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गंगा घाट पर भीख मांगने को मजबूर बिहार की ‘लता मंगेशकर’, संतान ने छोड़ा साथ

75 वर्षीय पूर्णिमा देवी काली घाट के आस-पास ही दिखती हैं। संतान ने जब से उनका साथ छोड़ा है, तब से वह यहीं भजन गाती हैं और रहती हैं।

पूर्णिमा देवी एक जमाने में सूबे की लता मंगेशकर के नाम से पुकारी जाती थीं। (फोटोः यूट्यूब)

माथे-चेहरे पर झुर्रियां। आंखों पर बड़ा सा नजर का चश्मा। सिर पर बिगड़े से बाल और खरखराती थी आवाज। पूर्णिमा देवी की पहचान के लिए इन दिनों ये चीजें काफी हैं। एक जमाने में लोग उन्हें अव्वल गायकी और मधुर आवाज के लिए जानते थे। बिहार की लता मंगेशकर की संज्ञा देते थे। पर आज वह गुमनामी के अंधेरे में जीने को मजबूर हैं। मुसीबत की घड़ी में आज न तो उनका परिवार साथ है और न ही सरकार। उनकी जिदंगी में बदहाली का आलम इस कदर है कि राजधानी पटना स्थित गंगा घाट पर वह भीख मांग कर अपना गुजर-बसर करती हैं।

75 वर्षीय पूर्णिमा देवी काली घाट के आस-पास ही दिखती हैं। संतान ने जब से उनका साथ छोड़ा है, तब से वह यहीं भजन गाती हैं और रहती हैं। उन्होंने एक चैनल को बताया, “मैं शरीर से लाचार हो चुकी हूं। मेरा एक बेटा अवसाद में आ गया, इसलिए मैं मां काली के मंदिर में भजन गाती हूं। मां की उपासना करती हूं। दुआ मांगती हूं कि भगवान उसे सही कर दें। वह अच्छा गायक था।”

बकौल पूर्णिमा देवी, “मैं दिल्ली सरकार की रजिस्टर्ड आर्टिस्ट थी। उन दिनों गायन प्रतियोगिता में मैं प्रथम आई थी। मेरी स्थिति मीडिया ने देखी-सुनी, पर सरकार उदासीन बनी रही।” बता दें कि साल 1995 में इन्होंने मगही गीत “यही ठईया टिकुली हेरा गईल” गीत लिखा था, जिसे आज पूरे बिहार में गाया जाता है।

स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो उनका बेटा मानसिक रोगी है, जबकि बेटी कुछ साल पहले मुंबई चली गई थी। वहीं, उनके पिता दार्जिलिंग स्थित महाकाल मंदिर में मुख्य पुजारी हरिप्रसाद शर्मा थे। सूबे की मगही गीतकार की शादी डॉ.एचपी दिवाकर से हुई थी, जो कि यूपी के बाराबंकी से थे। 1984 में जमीनी विवाद में पति की हत्या कर दी गई थी।

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