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जेडीयू: दो मुहाने पर दो योद्धा, इन वजहों से बढ़ती गई नीतीश कुमार और शरद यादव के बीच की अदावत

शरद यादव जनता से सीधा संवाद कर रहे हैं। इन कार्यक्रमों में शरद के तेवर और कलेवर से ये साफ हो जाएगा कि जनता दल यूनाइटेड के संस्थापक सदस्य शरद यादव पार्टी में रहेंगे या फिर सियासत का अलग रास्ता चुनेंगे।

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जनता दल यूनाइटेड के दो योद्धा आज दो मुहाने पर हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और पार्टी के वरिष्ठ नेता शरद यादव के अघोषित युद्ध की स्थिति है। शरद यादव गुरुवार 10 अगस्त से जनता से सीधा संवाद कार्यक्रम के बहाने बीजेपी के साथ चल रही अपनी ही पार्टी की नयी नवेली सरकार पर हमला बोलने का प्लेटफॉर्म ढूंढ़ चुके हैं। नीतीश कुमार और शरद यादव के राजनीतिक अदावत की ये पृष्ठभूमि पुरानी है। बिहार के राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर रखने वालों को याद होगा कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पिछले साल शरद यादव को जनता दल अध्यक्ष की कुर्सी से बेदखल कर खुद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गये। जनता दल यूनाइटेड के संस्थापक सदस्य होने के बावजूद भी शरद यादव अभी मात्र राज्यसभा के सांसद है। शरद यादव को अध्यक्ष पद से हटाया गया तो उन्होंने नीतीश के चुनावी सलाहकार प्रशांत किशोर पर खुलकर आरोप लगाया कि ये उन्हीं की सलाह पर लिया गया फैसला है। इधर शरद यादव को अध्यक्ष पद से हटाने का जेडीयू में जो भी विरोध हुआ उसके पीछे शरद यादव का हाथ बताया गया। इसके साथ जनता दल यूनाइटेड में दिल्ली और पटना के बीच की दूरी बढ़ती चली गई।

तीन ऐसे वैचारिक मामले भी आए जिन्होंने नीतीश और शरद के बीच की खटास को बढ़ाने का ही काम किया। ये मामले थे पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी और राष्ट्पति चुनाव। इन तीनों ही मुद्दों पर दोनों की राय जुदा जुदा थी। तीनों ही मसलों पर नीतीश कुमार केन्द्र के साथ खड़े दिखे, जबकि शरद यादव का स्टैंड इन मामलों पर बीजेपी की विरोधी पार्टियों के साथ दिखा। नीतीश का इन मसलों पर नेरन्द्र मोदी सरकार के साथ चलना, जबकि शरद यादव का सोनिया, लालू के साथ जुगलबंदी दोनों के नेताओं के बीच की दूरी को बढ़ाती चल गई।

लालू यादव और उनके परिवार के खिलाफ लगे भ्रष्टाचार और बेनामी संपत्ति के आरोपों पर जहां नीतीश कुमार मुखर रहे और इसी मुद्दे पर उन्होंने लालू यादव से अपनी दोस्ती तोड़ ली है शरद यादव ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है। दरअसल जेडीयू में अलग थलग पड़ चुके शरद यादव ने इसी बहाने लालू यादव की सहानुभूति बटोरी और लालू यादव अब शरद के साथ मिलकर नीतीश के खिलाफ अभियान चलाने की बात कर रहे हैं। शरद यादव के इस पैंतरे ने निश्चित रुप से नीतीश कुमार को उनसे चिढ़ने का एक मौका और वजह दे दिया है। कहा जाता है कि जब नीतीश कुमार ने अपने उत्तराधिकारी के रुप में जीतनराम मांझी को सीएम बनाया और कुछ समय बाद जब वो बागी हो गये तो इसके पीछे जो दिमाग काम कर रहा था वो भी शरद यादव का था। सीएम पद से हटाए जाने के बाद जीतनराम मांझी ने खुद भी इसे कबूल किया था।

अब सबकी निगाहें 17 अगस्त और 19 अगस्त पर टिकी हुई हैं। 17 अगस्त को शरद यादव दिल्ली में साम्प्रदायिकता पर एक सेमिनार करने जा रहे हैं। इसमें बीजेपी की विचारधारा से इत्तेफाक ना रखने वाले सभी दलों को बुलाया गया है। इनमें कांग्रेस, एनसीपी, वाम दल शामिल हैं। जबकि 19 अगस्त से पटना में जेडीयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हो रही है। इस बैठक में शरद यादव शिरकत करते हैं या नहीं ये देखना अहम होगा, इसी बीच शरद यादव जनता से सीधा संवाद कर रहे हैं। इन कार्यक्रमों में शरद के तेवर और कलेवर से ये साफ हो जाएगा कि जनता दल यूनाइटेड के संस्थापक सदस्य शरद यादव पार्टी में रहेंगे या फिर सियासत का अलग रास्ता चुनेंगे।

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