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वीर कुंवर सिंह के शहर में माफिया को नीतीश सरकार की शह, 40 साल से रह रहे 1200 लोगों के बेघर होने का खतरा

साल 2009 में इस मामले को विधान सभा में भाजपा के विधायक रामेश्वर चौरसिया ने उठाया था और इसकी सीबीआई जांच की मांग की थी

पटना के श्री कृष्ण मेमोरियल हॉल में बाबू वीर कुंवर सिंह के शहादत दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार।

कन्हैया भेलारी

पिछले पंद्रह दिनों से बिहार के अलग-अलग हिस्सों में स्वतंत्रता सेनानी बाबू वीर कुंवर सिंह के शहादत दिवस पर आयोजन हो रहे हैं। राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनके मंत्रिमंडल के कई सहयोगी भी पखवाड़े भर से बाबू वीर कुंवर सिंह का विजय और शहादत दिवस मनाने में मशगूल हैं। साल 1857 में देश की आजादी के लिए हुए पहले स्वतंत्रता संग्राम के इस महानायक ने बिहार का प्रतिनिधित्व किया था। 26 अप्रैल 1858 को उनकी शहादत हुई थी। इसी उपलक्ष्य में पटना के श्री कृष्ण मेमोरियल हॉल में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था जिसमें खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी मौजूद थे। मुख्यमंत्री की मौजूदगी में उनकी ही पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और राज्य सभा सांसद वशिष्ठ नारायण सिंह ने गर्व से बताया कि कुंवर सिंह कैसे गरीबों की मदद किया करते थे। इस मौके पर नीतीश कुमार ने समाज में व्याप्त कुरीतियों को खत्म करने के लिए सामाजिक आंदोलन चलाने की बात कही।

मगर, दुर्भाग्य है कि जिस कुंवर सिंह की बात कर आज सभी नेता कसमें वादे खा रहे हैं और समाज में नवजागरण की बात कर रहे हैं, उन्हीं कुंवर सिंह की जन्मभूमि और कर्मभूमि पर जमीन माफिया स्थानीय पुलिस प्रशासन के सहयोग से हजारों बेजुबान, बेसहारा और गरीब लोगों पर पिछले एक सप्ताह से जुल्मो सितम ढाए हुए हैं। ये माफिया इतने ताकतवर हैं कि इनके खिलाफ विधानसभा और विधान परिषद में बैठने वाले जनप्रतिनिधि भी मुंह खोलने की हिम्मत नहीं करते। या फिर अन्य वजहों से ऐसे माननीय लोग चुप रहना ही बेहतर समझते हैं। वैसे जनसत्ता.कॉम के पास इस बाते के पुख्ता सबूत हैं कि भोजपुर जिले के एक राजद विधायक ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लिखित रूप से खुल्लम-खुल्ला हो रही इस गुंडागर्दी की शिकायत की है। हालांकि, टेलीफोनिक बातचीत में उन्होने कहा, ‘‘हमने सीएम को कोई पत्र नहीं लिखा है। मुझे इस कांटेदार और खतरनाक मामले में नहीं पड़ना है। हम इससे दूरी बनाए हुए हैं। वैसे जब आप मिलेंगे तब इसके बारे में विस्तार से मैं बता सकता हूं।’’

कल ही बिहार पुलिस के दर्जनभर से ज्यादा जवान आरा रेलवे स्टेशन के दक्षिण दिशा में करीब 40 वर्षों से रह रहे ऐसे सैकड़ों गरीबों को वहां से खदेड़ने पहुंचे थे। तब जमीन बचाओ संघर्ष समिति के अध्यक्ष एम ए खान के नेतृत्व में उस जमीन पर रह रहे वाशिंदों ने पुलिस ज्यादती का जमकर विरोध किया। संघर्ष समिति से जुड़े शिवपूजन प्रसाद ने बताया, ‘‘पुलिसवालों के पास हमें हमारे जमीन से बेदखल करने का कोई कानूनी कागज नहीं था। जब हमलोगों ने अनुमंडलाधिकारी को इसकी सूचना दी, तब पुलिस वाले वहां से भागे।” खबर है कि आरा सदर के एसडीओ ने एक पुलिस अधिकारी को इस गुस्ताखी के लिए झिड़की भी पिलाई है। उस जमीन पर अधिकार के लिए इनलोगों ने कोर्ट में मुकदमा भी कर रखा है।

दरअसल, भू माफियाओं की नजर मार्टिन रेलवे कम्पनी की इस 12 एकड़ कीमती जमीन पर बहुत पहले से लगी है। करीब 200 गरीब परिवारों के कुल 1200 लोग करीब 40 वर्षों से झोपड़ी और मिट्टी का घर बनाकर यहां रह रहे हैं। इनमें से 70 परिवार ऐसे हैं जिनके दादा-परदादा मार्टिन रेलवे में कर्मचारी रहे हैं। उनके रहने के लिए कंपनी ने ही इस जमीन पर क्वार्टर बनवाया था। साल 1978 में मार्टिन कम्पनी के मालिक रेलवे का परिचालन बंद कर ब्रिटेन वापस लौट गए और अपनी सारी सम्पति 95 लाख रूपए में बेच दी। इस कंपनी की करीब 124 एकड़ जमीन सासाराम से आरा के बीच करीब 15 स्टेशनों के आस पास बिखरा है, उसकी देखभाल के लिए एक लीक्वीडेटर बहाल कर दिया। लीक्वीडेटर ने तीन प्रभावशाली और दबंग लोगों को पॉवर ऑफ अटॉर्नी दे दिया। इसी पॉवर ऑफ अटॉर्नी का सहारा लेकर जमीन की बिक्री शुरू हो गई, तब राज्य सरकार ने कलकत्ता हाई कोर्ट में लीक्वीडेटर के फैसले के खिलाफ अपील दायर की। सरकार का दावा है कि जमीन उसकी है क्योंकि उसी ने मार्टिन कम्पनी को रेलगाड़ी चलाने के लिए लीज पर दिया था। आरोप है कि एटॉर्नी पॉवर लेने वाले माफिया टाइप के लोगों ने राजस्व विभाग के एक अदना से अफसर को कलकत्ता हाई कोर्ट में खड़ा करा कर कहवा दिया कि सरकार को इस जमीन से कोई लेना देना नहीं है।

साल 2009 में इस मामले को विधान सभा में भाजपा के विधायक रामेश्वर चौरसिया ने उठाया था और इसकी सीबीआई जांच की मांग की थी। उनका आरोप है कि सरकार की अरबों रुपए की जमीन को फर्जी तरीके से एटॉर्नी पॉवर लेकर बेचा जा रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के संज्ञान में यह मामला तब आया जब इस खेल के एक दबंग लाभार्थी नेता ने सीएम से अपने पक्ष में पैरवी करानी चाही। उस नेता के एक करीबी ने बताया, ‘‘सीएम महोदय ने ध्यान से सुनने के बाद कहा कि मैं रेल मंत्री रहा हूं। फतुहा में भी मार्टिन की ही रेलगाड़ी चलती थी और जब बन्द हुई तो जमीन सरकार की हो गई। इस मामले में भी यही होना चाहिए। इतना सुनते ही मेरे बॉस चुप हो गए।’’

पीड़ित गरीब परिवार के सदस्यों ने राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव से भी मिलकर उन्हें अपनी पीड़ा सुनाई। तब लालू प्रसाद यादव ने आरा के डीएम बीरेन्द्र प्रसाद यादव को निर्देश दिया था कि इन लोगों को भू माफियाओं से प्रोटेक्ट करो लेकिन पीड़ितों का आरोप है कि डीएम साहब भू-माफियाओं के पक्ष में खड़े हैं। हालांकि, अपनी सफाई में डीएम ने जनसत्ता.कॉम को बताया, ‘‘हाई कोर्ट का आर्डर तो तामिल करना ही पड़ेगा,’’ जबकि केस नम्बर सी डब्लू जे सी 9202/12 में ऐसा कोई जजमेंट हाईकोर्ट ने नहीं दिया है। इससे इतर एक पब्लिक परशेप्सन यह है कि डीएम ही जिले का मालिक होता है और वो कुछ भी कर सकता है।

(कन्‍हैया भेलारी पटना स्‍थ‍ित स्‍वतंत्र पत्रकार हैं)

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