सांसद सुकांता मजूमदार पश्चिम बंगाल बीजेपी के नए अध्यक्ष, दिलीप घोष, बेबीरानी मौर्य को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का जिम्मा

भाजपा की पश्चिम बंगाल इकाई के अध्यक्ष रहे दिलीप घोष को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है। दिलीप घोष की जगह अब सांसद सुकांता मजूमदार पश्चिम बंगाल भाजपा के अध्यक्ष होंगे।

भाजपा ने सांसद दिलीप घोष और उत्तराखंड की पूर्व राज्यपाल बेबी रानी मौर्य को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नियुक्त किया है। (फोटो: एएनआई)

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद अब बीजेपी ने राज्य और राष्ट्रीय कार्यकारिणी में बदलाव किया है। भाजपा की पश्चिम बंगाल इकाई के अध्यक्ष रहे दिलीप घोष को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है। दिलीप घोष की जगह अब सांसद सुकांता मजूमदार पश्चिम बंगाल भाजपा के अध्यक्ष होंगे। इसके साथ ही भाजपा ने उत्तराखंड की पूर्व राज्यपाल बेबी रानी मौर्य को भी पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया है।

भाजपा महासचिव अरुण सिंह की तरफ से प्रेस विज्ञप्ति जारी कर पश्चिम बंगाल के बालुरघाट से सांसद डॉ सुकांता मजूमदार को पार्टी की प्रदेश इकाई का अध्यक्ष बनने की जानकारी दी गई है। सुकांता मजूमदार खड़गपुर से सांसद दिलीप घोष की जगह लेंगे। प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर दिलीप घोष का कार्यकाल इसी साल ख़त्म हो रहा था। दिलीप घोष लगातार दो बार के लिए पश्चिम बंगाल भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए थे।

सुकांता मजूमदार को पश्चिम बंगाल इकाई का प्रदेश अध्यक्ष बनने पर विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने उन्हें ट्वीट कर बधाई दी है। शुभेंदु अधिकारी ने ट्वीट करते हुए लिखा है कि सुकांता मजूमदार को बंगाल भाजपा का अध्यक्ष चुने जाने पर बधाई। साथ ही उन्होंने ट्वीट में दिलीप घोष को भी पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनने पर बधाई दी है और कहा कि मुझे विश्वास है कि दोनों पार्टी को मजबूत करने में अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान देंगे।

 

कहा जा रहा है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद ही भाजपा राज्य नेतृत्व को बदलना चाह रही थी। दरअसल कई नेताओं ने दिलीप घोष की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए थे। पिछले दिनों भाजपा छोड़ टीएमसी में शामिल हुए बाबुल सुप्रियो ने भी दिलीप घोष की कार्यशैली पर सवाल उठाए थे। सुप्रियो ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि दिलीप घोष भी पार्टी की विधानसभा चुनाव में हुई हार के लिए आंशिक रूप से जिम्मेदार हैं। चुनाव प्रचार के दौरान उनकी टिप्पणियां विद्यासागर, रवींद्रनाथ टैगोर और सत्यजीत रे की संस्कृति के साथ मेल नहीं खाती थी और बंगालियों के लोकाचार से बिल्कुल अलग होती थीं।

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