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बिहार: उपेंद्र कुशवाहा को एनडीए में क्यों नहीं मिल रही तवज्जो?

उपेंद्र कुशवाहा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार का कार्यकाल पूरा होने तक वह केंद्र में मंत्री बने रहेंगे।

केंद्रीय मंत्री एवं रालोसपा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा

राष्ट्रीय लोक समता पार्टी(रालोसपा) मुखिया व केंद्र में मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने सोमवार को पटना में प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट तौर पर कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार का कार्यकाल पूरा होने तक वह केंद्र में मंत्री बने रहेंगे। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर भी निशाना साधा। लेकिन, नीतीश कुमार की आलोचना से ज्यादा तवज्जो उनके एनडीए का हिस्सा बने रहनेवाले बयान को मिल रही है।

दरअसल, 26 अक्टूबर को जब नई दिल्ली में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और जदयू प्रमुख नीतीश कुमार ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बराबर सीटों पर लोकसभा चुनाव लड़ने की घोषणा की थी, तभी से उपेंद्र कुशवाहा नाराज चल रहे हैं। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में अमित शाह ने लोक जनशक्ति पार्टी और रालोसपा का नाम लेकर बस इतना ही कहा था कि वे एनडीए के साथ बने रहेंगे। इस बयान का मतलब था कि इन दोनों पार्टियों को उतनी ही सीटें मिलेंगी, जितनी भाजपा व जदयू तय करेंगे। उपेंद्र कुशवाहा को यह नगवार गुजरा। वह सार्वजनिक मंचों से अपनी नाराजगी जाहिर करने लगे।

2013 में जून की गर्मियों में जब जदयू एनडीए से अलग हुई थी, तो उपेंद्र कुशवाहा के लिए एक बड़ा मौका था एनडीए में अपनी मजबूत जगह बनाने का। इसके एक साल बाद यानी 2014 में लोकसभा का चुनाव हुआ, जिसमें रालोसपा ने तीन सीटें जीतीं। भाजपा को इस चुनाव में बिहार में 22 सीटें मिलीं। दूसरी तरफ, महागठबंधन में शामिल होने वाले नीतीश कुमार की पार्टी जदयू महज दो सीटें पर सिमट गई। वर्ष 2015 में जब बिहार का विधानसभा चुनाव हुआ, तो राजद-जदयू-कांग्रेस गठबंधन की जीत हुई और नीतीश कुमार तीसरी बार मुख्यमंत्री बने। लेकिन, दो साल बाद ही नीतीश कुमार ने महागठबंधन छोड़ दिया और एनडीए में उनकी घर वापसी हो गई।

उपेंद्र कुशवाहा ने इसी साल जुलाई में एक टीवी इंटरव्यू में यह तक कह दिया था कि नीतीश कुमार को अब सीएम के पद से हट जाना चाहिए और किसी और को जगह देनी चाहिए। राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं, ‘उपेंद्र कुशवाहा सीएम बनने का ख्वाब देख रहे हैं, इसलिए एनडीए और महागठबंधन दोनों तरफ अपनी संभावनाएं तलाश रहे हैं। वह उहापोह की स्थिति में हैं, जिस कारण फ्रंटल अटैक करने से परहेज कर रहे हैं।’

कितनी सीटें चाहते हैं उपेंद्र कुशवाहा
पटना के सियासी गलियारों में चर्चा है कि उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा को भाजपा केवल दो सीटें देने जा रही है। लेकिन, उपेंद्र कुशवाहा सीटों का बंटवारा 2014 के लोकसभा चुनाव के परफॉर्मेंस के हिसाब से चाहते हैं। लोकसभा चुनाव में प्रदर्शन की बात करें, तो रालोसपा को जदयू से एक सीट ज्यादा मिली थी। जदयू को इस चुनाव में दो सीटें मिली थीं जबकि रालोसपा ने तीन सीटों पर जीत दर्ज की थी। उपेंद्र कुशवाहा का कहना है कि इस प्रदर्शन के हिसाब से उन्हें दो से ज्यादा सीटें चाहिए। पिछले हफ्ते रालोसपा के ट्विटर हैंडल से राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की एक कविता की कुछ पंक्तियों में मामूली बदलाव कर ट्वीट किया गया था और इशारे ही इशारे में लोकसभा सीटों की चाहत बयां की गई थी।

ट्वीट था- भाजपा को रालोसपा का अंतिम पैगाम : दो न्याय अगर, तो ज्यादा दो। पर इसमें यदि बाधा हो। तो दे दो केवल हमारा सम्मान, रखो
अपनी धरती तमाम।

रालोसपा नेता नागमणि कहते हैं, ‘नीतीश कुमार के पास अपना यानी कुर्मी वोट बैंक डेढ़ से दो फीसदी है जबकि रालोसपा के पास एकमुश्त 10 प्रतिशत कुशवाहा वोट है। लेकिन, रालोसपा को दो सीटें दी जा रही हैं, जैसे सत्यनारायण भगवान का प्रसाद हो। हमलोग चिकेन बिरयानी और खीर खानेवाले लोग हैं।’

भाजपा की ठंडी प्रतिक्रिया- सीट समझौते को लेकर अमित शाह और नीतीश कुमार के संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद से लेकर अब तक उपेंद्र कुशवाहा भाजपा व जदयू के खिलाफ काफी कुछ कह चुके हैं, लेकिन भाजपा की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आ रही है। यहीं नहीं, पिछले दिनों उपेंद्र कुशवाहा दिल्ली में थे, तो उन्होंने अमित शाह से मिलने का वक्त मांगा था, लेकिन अमित शाह ने उनसे मुलाकात नहीं की। उन्होंने 30 नवंबर तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने का वक्त भी मांगा था, लेकिन प्रधानमंत्री भी उनसे नहीं मिले। इससे साफ है कि भाजपा उन्हें बहुत तवज्जो नहीं दो रही है।

राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं, ‘भाजपा और जदयू को पता है कि कुशवाहा (कोइरी) का एकमुश्त वोट रालोसपा को नहीं मिलता है। बल्कि उनका वोट भाजपा, जदयू में भी बंटा हुआ है। कोइरी वोट का इतिहास भी यही है कि यह एकमुश्त किसी एक पार्टी को नहीं मिलता है। भाजपा को लगता है कि रालोसपा के एनडीए में रहने या नहीं रहने से बहुत फर्क नहीं पड़नेवाला है, इसलिए उन्हें (उपेंद्र कुशवाहा) बहुत तवज्जो नहीं मिल रही है।’
आगे की राह- सोमवार के प्रेस कॉन्फ्रेंस में हालांकि उपेंद्र कुशवाहा ने मई 2019 तक एनडीए की सरकार में मंत्री बने रहने की बात कही है, लेकिन रालोसपा के ही नेताओं का कहना है कि एनडीए के साथ रहने का चैप्टर अब करीब-करीब बंद हो चुका है।

रालोसपा के नेता नागमणि ने कहा, ‘एनडीए में बने रहने की संभावना अब करीब-करीब खत्म हो चुकी है। छह तारीख को कार्यकर्ताओं के साथ एक बैठक होगी। इस बैठक में हम अपनी अगली रणनीति की घोषणा करेंगे।’ उन्होंने आगे कहा, ‘हमारे कार्यकर्ताओं की राय है कि हम (रालोसपा) महागठबंधन में शामिल हो जाएं।’ हालांकि, पार्टी के सूत्रों का यह भी कहना है कि संभव है कि छह तारीख को कोई बड़ी घोषणा न भी हो क्योंकि 11 दिसंबर को राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव का परिणाम आनेवाला है। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व 11 दिसंबर के चुनाव परिणाम का इंतजार करेगा। अगर इस चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन खराब होता है, तो रालोसपा को नये सिरे से मोलभाव करने में सहूलियत होगी। (बिहार से उमेश कुमार राय की रिपोर्ट)

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