तो छूट देकर इस नाराजगी से बचने की कोशिश की गई, लेकिन क्या दिल्ली की सड़कें सिर्फ स्कूल जाने भर के लिए ही हैं?

फूल देकर मनाने का जो फार्मूला केजरीवाल सबको दे रहे थे, वह उनके परिवहन मंत्री गोपाल राय ने भाजपा सांसद विजय गोयल पर आजमाया और नाकामी का कड़वा स्वाद भी चखा। एक फूल के बदले पूरा गुलदस्ता और अपना-सा मुंह लेकर लौटे। अब जब यह फार्मूले के तहत की गई उनके मंत्री की कोशिश ही सार्वजनिक तौर पर नाकाम हो गई, तो बाकी जगह इसके कामयाब होने की आखिर क्या गारंटी है।
एक इश्तहार की बानगी देखिए। स्कूल में शिक्षक बजाए पढ़ाने के सम-विषम का प्रचार कर रही हैं। सम-विषम को लेकर कक्षा में पढ़ाई की दिशा ही परिवर्तित कर दी है। और इस पर आत्मबोध या आत्मविचार करने के बजाय सरकार मनमुदित है।

दिल्ली के पर्यावरण की चिंता इस शहर के और देश के हर व्यक्ति को है। आखिर राष्टÑीय राजधानी होने के नाते दिल्ली पर सबका हक बराबर है। लेकिन इस सम-विषम ने अपनी चुभन देश के अलग-अलग हिस्से से आने वाले व्यक्ति को महसूस कराई है। ऐसा लगता है जैसे दिल्ली के प्रदूषण का एकमात्र कारण सिर्फ निजी कारें ही हैं, टैक्सियां या फिर दुपहिया, सीएनजी और दूसरे व्यावसायिक वाहन नहीं। गुजरात हाई कोर्ट में सरकार की ओर से दायर एक हलफनामे में कहा गया है कि सीएनजी इंजन डीजल वाहनों से कहीं ज्यादा ग्रीनहाउस गैस छोड़ते हैं। इसके अलावा डीजल वाहनों को सीएनजी में बदलने से भारी वित्तीय बोझ भी बढ़ेगा। अब तो आलम यह है कि सम-विषम के आने से ट्रैफिक जाम की समस्या से भी कोई खास निजात नहीं। कारण साफ है कि 31 मार्च 2015 तक दिल्ली में 88.27 लाख वाहन पंजीकृत थे जिनमें चारपहिया वाहनों की तादाद 32 फीसद के आसपास ही थी।

इसमें भी कारों की संख्या कितनी है, इस पर विवाद है। अगर बीस फीसद के आसपास भी मान ली जाए तो उसमें सीएनजी कारें भी हैं। अहम व्यक्तियों की छूटशुदा गाड़ियां भी हैं। नियम की धज्जियां उड़ाने वाले फर्जी स्टिकर लगा कर चलने वाली गाड़ियां भी हैं। ऐसे ही और भी वर्गीकरण हो सकता है। अब उन लोगों का सोचिए जिन्हें दिल्ली में एक ही दिन का काम है। वे एक दिन पहले आएं या सुबह आठ बजे से पहले दिल्ली में अपने गंतव्य पर पहुंचे और दिन में बारह बजे काम खत्म होने के बाद भी वापस जाने के लिए रात के आठ बजने का इंतजार करें। सम-विषम के पहले प्रयोग से आई दुश्वारियों से दिल्ली सरकार अनजान नहीं थी। इसके बावजूद दूसरी पारी खेलते हुए उनका कोई तर्कसंगत हल पेश नहीं किया गया। फर्क आया तो इतना जितना – ‘वंस अपॉन ए टाइम इन मुंबई’ के दूसरे भाग का सिनेमाघरों में लगने से आया। याद रहे, ‘दिल्ली, कहे दिल से, आॅड-इवन फिर से’।

इस जुमले में दिल्ली जो कहे दिल से, पर शुबहा है क्योंकि अगर ऐसा होता तो इस पर असंतोष का ऐसा सैलाब न उमड़ता। आम जनता के साथ सांसदों ने भी बगावत कर दी और योजना के दौरान परेश रावल विषम नंबर के दिन अपने सम नंबर की कार से संसद सत्र में भाग लेने के लिए पहुंचे। संसद में भी इस योजना के कारण हुई असुविधा का मामला उठा। भाजपा नेता विजय गोयल ने कहा कि इस बार तो आप के विधायक और नेता भी इस योजना से खुश नहीं हैं, लेकिन डर के मारे कुछ बोल नहीं रहे हैं। वकील योजना से छूट पाने के लिए अदालत पहुंचे तो राजधानी की सड़कों पर योजना का उल्लंघन करने वालों के खूब चालान कटे। योजना के पहले दिन ही 1300 से ज्यादा चालान कटे जो इस बात का सबूत है कि आम लोग इस योजना से जुड़ नहीं पाए।

सरकार के साथ यही विडंबना है कि इस फिल्म का दूसरा भाग चलाते हुए उसने दिल्ली वालों के न तो दिल का हाल जानने की कोशिश की और न ही उसे कोई तरजीह दी। बस आत्मप्रचार के एक कामयाब माध्यम की तरह इसे फिर से लागू कर दिया। शहर के प्रदूषण पर सबकी चिंता एक जैसी है। लेकिन उसे दूर करने के लिए जो रास्ता सरकार ने चुना, उस पर कई ओर से अगर सवाल उठ रहे हैं तो उसका आधार है। यह एक तरह का लक्ष्य साधन है जिसकी चपेट में एक वर्ग विशेष ही आ रहा है। योजना के दूसरे चरण में सरकार यातायात जाम पर काबू नहीं पा सकी। जाम इसलिए लगे कि लोगों ने सम-विषम से बचने का विकल्प चुन लिया। जिसे कार में ही सफर करना है, वह टैक्सी बुला लेगा। जिस शहर में एक मंजिल पर रहने वाला दूसरी मंजिल वाले के साथ दुआ-सलाम से आगे न बढ़ता हो वहां कार पूलिंग की आशा दिवास्वप्न ही है। लोगों ने इस दौरान दो गाड़ियों का जुगाड़ कर लिया। जिन घरों में दो गाड़ियां हैं उनके नंबरों की अदला-बदली हो रही है। पुरानी कारों के बाजार में नई चमक आ गई। कई ने दुपहिया वाहन खरीद लिए हैं, जिनके कारण प्रदूषण पर असर भी नाममात्र ही पड़ रहा है। टैक्सी व तिपहिया वाहनों की लूटखसोट के किस्से तो अब आम हैं ही। योजना शुरू होते ही ऐप आधारित ओला और उबर जैसी कंपनियों ने ‘सर्ज प्राइस’ के नाम पर दादागीरी ही शुरू कर दी।

तो फिर पिसा कौन? एक खास वर्ग। क्या पर्यावरण को सुरक्षित रखना सिर्फ इसी वर्ग की जिम्मेदारी थी। क्या इससे एक सामाजिक विभेद नहीं पैदा हुआ? सरकार को चाहिए कि वह पर्यावरण की सेहत के लिए सामूहिकता की भावना का विकास करे, सड़क पर एक समावेशी ढांचे का विकास करे। जब तक इस प्रयास को सामूहिक चेतना से नहीं जोड़ा जाएगा इसका असर न के बराबर ही होगा। पर्यावरणविद् भी यही कह रहे हैं कि सिर्फ निजी कारों पर बंदिश लगा कर इस योजना से कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता है।

सरकार का दावा है कि सम-विषम के दूसरे चरण में लोगों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और इसका असर भी बहुत हुआ। लेकिन योजना के खिलाफ मुखर हुए लोग सरकार के इस दावे की पोल खोल रहे हैं। सच यह भी है कि इस चरण का सामना करने के लिए लोगों ने पुराने अनुभवों के आधार पर योजना तैयार कर ली थी। अपने लिए उन्होंने वैकल्पिक वाहन जुटा लिए थे। और उल्लंघन करके अपना विरोध दर्ज कराने वाले भी तैयार बैठे थे। यही हुआ भी। सांसदों से लेकर आम आदमी तक उल्लंघन करते पकड़े गए। या यों कहा जाए कि यह उल्लंघन इस योजना के खिलाफ बगावत ही है। दिल्ली के लिए सबका दर्द एक जैसा ही है।

लेकिन क्या लोगों में जागरूकता लाए बिना, उन्हें भरोसे में लिए बिना, या महज अपनी तस्वीर चमकाकर ही यह काम हो सकता है? आंकड़ों की नजर से भी देखें तो इस बार प्रदूषण पर ज्यादा असर नहीं पड़ा। जो पड़ा भी पर्यावरणविदों ने उसका श्रेय मौसम को दिया न कि सम-विषम को।
सबसे ज्यादा एतराज तो लोगों को इस नीति को चुनिंदा तरीके से लागू करने पर ही है। सरकार की हिम्मत न तो इस नियम को दुपहिया वाहनों, न तिपहिया और न ही टैक्सी वालों पर लागू करने की है। दुपहिया वाहनों पर लागू होते ही सरकार के वोट बैंक में सेंध लगने की आशंका है। और टैक्सी और तिपहिया वाहनों के सहारे तो सरकार ने सत्ता पर कब्जा जमाया था। हर तिपहिया वाहन के पीछे आप का झाड़ू चुनाव के समय सुशोभित था। इनको इस नियम की सीमा में खींचते ही विरोध का स्तर ही तेज हो जाता और सरकार को लेने के देने पड़ जाते। तो फिर क्यों इस सबके लिए मध्यवर्ग पर ही आसान निशान साधा गया?

अगर सरकार की नीयत साफ है और उसके मन में दिल्ली के लिए दर्द है तो क्यों न तीसरा चरण सिर्फ दुपहिया या तिपहिया वाहनों के लिए हो। यह फिर चाहे एक ही हफ्ते के लिए हो और फिर उसके असर का विश्लेषण भी हो। ऐसी राजनीतिक इच्छाशक्ति से जिसके केंद्र में वोट की सोच न हो ऐसी विकराल समस्या से लड़ा जा सकता है। हिम्मत तो चाहिए!

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App