हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने सोमवार को विधानसभा में बतौर वित्त मंत्री इस कार्यकाल का अपना दूसरा बजट पेश किया। इस दौरान बजट के मुद्दों के अलावा कुछ दृश्यों व शब्दों ने सियासी चर्चा को बढ़ावा दिया है। पहला तो मुख्यमंत्री नायब सैनी सिर पर केसरी रंग की पगड़ी पहनकर बजट पेश करने पहुंचे। दूसरा उन्होंने अपने बजट की शुरुआत गुरु नानक देव जी के सिद्धांत, ‘किरत कर, नाम जप, वंड छक’ से की। इसका अर्थ है ईमानदारी से मेहनत करना (किरत), ईश्वर का नाम स्मरण करना (नाम) और अपनी कमाई मिल-बांटकर खाना (वंड)।
कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते
इन बातों से संकेत तो साफ है कि भाजपा आलाकमान और नायब सिंह सैनी पंजाब में अगले साल फरवरी में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए अभी से चुनावी मोड में आ गए हैं। वे पंजाबियों को साधने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते। हालांकि यह पहला मौका नहीं, जब मुख्यमंत्री सैनी ने पगड़ी पहनकर किसी कार्यक्रम में शिरकत की हो, लेकिन पिछले कई महीनों से जिस तरह उन्होंने पंजाब में धार्मिक, सामाजिक और सियासी कार्यक्रमों में हिस्सा लिया है, उससे कुछ चीजें तो स्पष्ट हो रही हैं।
पहला तो भाजपा ने अगले साल फरवरी में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए सैनी को आगे करके सिखों व पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं का समर्थन हासिल करने के प्रयाससरत है। दूसरा उनकी नजर उन लोगों पर भी है, जो पंजाब के मतदाता तो नहीं हैं, लेकिन वहां बड़ी संख्या में काम कर रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या में उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड व अन्य राज्यों के लोग रहते हैं।
पंजाब के साथ उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड में भी चुनाव होने हैं। भाजपा गैर-पंजाबियों की रैलियां करके पंजाब के साथ-साथ उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड चुनावों के लिए भी मैदान तैयार कर रही है। हरियाणा के सात जिलों की सीमाएं पंजाब से जुड़ती हैं। ऐसे में यहां के खान-पान, परिवेश में बहुत सी समानताएं हैं। हरियाणा में सफलता पाने के बाद भाजपा पंजाब के इन सीमावर्ती इलाकों में ध्यान रखे हुए है।
छवि बदलने की उम्मीद में भाजपा
नायब सिंह सैनी को आगे करके भाजपा उस ‘कमाल’ की उम्मीद भी कर रही है, जो पिछले साल हरियाणा के विधानसभा चुनाव में हुआ और पार्टी ने तमाम विश्लेषकों के दावों को दरकिनार करते हुए लगातार तीसरी बार सरकार बनाई। हालांकि पंजाब की स्थिति भिन्न है। यहां अब तक हुए चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन खास अच्छा नहीं रहा है। यहां उसे तीन बार शिरोमणि अकाली दल के साथ मिलकर सत्ता में भागीदार बनने का मौका तो मिला, लेकिन हर बार भाजपा छोटे भाई की ही भूमिका में रही।
इस बार भाजपा इस छवि को तोड़कर खुद के बूते अच्छा प्रदर्शन करने की चाह में है। वैसे भी अकालियों के साथ उनकी गठबंधन की गाड़ी फिलहाल पटरी पर नहीं चल पा रही है।
