आर्थिक सूचकांकों के अनुसार बिहार की गिनती देश के सबसे पिछड़े राज्यों में होती है मगर महिलाओं को अधिकार देने के मामले में यह राज्य देश के अग्रणी राज्यों में शामिल किया जा सकता है। इस कहानी में हम आपको बिहार में महिलाओं को मिलने वाले उन अधिकारों और सुविधाओं के बारे में बताएंगे जो दिखाते हैं कि नारी शक्ति को सशक्त करने में यह राज्य जागरूक रहा है।
महिला सशक्तिकरण की बात चलेगी तो बिहार में सबसे पहले कर्पूरी ठाकुर का जिक्र आएगा। कर्पूरी ठाकुर जब राज्य के मुख्यमंत्री बने तब उन्होंने आरक्षण का वर्गीकरण किया और महिलाओं के लिए अलग से तीन प्रतिशत आरक्षण देने की व्यवस्था की। कर्पूरी ठाकुर ने लड़कियों में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए उनकी स्कूल फीस माफ करने का भी निर्णय लिया।
महिलाओं को माहवारी अवकाश देने वाला बिहार देश का पहला राज्य है। जिसने महिलाओं के लिए ‘पीरियड लीव’ (मासिक धर्म अवकाश) की शुरुआत की थी। महिलाओं को यह सुविधा देने का श्रेय तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को जाता है। लालू प्रसाद ने महिला कर्मचारी संघों की मांग को स्वीकार करते हुए यह प्रावधान किया था।
1990 से ही बिहार की सभी महिला सरकारी कर्मचारियों को हर महीने दो दिन की विशेष आकस्मिक छुट्टी (Special Casual Leave) मिलती है जो उनकी सामान्य छुट्टियों (CL/EL) के अतिरिक्त होती हैं। इसके लिए किसी मेडिकल सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं होती। यह अवकाश 45 वर्ष की आयु तक की सभी नियमित महिला कर्मचारियों, संविदा कर्मियों और शिक्षिकाओं के लिए उपलब्ध है।
साल 2006 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार के पंचायत और नगर निकाय चुनावों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि लाखों महिलाएं अब तक मुखिया, सरपंच और पार्षद बन चुकी हैं। साल 2006 में ही नीतीश सरकार ने मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना’ की शुरुआत की जिसे वैश्विक स्तर पर सराहा गया। इस योजना के तहत कक्षा नौ में प्रवेश लेने वाली छात्राओं को साइकिल खरीदने के लिए पैसे दिए जाते हैं।
साल 2006 में ही प्राथमिक शिक्षक नियोजन में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू किया गया जिससे शिक्षित महिलाओं को बड़ी संख्या में रोजगार मिला। साल 2016 में नीतीश सरकार ने राज्य की सभी सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 35 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण दिया गया।
पुलिस बल में भी महिलाओं के लिए लगभग 35 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की दिशा में भी कदम उठाए गए हैं, जिससे सुरक्षा तंत्र में उनकी भूमिका बढ़ी है। इसका नतीजा यह है कि बिहार पुलिस में महिला कर्मियों का प्रतिशत आज देश में सबसे अधिक है। इसके अलावा, महिला साक्षरता और उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए राज्य के इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में 33 प्रतिशत सीटें छात्राओं के लिए आरक्षित की गई हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसकी घोषणा 2 जून 2021 को की थी। यह आरक्षण नीति शैक्षणिक सत्र 2021-22 से ही लागू करने का निर्णय लिया गया था।
एक और बड़ा फैसला 2016 में आया, जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य में पूर्ण शराबबंदी कानून की घोषणा की। यह फैसला मुख्य रूप से ग्रामीण महिलाओं की मांग पर लिया गया था। मुख्यमंत्री अपनी जनसभाओं में कई बार इसका जिक्र कर चुके हैं। इस फैसले का एक बड़ा प्रभाव उभर कर आया। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के एक अध्ययन के अनुसार शराबन्दी से घरेलू हिंसा में कमी आई है और गरीब परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है। एनएफएचएस के अनुसार शराबबन्दी के बाद परिवार खुशहाल हुआ और कमाई का अधिकतर हिस्सा परिवार के कल्याण में लगा।
आरक्षण के साथ-साथ बिहार सरकार ने कई महत्वपूर्ण योजनाएं भी शुरू की हैं, जो महिलाओं के जीवन के विभिन्न पहलुओं को प्रभावित करती हैं। ‘जीविका’ योजना (Self Help Groups) इसका एक प्रमुख उदाहरण है, जिसके माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों से जोड़कर उन्हें आर्थिक रूप से सक्षम बनाया गया है। इन समूहों के जरिए महिलाएं छोटे-छोटे व्यवसाय शुरू कर रही हैं और अपनी आय बढ़ा रही हैं। वर्तमान में लगभग 1.3 करोड़ महिलाएं इन समूहों से जुड़ी हैं।
हाल के वर्षों में भी कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए हैं, जिसमें मुख्यमंत्री महिला उद्यमी योजना और मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना शामिल हैं। मुख्यमंत्री महिला उद्यमी योजना के तहत महिलाओं को नया व्यवसाय शुरू करने के लिए 10 लाख रुपये तक की सहायता (जिसमें 5 लाख रुपये अनुदान और 5 रुपये लाख ब्याज मुक्त ऋण) दी जा रही है। जबकि, मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना 2025-26 के तहत महिलाओं को स्वरोजगार के लिए किस्तों में वित्तीय सहायता देने का प्रावधान है ताकि ग्रामीण महिलाएं आत्मनिर्भर बन सकें।
इन फैसलों ने बिहार की महिलाओं को घर की चारदीवारी से निकालकर समाज और सरकार के मुख्य मंच पर ला खड़ा किया है। साथ ही बिहार को महिलाओं के उत्थान के मामले में फ्रंट रनर बना दिया है।
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देश की राजनीति और भविष्य निर्माण में महिलाओं की भूमिका हमेशा से उल्लेखनीय रही है। भारतीय संविधान सभा में कुल 15 महिला सदस्य थीं। इन महिलाओं ने संविधान के मसौदे को तैयार करने और देश के भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। संविधान सभा के बाद महिलाओं ने संसद में भी एंट्री ली। भारतीय लोकतंत्र के सात दशकों के सफर में संसद की संरचना में कई बदलाव आए हैं। पूरी खबर पढ़ें…
