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बिहार: विधान परिषद सीट के ऑफर को वीआईपी ने ठुकराया, पार्टी बोली- 4 नहीं 6 साल के कार्यकाल वाली सीट दे भाजपा

विधानसभा चुनाव में मुकेश सहनी को हार गए थे। इसके बाद भी नीतीश मंत्रिमंडल में उन्हें जगह दी गई है।

बिहार: विधान परिषद सीट के ऑफर को वीआईपी ने ठुकराया, पार्टी बोली- 4 नहीं 6 साल के कार्यकाल वाली सीट दे भाजपा
VIP पार्टी के प्रमुख मुकेश साहनी। फाइल फोटो। सोशल मीडिया

बिहार में वीआईपी पार्टी ने बीजेपी को झटका दिया है। दरअसल बिहार विधान परिषद के लिए भाजपा से मिले ऑफर को वीआईपी पार्टी ने ठुकरा दिया है। वीआईपी पार्टी ने साफ तौर पर कहा है कि उसे 4 साल के कार्यकाल वाली बिहार विधान परिषद की सीट नहीं चाहिए बल्कि वह 6 साल के कार्यकाल वाली सीट पर मनोनीत होना चाहती है। बिहार में विधान परिषद की 2 सीटों के लिए 28 जनवरी को उपचुनाव होने वाले हैं। इसमे से एक सीट के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपने राष्ट्रीय प्रवक्ता शाहवनाज हुसैन को उम्मीदवार बनाया है। वहीं दूसरी सीट पर पार्टी ने वीआईपी के अध्यक्ष मुकेश सहनी को उम्मीदवार बनाना चाहती है। लेकिन अब नीतीश सरकार में मंत्री मुकेश सहनी ने उपचुनाव से लड़ने से इनकार कर दिया।

आपको बता दे कि विधान परिषद के 2 सीट खाली हुए हैं। विनोद नारायण झा जहां विधायक बने हैं।  वहीं सुशील मोदी राज्यसभा भेजे गए हैं। विनोद नारायण झा का कार्यकाल 2022 में खत्म होने वाला था, और सुशील मोदी का कार्यकाल 2024 तक था। विधानसभा चुनाव में मुकेश सहनी को हार गए थे। इसके बाद भी नीतीश मंत्रिमंडल में उन्हें जगह दी गई है। ऐसे में नियमत: मुकेश सहनी को 6 महीने के अंदर किसी भी सदन का सदस्य बनना पड़ेगा। बिहार विधान परिषद के उपचुनाव के लिए नामांकन की आखिरी तारीख 18 जनवरी है।

कई चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी के फैसले के बाद शाहनवाज हुसैन की चुनावी राजनीति में वापसी हो गई है। बता दें कि लोकसभा चुनाव 2014 में मिली हार के बाद यह पहला मौका है जब वो चुनाव मैदान में उतरेंगे। वर्ष 2014 में वो भागलपुर संसदीय सीट से चुनाव हार गए थे। 2019 के आम चुनाव में पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया था।

विश्लेषकों के मुताबिक मुकेश सहनी को लेकर दूसरा विकल्प यह भी है कि मुकेश सहनी भाजपा के साथ यह समझौता कर सकते हैं कि डेढ़ साल बाद जब दोबारा विधान परिषद का चुनाव होगा, तो उस सीट पर उन्हें ही उम्मीदवार बनाया जाएगा। इससे उनके मंत्री पद पर कोई खतरा भी नहीं होगा और 72 की जगह 90 महीने के लिए वह विधान परिषद के सदस्य बने रह सकते हैं। लेकिन उन्होंने भाजपा के प्रस्ताव के अस्वीकार कर दिया है तो राज्यपाल कोटे के सिवाय कोई और विकल्प नही बच रहा है।

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