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फिर बीजेपी से अलग होना चाह रहे नीतीश कुमार, इन बयानों और एक्‍शन से दे रहे संकेत?

10 अप्रैल को जब पीएम नरेंद्र मोदी चम्पारण पहुंचे थे तब नीतीश ने स्पष्ट शब्दों में संकेत दे दिया था कि वो समाज में तनाव और टकराव की राजनीति को सफल होने नहीं देंगे।

बिहार के मख्यमंत्री नीतीश कुमार।

बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के अध्यक्ष नीतीश कुमार का फिर से बीजेपी से मोहभंग होता दिख रहा है। हाल के दिनों में नीतीश कुमार ने ऐसे कई संकेत दिए हैं, जिससे अंदेशा होने लगा है कि वो एक बार फिर एनडीए छोड़ सकते हैं। सोमवार (18 जून) को पटना में एक कार्यक्रम में नीतीश ने कहा कि वो क्राइम, करप्शन और कम्युनलिज्म से समझौता नहीं करेंगे। उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा कि अलायंस की बात छोड़िए, काम की बात कीजिए। बता दें कि हाल के दिनों में बिहार में क्राइम और साम्प्रदायिक दंगों की संख्या में इजाफा हुआ है। नीतीश कुमार के पूर्ववर्ती सरकारों से मौजूदा सरकार में अपराध का रिकॉर्ड कई गुना ज्यादा हुआ है।

विशेष राज्य का दर्जा: नीतीश ने इससे एक दिन पहले रविवार (17 जून) को नई दिल्ली में नीति आयोग की बैठक में न केवल आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू की मांगों का समर्थन किया बल्कि खुद बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की जोरदार तरीके से मांग की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने उन्होंने विकास के विभिन्न मापदंडों पर बिहार के पिछड़ेपन की बात कहते हुए कहा कि इसका हल विशेष राज्य का दर्जा मिलने से ही हो सकता है। सोमवार को ही एक और मुद्दे पर जेडीयू ने सहयोगी बीजेपी के राजनीतिक रूख के खिलाफ जाकर बयान दिया और दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार का समर्थन किया। जेडीयू के वरिष्ठ नेता पवन कुमार वर्मा ने साफ तौर पर कहा कि एक चुनी हुई सरकार को काम करने से नहीं रोका जाना चाहिए।

झारखंड में झटका: इससे पहले नीतीश की पार्टी ने झारखंड में आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनावों में सभी सीटों पर बीजेपी के खिलाफ कैंडिडेट उतारने का एलान किया है। झारखंड में लोकसभा की 14 और विधान सभा की 81 सीटें हैं। बिहार में 25 सीटों पर पहले ही जेडीयू अपनी दावेदारी जता चुका है और कह चुका है कि बिहार में चुनाव नीतीश कुमार के चेहरे पर लड़ा जाएगा। जेडीयू ने बिहार एनडीए में खुद को बड़ा भाई बताया था। उधर, एनडीए के अन्य घटक दल रालोसपा ने नीतीश को बड़ा भाई मानने और उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है।

बीजेपी को नसीहत: बता दें कि नीतीश इससे पहले भी बीजेपी नेताओं को आगाह कर चुके हैं कि वो साम्प्रदायिकता के मुद्दे पर कोई समझौता नहीं करेंगे। रामनवमी के आसपास राज्य के करीब दर्जभर जिलों में साम्प्रदायिक हिंसा फैली थी। इससे नीतीश की सुशासन बाबू की छवि को धक्का लगा है। शायद यही वजह है कि हालिया कई उप चुनावों में नीतीश की पार्टी को हार का सामना करना पड़ा है। 10 अप्रैल को जब पीएम नरेंद्र मोदी चम्पारण पहुंचे थे तब नीतीश ने स्पष्ट शब्दों में संकेत दे दिया था कि वो समाज में तनाव और टकराव की राजनीति को सफल होने नहीं देंगे।

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