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दही-चूड़ा: 28 साल में पहली बार लालू के घर सन्नाटा, रामविलास पासवान-उपेंद्र कुशवाहा फर्स्ट टाइम देंगे भोज

कांग्रेस भी दही-चूड़ा का आयोजन करती रही है मगर राजद-जदयू के आयोजनों जैसी भव्यता नहीं होती।
केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान (फाइल फोटो)

बिहार की राजनैतिक फिजां में दही, चूड़ा और चीनी के मिश्रण का भोज काफी मायने रखता है। यह भोज हर साल मकर संक्रांति यानि 14 जनवरी को राजनीति की माहिर शख्सियतें और दल अपने-अपने हिसाब से आयोजित करते हैं। बीते साल मिश्रण का रंग बिल्कुल अलग था। राजद , जदयू और कांग्रेस (दही-चूड़ा-चीनी) एक साथ थी मगर इस साल नजारा बदला हुआ है। जानकार बताते हैं कि जनता दल परिवार 1999 से यह आयोजन पटना में करता आ रहा है। बीते साल नाव हादसे की वजह से जदयू ने मकर संक्राति का भोज टाल दिया था। इस बार राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद के जेल में बंद होने और उनकी बड़ी बहन के निधन की वजह से राजद कुनबे में भोज नहीं होने की खबर है। वैसे लालू प्रसाद मुख्यमंत्री बनने के बाद यानी साल 1990 के बाद से ही दही चूड़ा का भोज अपने आवास पर देते रहे हैं। कांग्रेस भी दही-चूड़ा का आयोजन करती रही है मगर राजद-जदयू के आयोजनों जैसी भव्यता नहीं होती और न ही हरेक साल ऐसे भोज करने का कांग्रेस में रिवाज है।

इस बार लोजपा के रामविलास पासवान भी 14 जनवरी को पटना में पार्टी दफ्तर में जोर-शोर से दावत का आयोजन करने जा रहे हैं। उधर, 15 तारीख को रालोसपा भी पहली दफा अपने दफ्तर में दही-चूड़ा के साथ अपने कार्यकर्ताओं से मिलेगी। बीते साल का आयोजन महागठबंधन के अगुवा राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद के लिए जितना उमंग भरा था, इस बार की संक्राति उतनी ही मायूसी भरी है। बता दें कि पिछले साल 10 सर्कुलर रोड आवास पर लालू परिवार के दही-चूड़ा भोज में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी शरीक हुए थे। तब छोटे भाई (नीतीश कुमार) को बड़े भाई (लालू प्रसाद) ने दही का टीका लगा महागठबंधन के अटूट होने का संकेत दिया था। मगर यह यकीन छह महीने के अंदर ही भरभरा गया और महागठबंधन टूट गया। इसके बाद से लालू प्रसाद और उनके परिवार की मुश्किलें ज्यादा बढ़ गई हैं।

इस बार जदयू के जलसे में एनडीए के घटक दल भी शरीक होंगे। भागलपुर जदयू के जिला अध्यक्ष विभूति गोस्वामी बताते हैं कि खासकर जदयू और भाजपा के तमाम सांसद, विधायक और पार्षद को न्यौता भेजा गया है। कार्यकर्ता भी शरीक होंगे। भाजपा के पूर्व जिला अध्यक्ष नरेश चंद्र मिश्रा कहते हैं कि बिहार में दही चूड़ा के ऐसे आयोजन कार्यकर्ताओं को जोड़े रखने और सक्रियता बनाए रखने के लिए सभी दलों के लिए जरूरी है। दरअसल, 2019 के लोकसभा चुनाव तक समां बनाए रखना सभी राजनैतिक दलों की मजबूरी भी बनी हुई है।

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