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प्रशांत किशोर को साथ कर नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी को दिया झटका? जेडीयू को हो सकते हैं ये फायदे

प्रशांत बीजेपी कोटे से ना सही जेडीयू कोटे से ही सही लेकिन अब एनडीए के नेता बन गए हैं। मोदी के मुख्यमंत्री रहते हुए 'वाइब्रेंट गुजरात' की परिकल्पना प्रशांत किशोर ने ही दी थी।

Author September 17, 2018 6:12 PM
जेडीयू की कार्यकारिणी बैठक में पार्टी की सदस्यता लेने के बाद सीएम नीतीश कुमार और प्रदेश अध्यक्ष वशिश्ठ नारायण सिंह को धन्यवाद करते प्रशांत किशोर। (फोटो- PTI)

बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के अध्यक्ष नीतीश कुमार ने पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दिन चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को जेडीयू में शामिल कराया। माना जा रहा है कि नीतीश ने प्रशांत किशोर को शामिल कराकर एक तीर से कई निशाने लगाए हैं। हालांकि, उनका निशाना चूकता है या लक्ष्य भेदता है, इसका खुलासा चुनावी परिणाम करेगा लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसकी चर्चा तेज है कि आखिर नीतीश ने एक गैर राजनीतिक युवा को क्यों पार्टी में शामिल कराया, अपनी बगल की सीट पर बैठाया और उसे पार्टी का भविष्य बताया। बहरहाल, प्रशांत बीजेपी कोटे से ना सही जेडीयू कोटे से ही सही लेकिन अब एनडीए के नेता बन गए हैं। चर्चा है कि प्रशांत पार्टी में शरद यादव की जगह ले सकते हैं।

चुनावी रणनीति, प्रचार अभियान और सर्वे: 37 साल के प्रशांत किशोर चुनावी रणनीतिकार हैं। साल 2011 से वो नरेंद्र मोदी से जुड़े रहे हैं। 2014 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने उनके लिए न केवल जीत की रणनीति बनाई बल्कि ‘चाय पर चर्चा’ और ‘थ्री डी नरेंद्र मोदी’ अभियान छेड़ा। चुनावों में बीजेपी की प्रचंड जीत भी हुई लेकिन केंद्र में सरकार बनने के बाद बीजेपी नेतृत्व से मतभेद के बाद वो बिहार विधान सभा चुनाव से पहले नीतीश के साथ महागठबंधन से जुड़ गए। वहां भी प्रशांत ने नीतीश के सरकारी आवास पर चुनावी वाररूम बनाया और जीत की सफल रणनीति बनाई। टेक्नोलॉजी के जरिए भी प्रशांत ने जबर्दस्त प्रचार अभियान किया। चुनावी सर्वे के भी वो महारथी समझे जाते हैं। इसके जरिए वो जनता की नब्ज टटोलने में माहिर हैं। ऐसा समझा जा रहा है कि आगामी लोकसभा चुनावों में प्रशांत जेडीयू के लिए न केवल समग्र और प्रभावी चुनावी रणनीति बना सकते हैं बल्कि वो नीतीश कुमार और बिहार सरकार की ब्रांडिंग कर उनकी इमेज भी फिर से चमकाने की कोशिश कर सकते हैं। बता दें कि मोदी के मुख्यमंत्री रहते हुए ‘वाइब्रेंट गुजरात’ की परिकल्पना प्रशांत किशोर ने ही दी थी।

बीजेपी के डेटा का फायदा जेडीयू को: चूंकि प्रशांत बीजेपी के साथ काम कर चुके हैं। पीएम नरेंद्र मोदी के साथ लंबे समय तक काम कर चुके हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि उन्हें बीजेपी के गुण-दोष पता हैं। इसके अलावा उनके पास बीजेपी का डेटा बैंक भी हो सकता है जिसका इस्तेमाल वो नीतीश खेमे के लिए कर सकते हैं। वैसे तो इसका फायदा हर हाल में एनडीए को मिलेगा लेकिन एनडीए से जेडीयू के हटने का स्थिति में प्रशांत किशोर नीतीश कुमार के लिए ज्यादा लाभकारी साबित हो सकते हैं। बता दें कि प्रशांत किशोर फिर से बीजेपी से जुड़ने के इच्छुक थे लेकिन वहां दाल नहीं गली। ऐसे में नीतीश कुमार द्वारा उन्हें पार्टी में नंबर दो की तरह पेश करना पीएम मोदी के लिए झटका हो सकता है क्योंकि इससे यह संदेश साफतौर पर गया है कि बीजेपी और पीएम मोदी ने इस्तेमाल के बाद प्रशांत को जहां छोड़ दिया वहीं नीतीश ने गले लगा लिया। हालांकि, इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि प्रशांत दोनों दलों के बीच ब्रिज (सेतु-संबंध) का भी काम करेंगे। नीतीश की बात वो टीम मोदी तक आसानी से पहुंचा सकेंगे।

राहुल की कमजोरी बन सकती है जेडीयू की ताकत: प्रशांत किशोर बीजेपी, जेडीयू के अलावा कांग्रेस के लिए भी काम कर चुके हैं। उन्हें कांग्रेस और राहुल गांधी की कमोजरियां भी पता है। इसका फायदा वो नीतीश को दिला सकते हैं। बता दें कि साल भर पहले प्रशांत किशोर की वजह से ही नीतीश और राहुल गांधी में नजदीकियां बढ़ने लगी थीं। आगामी लोकसभा चुनावों में जेडीयू कैसे अधिक से अधिक सीटें जीत सके, इसकी जिम्मेदारी अब पीके के कंधों पर हो सकती है।

तेजस्वी को करारा जवाब: नीतीश ने पीके को पार्टी में शामिल कर विपक्षी नेतृत्व को भी कड़ा संदेश देने की कोशिश की है। दरअसल, सालभर के राजनीतिक घटनाक्रम और बिहार में कानून-व्यवस्था की हालत की वजह से नीतीश का कद थोड़ा बौना हुआ है और नेता विपक्ष तेजस्वी यादव ने इसका भरपूर फायदा उठाया है। तेजस्वी का कद बिहार में तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में उसे कुंद करने के लिए नीतीश ने फिर से एक प्रयोग किया है और सहारा प्रशांत किशोर को बनाया है। माना जा रहा है कि जेडीयू पीके को भविष्य के रूप में पेश करेगी और यूएन से जुड़े अभियान में उनके काम की तारीफ करेगी।

जातीय गोलबंदी: पीके मूल रूप से बिहार के रोहतास जिले के निवासी हैं लेकिन उनके डॉक्टर पिता पिछले तीन दशक से बक्सर में रह रहे हैं। रिटायरमेंट के बाद यहीं उन्होंने घर बना लिया है। वो जाति से ब्राह्मण हैं। माना जा रहा है कि नीतीश ने पीके को शामिल कर ब्राह्मण कार्ड भी खेला है। फिलहाल ब्राह्मण बीजेपी के साथ जुड़े हैं लेकिन पीके के बहाने नीतीश ने उन्हें भी साधने की कोशिश की है। इसी साल के मार्च में राजद ने भी ब्राह्मण कार्ड खेलते हुए मनोज झा को राज्यसभा सांसद बनाया था। नई सियासी परिस्थितियों में माना जा रहा है कि प्रशांत किशोर बक्सर से लोकसभा चुनाव लड़ सकते हैं जबकि बक्सर से मौजूदा बीजेपी सांसद और केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी चौबे को भागलपुर भेजा जा सकता है। बक्सर में ब्राह्मणों की अच्छी तादाद है। बिहार में करीब 6 फीसदी आबादी ब्राह्मणों की है। लोकसभा चुनाव नहीं लड़ने की स्थिति में शरद यादव के स्थान पर उन्हें राज्य सभा भी भेजा जा सकता है। फिलहाल उनकी सदस्यता पर कोर्ट में मामला लंबित है।

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