ताज़ा खबर
 

बिहार: नीतीश ने अपनी छवि सुधारने के लिए लालू के करीबी शहाबुद्दीन पर कसा शिकंजा

नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री बन पहली पारी में भाजपा के साथ मिलकर शासन किया। और अबकी यानी दूसरी पारी का शासन जद (यू), राजद और कांग्रेस के महागठबंधन के हाथ में है।

शहाबुद्दीन का बयान नीतीश कुमार को नागवार गुजरा और बिहार सरकार शहाबुद्दीन मामले में सख्त हो गई।

बीते साल 10 सितंबर को 11 साल बाद जेल से निकले बाहुबली पूर्व सांसद शहाबुद्दीन ने जब नीतीश कुमार को परिस्थितिजन्य मुख्यमंत्री बताया था। तो उस रोज उन्हीं की पार्टी के बेलहर से विधायक गिरधारी यादव भी मौजूद थे। भागलपुर के विशेष केंद्रीय कारागार से निकलने पर वे उनकी अगुवाई और खैरमकदम करने यहां आए थे और शहाबुद्दीन के साथ सिवान तक गए थे। उस वक्त उनकी मौजूदगी से तरह तरह के कयास लगाए जा रहे थे। जिसकी आशंका आज भी कायम है। असल में नीतीश कुमार पर उनकी तल्ख टिपण्णी को किसी आने वाले सियासी भूचाल की ओर इशारा माना जा रहा था। फिलहाल तो गठबंधन के नेता कोई भी तल्ख प्रतिक्रिया देने से बच रहे हैं। लेकिन उसके बाद शहाबुद्दीनके खिलाफ बिहार सरकार का रवैया जरूर सख्त हुआ। इसी का नतीजा है कि उन्हें जल्द ही तिहाड़ जेल जाना पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट का आदेश है। बिहार जेल आईजी आनंद किशोर के मुताबिक जल्द ही तिहाड़ शिफ्ट करने की औपचारिकता पूरी कर ली जाएगी। चूंकि मामला संवेदनशील है इस वजह से शिफ्ट करने की तारीख और यात्रा के माध्यम का खुलासा करने से इंकार कर दिया। यों भागलपुर जेल में बंद रहने के दौरान शहाबुद्दीन को इलाज के वास्ते एम्स दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस ट्रेन से ही भेजा गया था।

माना जा रहा है कि बिहार के इतिहास में यह दूसरा मौका है। जब किसी कैदी को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद तिहाड़ जेल शिफ्ट किया जा रहा है। इससे पहले 14 फ़रवरी 2005 को सुप्रीम कोर्ट ने पप्पू यादव को बेउर जेल पटना से तिहाड़ जेल दिल्ली शिफ्ट करने का आदेश दिया था। पप्पू यादव मधेपुरा लोकसभा सीट से फ़िलहाल सांसद है। उस वक्त विधायक अजित सरकार की हत्या के आरोप में बंद थे। और बेउर जेल में इनपर दरबार लगाने की वजह से सुप्रीम कोर्ट ने शिफ्ट करने का आदेश दिया था। शहाबुद्दीन के मामले में सीवान के चंदा बाबू जिनके तीन बेटों की हत्या कर दी गई और पत्रकार राजीव रंजन की पत्नी आशा रंजन की अपील पर शिफ्ट करने का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने दिया है। राजीव रंजन की हत्या का आरोप भी इन पर है। इस बात का सबूत यह है कि भागलपुर जेल से बाहर आते ही मोहम्मद कैफ इनके बगल में खड़ा दिखा, जिसकी फोटो छपी। कैफ का नाम राजीव रंजन की हत्या में है।

भागलपुर जेल से निकलते ही शहाबुद्दीन ने नीतीश कुमार को परिस्थितिजन्य मुख्यमंत्री तो बताया ही था, साथ ही बोले राजनीति मेरा पेशा नहीं है। मगर मेरे नेता बीते 27 सालों से लालू प्रसाद है। मेरा और कोई नेता नहीं है। मालूम हो कि शहाबुद्दीन राजद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य है। नीतीश कुमार को परिस्थितिजन्य मुख्यमंत्री बोलने का मतलब कुछ तो निकलता है। कहीं न कहीं दाल में काला है? यह संशय आज भी बरक़रार है। संशय को बल तब मिला जब जेल गेट पर जुटी समर्थकों की भीड़ में जद(यू) के बेलहर से विधायक गिरधारी यादव दिखे। वे तो उनके साथ सीवान तक गए। राजद के विधायक सांसद का वहां मौजूद होना तो लाजमी था। लेकिन गिरधारी यादव की मौजूदगी सवालिया निशान खड़ा करती है। इस पर जद (यू) आज तक चुप्पी साधे है।

उस वक्त बिहार के काबीना मंत्री राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह पत्रकारों से बोले कि संविधान में परिस्थितिजन्य मुख्यमंत्री न बोलने की कहीं व्याख्या नहीं है। ये जद (यू) कोटे से मंत्री है। सुलतानगंज के जद (एकी) विधायक सुबोध राय को तो इस बारे में कुछ पता न होने बात बोलते है। गोपालपुर के जद (यू) विधायक नीरज कुमार उर्फ गोपाल मंडल साफगोई से बोले कि नीतीश कुमार किसी भी हालात जंगलराज की वापसी नहीं होने देंगे। भागलपुर शहरी इलाके के कांग्रेसी विधायक अजित शर्मा बोलते है महागठबंधन पर इसका कोई असर नही होने वाला। भागलपुर के राजद सांसद बुलो मंडल भी उनकी निजी राय बताकर टाल गए।

मगर विरोधी दल खासकर भाजपा के लोग हमला बोलते है। चाहे पटना में सुशील मोदी हो या अश्विनी कुमार चौबे। बोलते है लालू ने छोटे भाई के सुशासन की पोल खोल दी। यह बात भी पक्की है कि नीतीश कुमार के पहली पाली में मुख्यमंत्री बनने पर बिहार के ए क्लास हिस्ट्रीशीटरों को त्वरित सजा दिलाने के वास्ते विशेष अदलतों का गठन किया था। ए क्लास का मतलब न सुधरने वाले अपराधी। शहाबुद्दीन का नाम इसी सूची में था। दो दर्जन से ज्यादा आपराधिक मामले दर्ज है। आधा दर्जन से जयादा में फैसले के खिलाफ आपराधिक अपील ऊपरी अदालत में दायर है।

नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री बन पहली पारी भाजपा के साथ मिलकर शासन किया। और अबकी यानी दूसरी पारी का शासन जद (यू) राजद और कांग्रेस का महागठबंधन के हाथ में है। जिसके मुखिया नीतीश कुमार है। लेकिन शहाबुद्दीन के 11 साल बाद जमानत पर जेल से बाहर आने पर कई सवाल खड़े जरूर हुए थे। इससे सुशासन बाबू का शासन कमजोर होने की चर्चा राजनीतिक हलकों हुई। खासकर परिस्थितिजन्य मुख्यमंत्री वाले शहाबुद्दीन के बयान ने तो यह साबित ही कर दिया था। जाहिर है कुछ न कुछ अंदर ही अंदर खिचड़ी पक रही थी। यही बयान नीतीश कुमार को नागवार लगा। और बगैर किसी की परवाह किए बिहार सरकार शहाबुद्दीन मामले में सख्त हो गई।

कयास लगाया जा रहा है कि ‘माई’ समीकरण वाले दूसरे दलों के विधायकों को एक जुटकर कुछ गुल खिलाने की विसात बिछाई जा रही है। ताकि तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनाया जा सके। जद (एकी) के वेलहर से विधायक गिरधारी यादव की शहाबुद्दीन के काफिले में मौजूदगी भी यह संकेत देती है। मालुम रहे कि गिरधारी यादव की राजनीति धुरी लालूप्रसाद ही है। राजद से विधायक और बांका से सांसद रहे है। आगे आगे देखिए होता है क्या। यह जुमला यहां सटीक बैठता है।

बिहार की अन्‍य खबरें यहां पढ़ें।

Next Stories
1 ये 5 घटनाएं बयां करती हैं मोहम्‍मद शहाबुद्दीन का खौफ
2 व्‍हाट्सएप पर वायरल हुआ बिहार इंटर का पेपर, बाजार में 100-100 रुपये में हुई बिक्री!
3 गांववालों से 700 रुपये चंदा मांगकर कोर्ट पहुंचा मासूम, बोला- दिवंगत मां-बाप का कर्ज माफ करें हुजूर
आज का राशिफल
X