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कहां खो गई मेरी लहठी और पियरी?

गणपति और छठ के समानांतर दूसरा पर्व नहीं है। लेकिन करवा चौथ के समानांतर तीज है। हम पूरे संसार को देखें और अपने घर को ही न देखें तो यह कैसा सांस्कृतिक आदान-प्रदान हुआ भला।

Author Published on: October 25, 2017 4:33 AM
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सांस्कृतिक आदान-प्रदान बहुत अच्छी चीज होती है। एक ही राज्य में अलग-अलग समुदाय के लोग रहते हैं और उनकी अलग-अलग संस्कृतियां होती हैं। उनमें से अच्छी लगने वाली चीजों को अपना लेना बहुत सराहनीय है, एक-दूसरे की सभ्यता-संस्कृति की इज्जत करना उसमें घुलना-मिलना समाज के लिए बेहतरीन है। उनमें कुछ अच्छा लगता है तो अपनाना सराहनीय है। लेकिन इन सबमें जब भेड़चाल की प्रवृत्ति आती है तो वह बिलकुल भी सही नहीं होता है।  अब करवा चौथ को ही ले लीजिए। पंजाब और कुछ अन्य खास इलाकों के इस पर्व में फिल्मी ग्लैमर का तड़का लगते ही यह देश के कोने-कोने में फैल गया। पंजाब की संस्कृति के साथ बाजार भी आया क्योंकि फिल्म उद्योग से जुड़े ज्यादातर लोग इस इलाके से संबंध रखते हैं। अगर बिहार या अन्य इलाके के लोग करवा चौथ करना चाहते हैं तो करें, लेकिन आस्था और भक्ति की वजह से करें। सिर्फ भेड़चाल का हिस्सा बनकर यश चोपड़ा या करण जौहर की फिल्मों से प्रभावित होकर नहीं।

मैं 25 साल से मुंबई में रह रही हूं और यहां मैंने छठ जैसे पर्व को एक बिंदु से लेकर समुद्र तक का आकार लेते देखा है। लेकिन इसमें भी मुझे यही महसूस होता है कि अचानक कुछ तत्त्व शामिल हो गए। पहले जुहू और वर्सोवा बीच छठ पूजा में भी शांत रहता था और दो-चार लोग वहां पहुंचते थे। पर अब भीड़ बढ़ रही है। मुंबई में अब लोग यह तो जानने लगे हैं कि छठ पूजा होती है, यह बिहार या उत्तर प्रदेश वालों का पर्व है लेकिन इसे करवा चौथ की तरह अपनाया नहीं जा रहा है। इसके विधि-विधान का बेहद कठिन होना – शायद इसकी वजह है। हम जिस सांस्कृतिक आदान-प्रदान की बात कर रहे हैं वह मुझे एकतरफा दिखता है। मुंबई में जो भी एक साल रह जाता है वह दूसरे साल से ही अपने घर में गणपति की स्थापना करता है। अब इसमें आस्था का तत्त्व कितना है और भेड़चाल कितनी- इसे समझना होगा। हैप्पी दिवाली, हैप्पी होली, हैप्पी गणपति तक पहुंच गया। अब हैप्पी छठ भी है। एक अहम बिंदु यह भी है कि गणपति और छठ के समानांतर दूसरा पर्व नहीं है। लेकिन करवा चौथ के समानांतर तीज है। हम पूरे संसार को देखें और अपने घर को ही न देखें तो यह कैसा सांस्कृतिक आदान-प्रदान हुआ भला।

पहले बिहार के कई इलाकों में शादी के समय शुद्ध लहठी पहनी जाती थी जो लहेरिया के यहां ही बनती थी। लेकिन धीरे-धीरे उसकी जगह मारवाड़ी लहठी ने ले ली और उसके बाद आ गया पंजाबी चूड़े का फैशन। बिहार की शादी में लहठी बेदखल हो गई और पंजाबी चूड़े का प्रवेश हो गया। हर चीज की एक सांस्कृतिक पहचान होती है। करवा चौथ की मौलिक पहचान पंजाबियों से और छठ की बिहारियों से जुड़ी रहेगी। सांस्कृतिक आदान-प्रदान में किसी एक की मौलिकता क्यों खो रही है? मेरी शुद्ध लहठी खो रही है और मेरी पियरी भी खो गई। इन्हें क्यों नहीं अपनाया जा सकता?

 

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