ताज़ा खबर
 

चीरफाड़- बिहार में हो रहा है खेल के साथ खिलवाड़

लगभग 11 करोड़ की जनसंख्या वाले इस राज्य में दौड़ते तो काफी युवा हैं लेकिन सरकार या खेल प्राधिकरण ने किसी को ओलंपिक की राह दिखाने की जहमत नहीं उठाई।

Author Published on: November 16, 2017 5:59 AM
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है। (Image-socialsports)

संदीप भूषण

हार में सरकार बदली, साथ ही बदलने लगी थी यहां की आबोहवा। जीडीपी हो या शासन व्यवस्था हर जगह सुधार दिखने लगे लेकिन इन सब के बीच खेल संस्कृति जैसे धुंध में सूरज की किरणों की भांती कहीं ओझल होने लगी। इसी का नतीजा रहा कि आज लगभग तेरह साल बाद भी किसी खिलाड़ी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलते हुए देखने का बिहार का सपना अधूरा ही है। बीच-बीच में कुछ लोगों ने प्रयास किए भी तो वह आपसी कलह की भेट चढ़ गया। 11 करोड़ की आबादी वाले राज्य ने शिवनाथ सिंह के बाद कोई ओलंपिन नहीं देखा। वहीं क्रिकेट में जो भी प्रतिभाएं तैयार हुईं, सभी ने पड़ोसी राज्यों का रुख कर लिया। हॉकी, फुटबॉल पहले से ही मरणासन्न स्थिति में हैं।

दरअसल, एक समय था जब इसी बिहार को खेल में अव्वल माना जाता था। मोइनुल हक स्टेडियम के आसपास बसे लोग बताते हैं कि रवि शास्त्री जैसे दिग्गज क्रिकेटर इंजीनियरिंग कॉलेज की ओर से खेला करते थे। वहीं यहां का संजय गांधी स्टेडियम दुनिया के महान फिनिशरों में शुमार भारत के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के छक्कों का गवाह बनता था। दानापुर स्थित बिहार रेजिमेंट (बीआरसी) में दर्शकों की भीड़ मनोहर टोप्नो और सिलवानुस डुंगडुंग की हॉकी देखने आती थी। 1996 में मोइनुल हक विश्व कप मैच का गवाह बना। समय बीता और बिहार का विभाजन हुआ। इसके साथ ही खेल और प्रतिभा दोनों झारखंड के पाले में चले गए। धोनी आज झारखंड का मान बढ़ा रहे हैं तो हाल ही में क्रिकेट का चमकता सितारा माने जा रहे ईशान किशन ने भी बिहार की बजाए झारखंड से खेलने को तरजीह दी।

आपसी झगड़े में क्रिकेट हुआ बोल्ड
1999 में विभाजन के बाद झारखंड में जहां धड़ाधड़ क्रिकेट मैच हो रहे हैं वहीं बिहार में आपसी कलह ने खिलाड़ी तो दूर क्रिकेट को ही क्लीन बोल्ड कर दिया है। क्रिकेट का मुकाबला पिच से ज्यादा यहां अदालतों में खेला जा रहा है। शुरुआत में बीसीसीआइ से टकराव और बाद में तीन क्रिकेट एसोसिएशन बनाकर बिहार क्रिकेट की दावेदारी ने यहां के खिलाड़ियों के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। रणजी ट्रॉफी में बिहार की मेजबानी का सपना लिए कई खिलाड़ी आज भी पीठ पर किट लादकर सुबह शाम अभ्यास में लगे हुए हैं ।

हॉकी का हाल है बेहाल
बिहार के बंटवारे के बाद हॉकी तो जैसे झारखंड का ही खेल बन गया। बिहार में न तो खिलाड़ियों के लिए उचित व्यवस्था है और न ही उनका भविष्य सुरक्षित। बीएमपी परिसर स्थित मैदान पर अभ्यास करने वाले खिलाड़ियों ने बताया कि उन्हें एस्ट्रो टर्फ पर अभ्यास का मौका ही नहीं मिलता।
अब यह हास्यासपद ही है कि जहां सभी बड़े टूर्नामेंट एस्ट्रो टर्फ पर ही कराए जा रहे हैं वहां बिहार के हॉकी खिलाड़ियों को घास के मैदान पर अभ्यास के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। बकौल खिलाड़ी घास के मैदान पर अभ्यास का मुकाबला टर्फ पर होने वाले मैचों से नहीं किया जा सकता। घसियाले मैदान और टर्फ पर गेंद की गति में जमीन-आसमान का अंतर होता है।

फुटबॉल खेलो अपने भरोसे
जहां एक ओर फीफा अंडर-17 की मेजबानी से भारत में फुटबॉल को संजीवनी मिली है वहीं बिहार में फुटबॉल की स्थिति काफी दयनीय है। स्कूल कॉलेजों में रूटीन के हिस्से तक सीमित फुटबॉल को जीवन देने के लिए एक उचित प्राधिकरण तक नहीं है। गूगल पर काफी खोज के बाद यहां एक फुटबॉल संघ का पता तो चलेगा लेकिन वहां के अधिकारियों को अब तक भारतीय फुटबॉल संघ के बारे में ही पूरी जानकारी नहीं है।

40 साल में बिहार का कोई ओलंपियन नहीं
कभी शिवनाथ सिंह के नाम पर गर्व से सीना चौड़ा करने वाले बिहार को एक दो साल नहीं बल्कि 40 साल से कोई ओलंपिक पदक विजेता तो दूर ओलंपिक में भाग लेने वाला खिलाड़ी नहीं मिल पाया है।  लगभग 11 करोड़ की जनसंख्या वाले इस राज्य में दौड़ते तो काफी युवा हैं लेकिन सरकार या खेल प्राधिकरण ने किसी को ओलंपिक की राह दिखाने की जहमत नहीं उठाई। मोइनुल हक के बाहरी परिसर में लगभग एक हजार युवा रोजाना दौड़ते हैं लेकिन किसी का सपना ओलंपिक में दौड़ना नहीं है। वेह सिर्फ नौकरी पाना चाहते हैं। हालात यह है कि इनमें से कई तो यह भी नहीं जानते की ओलंपिक क्या है ?

 

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 राजद पार्टी नहीं, लालू की निजी संपत्ति : नीतीश
2 पटना: स्वामी समर्थकों ने 300 बाइक पर सवार हो निकाली रैली, सीतामढ़ी में जगत जननी मंदिर निर्माण की मांग
ये पढ़ा क्‍या!
X